पेंच पार्क में स्थानीय प्रतिनिधित्व क्यों नहीं!

 

(शरद खरे)

सिवनी के प्रत्येक निवासी का सिर उस समय गर्व से उठ जाता है जब ब्रितानी घुमंतू पत्रकार रूडयार्ड क्पिलिंग की विश्व प्रसिद्ध रचना द जंगल बुक के हीरो भेड़िया बालक मोगली की कथित कर्मभूमि का नाम आते ही सिवनी को पहचाना जाता है। सिवनी में मोगली की कथित कर्मभूमि पर ही पेंच नेशनल पार्क की स्थापना करायी गयी है।

पेंच नेशनल पार्क का कुल क्षेत्रफल 292.83 वर्ग किलोमीटर है। इसे 1993 में टाईगर रिज़र्व घोषित किया गया था। यहाँ 285 से अधिक प्रजाति के मिलते हैं। पक्षी होने का दावा पार्क प्रबंधन के द्वारा किया जाता है। यहाँ 1200 से अधिक वनस्पति प्रजाति हैं। उभयचरों की संख्या 10 प्रकार की है। 33 किस्म के मिलते स्तनधारी जीव हैं। 30 प्रकार के रेंगने वाले जीव हैं। यहाँ 50 प्रकार की हैं मछलियां हैं।

पेंच नेशनल पार्क में एक के बाद एक वन्य जीवों की असमय मौतों से पेंच प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर प्रश्च चिन्ह लगना स्वाभाविक ही है। पेंच में बाघों की मौतों का सिलसिला थमा तो है पर यह एकदम थमा नहीं माना जा सकता है। राहत की बात है कि पिछले एक साल में बाघ की मौतों में काफी हद तक गिरावट दर्ज की गयी है।

जानकार बताते हैं कि शावकों को जन्म देने के बाद मादा बाघ के साथ भ्रमण करने वाले शावकों को उसके द्वारा लगभग दो वर्ष की आयु के होने तक अपनी सरपरस्ती में ही रखा जाता है। शावक भेड़ तो हैं नहीं कि वे अपनी माँ के पीछे-पीछे चुपचाप चलें। वे चुलबुले होते हैं और शिकार आदि की तलाश में इधर-उधर जाते हैं जिससे मादा बाघ से ये दूर हो जाते हैं। इस तरह के युवा शावक अपना कार्य क्षेत्र (टेरेटरी) बनाने के लिये प्रयास करते हैं और आपसी संघर्ष में इनकी मौत भी हो जाती है।

देखा जाये तो पेंच नेशनल पार्क का कुल क्षेत्रफल इन युवा शावकों के हिसाब से कम है। इन शावकों को अपना अपना कार्यक्षेत्र बनाने में दूसरे बाघों के साथ वर्चस्व की जंग से होकर गुज़रना पड़ता है। इसमें जो जीता वही सिकंदर होता है। दूसरा बाघ या तो क्षेत्र छोड़ देता है या संघर्ष में दुनिया ही छोड़ जाता है।

अगर पेंच में बाघों का कुनबा बढ़ रहा है तो यह वाकई गौरव की बात है। वन विभाग के अधिकारी इस बात को छुपा क्यों रहे हैं? उन्हें तो गर्व के साथ कहना चाहिये कि पेंच नेशनल पार्क में बाघों की संख्या में बढ़ौत्तरी हुई है। अगर यहाँ बाघों के लिये क्षेत्र कम पड़ रहा है तो बाघों को अन्य नेशनल पार्क जहाँ इनकी तादाद कम है, में स्थानांतरित किया जा सकता है।

यक्ष प्रश्न यही है कि क्या इतनी तादाद में बाघ शावकों के संरक्षण के लिये पेंच नेशनल पार्क प्रबंधन के पास कोई ठोस कार्ययोजना है? अगर है तो उस योजना को सिवनी के निवासियों के सामने उज़ागर करने में हर्ज क्या है? आखिर किसी वन्य जीव की मौत के बाद पेंच प्रबंधन के अधिकारी मीडिया से बचते क्यों नज़र आते हैं?

एक यक्ष प्रश्न और यही खड़ा है कि आखिर पेंच नेशनल पार्क है किसका? क्या यहाँ नेशनल पार्क में पदस्थ क्षेत्र संचालक या उप संचालक सहित विभाग का? या आम जनता का जो सिवनी जिले के स्थायी निवासी है? जाहिर है यह सिवनी जिले के स्थायी निवासियों की संपत्ति और गौरव की बात है, फिर यहाँ के निवासियों को पेंच नेशनल पार्क की हकीकतों से दो चार क्यों नहीं कराया जाता है?

एक बात और उभरकर सामने आयी है कि अगर किसी बाघ या अन्य जीव की मौत होती है तो उसके शव परीक्षण के बाद विभाग के द्वारा उसका पोस्ट मार्टम कर उसे जला दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान नेशनल टाईगर कंजरवेशन एथॉरिटी (एनसीटीए) के नामांकित सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य होती है।

आप सभी को यह जानकर आश्चर्य होगा कि एनसीटीए का एक भी नामांकित सदस्य सिवनी जिले का स्थायी निवासी नहीं है। वर्तमान में एनसीटीए का नामांकित सदस्य मण्डला जिले से बुलाया जाता है। आखिर यह मान लिया जाये कि एनसीटीए के नामांकित सदस्य के लिये सिवनी जिले में एक भी व्यक्ति मापदण्डों में खरा नहीं उतर पा रहा है? या सिवनी के सांसद-विधायकों को इस बात का पता ही नहीं है कि जिले के किसी जानकार व्यक्ति को इसका सदस्य भी बनाया जा सकता है!

इस बात को समझा जा सकता है कि मण्डला जिले के निवासी नामांकित सदस्य को सिवनी से ज्यादा लेना-देना शायद ही हो। इसके अलावा जब किसी बाघ आदि की मौत होती है तो उसके शव परीक्षण से लेकर अंतिम संस्कार तक उसे उपस्थित रहना होता है। इसके लिये वह शासन से मण्डला से पेंच नेशनल पार्क आने जाने का भत्ता लेता है वो अलग से। ऊपर से जिस समय यह पूरी कार्यवाही हो रही है उस समय उसकी व्यस्तताएं क्या हैं? अगर वह व्यस्त है तो पार्क प्रबंधन के अधिकारियों को उसके आने तक इंतज़ार के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता है।

सिवनी के नागरिकों ने भी इस तरह का कोई समूह बनाकर पेंच पार्क प्रबंधन की जवाबदेही तय करने का प्रयास नहीं किया है। होना तो यह चाहिये कि हर माह नागरिकों के द्वारा पेंच प्रबंधन से पूरा हिसाब लिया जाये। सिवनी का स्थायी निवासी अगर एनटीसीए का सदस्य रहेगा तो वह पेंच की हकीकत से लोगों को रूबरू करवा ही सकता है और अगर ऐसा हुआ तो रहस्य बनती जा रही वन्य जीवों की मौतों पर से कुहासा भी हट सकता है।

पेंच नेशनल पार्क के अंदर चौबीसों घंटे प्रवेश के लिये वन विभाग का अमला ही अधिकृत है। वन विभाग भी अपने आप में अजूबा है जिसमें रेंजर तक के अधिकारी गणवेश में होते हैं और उसके ऊपर के अधिकारियों को गणवेश में छूट प्रदाय की गयी है। पेंच नेशनल पार्क में प्रत्येक वर्ष कितना बजट आवंटन प्राप्त होता है, इस बजट आवंटन का क्या किया जाता है, इस बारे में जिले की जनता को भी पता होना चाहिये!

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