बढ़ते चीनी दखल को लेकर नेपाल में आशंकाएं

 

(सतीश कुमार) 

नेपाल में पिछले दिनों चीन के विरोध में प्रदर्शन हुए। दिलचस्प है कि इसकी शुरुआत भारत के विरोध से हुई। मामला कालापानी से जुड़ा था। यह क्षेत्र एक पहाड़ का ऊपरी भाग है जिसे भारत उत्तराखंड का अपना हिस्सा मानता रहा है। अभी तक नेपाल की तरफ से इस क्षेत्र को लेकर आपत्ति नहीं थी, लेकिन अनुच्छेद 370 में हुए फेरबदल के बाद भारत की ओर से जारी नए नक्शे को लेकर विवाद हो गया। उधर नेपाल के कृषि विभाग को इस बात की सूचना थी कि चीनी सड़क परियोजनाओं के चक्कर में नेपाल की सैकड़ों एकड़ भूमि चीन के कब्जे में चली गई है।

काला पानी पर चल रहे विवाद के दौरान ही नेपाली कृषि विभाग की यह आंतरिक रिपोर्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई जिससे जनभावनाएं चीन के भी खिलाफ हो गईं और चीन के विरोध में प्रदर्शन होने लगे। भारत विरोध पिछले कई वर्षों से नेपाल के आंतरिक राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बना हुआ है, लेकिन चीन विरोध की शुरुआत अभी तक नहीं हुई थी। इसलिए वर्तमान कम्युनिस्ट सरकार के लिए गंभीर चुनौती खड़ी हो गई। चुनौती ज्यादा गंभीर इसलिए भी मानी जा रही है क्योंकि विरोध की शुरुआत भले कृषि विभाग की रिपोर्ट के लीक होने से हुई, सतह के नीचे कई और कारक काम कर रहे थे। उदाहरण के लिए, चीन अरुणा नदी पर बहुत बड़ा डैम बना चुका है। इस डैम से बरसात के दिनों में पानी के बहाव को नेपाल की सीमा की तरफ छोड़ दिया गया जिससे नेपाल के कई जिले गंभीर रूप से बाढ़ की चपेट में आ गए। बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ, लेकिन नेपाल के चिंता व्यक्त करने के बावजूद चीन की ओर से कोई मदद नहीं मिली।

यही नहीं, पिछले दिनों एक एनजीओ की रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई कि बड़ी संख्या में नेपाली महिलाओं की चीन में तस्करी हो रही है। गौरतलब है कि चीन में लिंग असंतुलन एक बड़ी समस्या है। पिछले करीब चार दशकों तक चली वन चाइल्ड पॉलिसी का एक नतीजा यह भी है कि चीन में पुरुषों की तुलना में 15 करोड़ महिलाएं कम हैं। इस कमी की भरपाई नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों से महिलाओं, लड़कियों की तस्करी के जरिए हो रही है। हालांकि नेपाल के लोगों के लिए यह कोई नई सूचना नहीं है। लेकिन रिपोर्ट से पुष्टि होने के बाद यह नए सिरे से रेखांकित जरूर हो गई। चीनी हैकर्स भी नेपाल के लोगों की चिंता बढ़ाते रहे हैं। पिछले दिनों हुई ऐसी ही एक हैकिंग के चलते नेपाल की बैंकिंग व्यवस्था को तगड़ा झटका लगा था। नेपाल की 200 से अधिक वेबसाइट्स की हैकिंग हुई जिनमें कई महत्वपूर्ण सरकारी महकमा भी शामिल था।

इन सबकी वजहों से नेपाली जनमानस में चीन को लेकर शंकाएं जोर पकड़ने लगी हैं। दुनिया के विभिन्न देशों में चीन जिस तरह की आक्रामक कूटनीति चलाता है, उसका भी असर नेपाली जनमत के एक हिस्से पर देखा जा रहा है। स्वाभाविक रूप से नेपाल के नीति निर्माता जनमत में आ रहे इन बदलावों से पूरी तरह निरपेक्ष नहीं रह सकते।

भारतीय कूटनीति के लिए यह एक अवसर हो सकता है। चीन ने पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र को अपने प्रभाव में लेने का जो अभियान चलाया है, उसकी काट भारत को आज नहीं तो कल खोजनी ही पड़ेगी। नेपाल तो सिर्फ एक उदाहरण है। श्रीलंका और पाकिस्तान में भी हमें चीनी कूटनीति की आक्रामकता के नित नए संकेत मिलते रहते हैं। मगर इस आक्रामकता का दूसरा पहलू भी है। इसके दुष्परिणाम तीव्र जनभावनाओं के भड़क उठने के रूप में कभी भी सामने आ सकते हैं।

ऐसी स्थिति में भारत अपनी तरफ से भले कुछ न करे, लेकिन अगर आम नेपाली लोगों में चीन के बढ़ते दखल को लेकर आशंकाएं बढ़ रही हैं तो अपने सद्भावपूर्ण कदमों से वहां के नीति निर्माताओं को यह याद तो दिला ही सकता है कि भारत हमेशा से उनके लिए बेहतर विकल्प रहा है और वे किसी वजह से मन में बंध चुकी गांठों के कारण चीन की ओर झुकना अपनी मजबूरी समझने लगे थे तो इस गलती को सुधारने में देर करने की कोई वजह नहीं है।

(साई फीचर्स)