जाहिलों से भी बदतर हम

 

(प्रकाश भटनागर)
नये साल की सुबह से लेकर दोपहर तक मौका भी था और दस्तूर भी इसलिए कुछ समय सोच विचार में भी गुजारा। नया साल था इसलिए पहले दिन भगवान की शरण में तो जाना बनता ही था। मंदिर से लौटते समय एक वाहन पर लिखा देखा, परमेश्वर की सराहना करें। इसके बाद कुछ विचित्र संयोग एक-दूसरे से जुड़ते चले गए। निगाह ट्रैफिक सिग्नल के आसपास लगे उन बोर्ड पर गयी, जिन पर लिखा था, कृपया हेलमेट पहनें। सीट बेल्ट अवश्य लगाएं। इसी कृपया के साथ करुण स्वर में यहां-वहां यातयात नियमों का पालन करने, शहर को स्वच्छ बनाये रखने एवं गीला तथा सूखा कचरा इधर-उधर फेंकने की बजाय उन्हें डस्टबीन में डालने वाली बातों पर भी नजर ठहर गयी। यह सब कोई पहली बार नहीं देख रहा था पर नए साल में ध्यान भटक गया। इक्कीसवीं सदी का बीसवां साल आ गया है

और हम हैं कि जाहिलों से भी बदतर हो गये हैं। परमेश्वर किसी भी धर्म के अनुयायी का हो, क्या अब यह लिखकर सिखाना पड़ेगा कि उसे सराहा जाए? आजादी के सत्तर साल से अधिक के बाद भी व्यवस्था को हमें विनती कर यह बताना पड़ रहा है कि अपने और परिवार की सुरक्षा के लिए हम हेलमेट पहनें। सीट बेल्ट का प्रयोग करें। हम आज भी चारित्रिक रूप से इतने गंवार हैं कि शासन-प्रशासन को हमसे कचरा न फैलाने की अपील करनापड़ रही है। क्या सचमुच हम सुन्न हो गये हैं। अपने अधिकार के लिए चीखना तो हमारी फितरत है। उसके लिए भृकुटि तनने या मुट्ठी भिंचने में हम पल भर का भी समय नहीं गंवाते हैं।

तो फिर नागरिक कर्तव्य की बात आते ही हमारी सारी चेतना को काठ क्यों मार जाता है? स्वच्छता सर्वेक्षण में भोपाल को इस बार मिली पराजय शायद सरकार या शासकीय निकायों की ही गलती नहीं है। इस गुनाह में हम भी बराबरी के भागीदार हैं। यह हम ही हैं, जिन्हें कूड़ादान की ओर कदम बढ़ाने में घोर आलस आता है। ऐसा क्यों? हम तो वह हैं, जो इस बात की पूरी ऐहतियात बरतते हैं कि घर में मौजूद अचार की बरनी से अचार निकालने के लिए नाममात्र का भी गीला चम्मच प्रयोग न करें, वरना अचार में फफूंद लग जाएगी। यह भी हम ही हैं, जो इस चिंता में सतत रूप से घुलते रहते है कि ठंडक आने से पहले घर के सारे गरम कपड़ों को धूप दिखा दी जाए।

तो फिर यही सावधानी या चिंता हमें अपन सार्वजनिक परिवेश के लिए क्यों नहीं होती? ऐसा तो है नहीं कि अचार या गर्म कपड़ों की हिफाजत के लिए आप शासन-प्रशासन का मुंह तकते हों। तो फिर ऐसा क्यों कि एक साफ, अनुशासित और मर्यादित शहर के निर्माण के लिए हम खुद की भूमिका तय करने से झिझकते हैं? दरअसल, हमारी सारी अच्छाई सोशल मीडिया पर उपदेश देने तक ही सिमट कर रह गयी लगती है। वहां की गयी पोस्ट देखें। ऐसा लगता है कि सतयुग की गंगा बहाने का सारा का सारा ठेका वहां के खाताधारियों ने ही ले लिया है। ऐसे-ऐसे सुविचार और इस किस्म के चितंन देखने को मिलते हैं, गोया कि समाज में सुधार की बयार बह रही है। सोशल मीडिया की स्क्रीन से नजर हटते ही साफ दिखने लगता है कि यह भ्रम है। झूठ है। प्रपंच है और है दिखावा।

हम राजनेताओं को आडम्बर वाला कहते हैं, थोथी बातें करने वाला बताते हैं। लेकिन ईमानदारी से खुद को टटोलिए। क्या हम खुद नाटकीयता एवं खोखले उपदेश देने में किसी नेता से पीछे रह गये हैं? आभासी जगत के फेर में पड़कर हम खुद ऐसे नकली इंसान बन गए हैं, जो कहता कुछ है और करता उससे ठीक उलट है। एक कहानी का शीर्षक तथा लेखक याद नहीं आ रहे। इस कहानी के आखिर में कल्पना की गयी थी कि एक श्वेत वस्त्रधारी शख्स समूची मानव जाति को नग्नावस्था में लेकर चल रहा है। इस धारणा के साथ कि आज के मानव को वास्तविक मानव बनाने के लिए उस युग में ले जाकर तालीम देना होगी, जिस युग में वह वस्त्र-विहीन था। यानी मानवता के कल्याण की बात मानवीय अस्तित्व के शुरूआती दौर से ही सिखाई जाना होगी। आज सुबह से दिखे तमाम अपीलनुमा संकेत बोर्ड देखकर इस कहानी के अंत के लिए मेरी समर्थन वाली धारणा और मजबूत हो गयी है। कल्पना कीजिए कि जीवन के इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी यदि हमें मानवीय कर्तव्यों का भान कराने के प्रयासों की जरूरत मौजूद रहे तो भला हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस तरह से अच्छे संस्कार दे सकेंगे। बात बुरी लगी हो तो क्षमा करें। सभी को नव साल की अनंत शुभकामनाएं।

(साई फीचर्स)

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