प्राणियों की रक्षा ही धर्म का एकमात्र उद्देश्य

 

एक दिन सुबह-सुबह गुरुजी ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया। उनमें एक नया साधारण भक्त भी था जिसकी गुरुजी के प्रति सच्ची श्रद्धा थी। सभी बड़े खुश थे कि आज गुरुदेव के साथ ध्यान का अभ्यास करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस अवसर को कोई भी नहीं गंवाना चाहता था।

सभी ध्यानमग्न थे कि एक बच्चे की बचाओ-बचाओ की आवाज सुनाई पड़ी। बच्चा नदी में डूब रहा था। आवाज सुनकर गुरुदेव की आंखें खुल गई। उन्होंने देखा कि वही साधारण भक्त बच्चे को बचाने के लिए नदी में कूद गया। वह किसी तरह बच्चे को बचाकर किनारे ले आया। बाकी सभी शिष्य आंखें बंद किए ध्यानमग्न थे।

ध्यान का समय खत्म होने के बाद गुरुजी ने उन शिष्यों से पूछा, क्या तुम लोगों को डूबते हुए बच्चे की आवाज सुनाई नहीं पड़ी थी? शिष्यों ने कहा, हां गुरुदेव, सुनी तो थी। गुरुजी ने पूछा, तब तुम्हारे भीतर क्या विचार उठा था? शिष्यों ने कहा, हम लोग ध्यान में डूबे थे और आपके सानिध्य में ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलता।

गुरुजी ने कहा, लेकिन तुम्हारे बीच में से एक भक्त बच्चे को बचाने के लिए ध्यान छोड़कर नदी में कूद पड़ा। गुरुजी ने सभी को समझाते हुए कहा, तुमने डूबते हुए बच्चे की पुकार अनसुनी कर दी। पूजा-पाठ, धर्म-कर्म का एक ही उद्देश्य होता है प्राणियों की रक्षा करना। तुमने अभी तक मौखिक ज्ञान ही अपने भीतर भरा है। इसलिए धर्मशास्त्रों, व्याकरणों, धर्म-कर्म आदि में ही उलझे रहे, लेकिन सत्य का सार नहीं समझ सके।

(साई फीचर्स)

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