पिता और पितृ सत्ता

 

(देवी प्रसाद मिश्र) 

जाते हुए साल की दिसंबर की आखिरी एक तिथि में मेरे वयोवृद्ध पिता नहीं रहे। लगभग एक साल पहले संभवतः दिसंबर की ठंड में ही जब मैं उनसे मिलने इलाहाबाद गया, तो उन्होंने मुझ से कहा कि आत्महत्या मत करना। मैं सन्न रह गया। समझ में नहीं आया कि उनसे क्या कहूं। यह भी समझ में नहीं आया कि वह ऐसा क्यों कह रहे हैं। इस संवाद की तकलीफ यह थी कि मुझे लेकर उनके मन में यह बोझ था। इस प्रसंग की वक्रता इस बात में थी कि हम दोनों के बीच बहुत सीमित संवाद था। फिर भी थोड़ी देर तक अवाक् रहने के बाद मैंने जानना चाहा कि इस तरह की आशंका के उनके स्रोत क्या थे। इसका उन्होंने कोई साफ उत्तर नहीं दिया। तो क्या उनकी आशंका का स्रोत मेरी किसी कविता या कविता के पात्र की मनोदशा थी, जिसे वह मुझ पर आरोपित कर रहे थे। लेकिन जहां तक मेरा सवाल था, मैंने कभी नहीं चाहा कि वह मेरी रचनाएं पढ़ें। इसकी मैं कोई वजह नहीं बता सकता कि ऐसा क्यों था, लेकिन था। तो क्या वह मेरी चीजों को पढ़ने का जुगाड़ कर लिया करते थे?

मैं दरअसल यह कहने की कोशिश कर रहा हूं कि रचनाएं इतनी भी आत्मकथात्मक नहीं हुआ करती हैं। वे लेखकीय मनोदशा का अतिरंजन या आकुंचन बेशक होती हैं। इसीलिए मेरी रचनाओं के पिता मेरे अपने पिता नहीं थे। मेरी रचनाओं के पिता अमूमन थिएट्रिकल थे। पारसी थिएटर का उत्ताप और अतिरिक्त। विस्फोट और उन्माद। मेरे पिता ड्रामाई नहीं थे। इसीलिए रचनाओं के लिए वह मुझे आकर्षित भी नहीं करते थे। मैं यह नहीं कहता कि वह पितृसत्ता के अभिमान से मुक्त थे, लेकिन तानाशाह नियंत्रक वह नहीं थे, जिसकी तलाश मैं रचना-पिता में किया करता था। एक बार की बात है कि उनके हाथ में मेरा लिखा शायद पहला और आखिरी प्रेमपत्र लग गया। इसे मैंने खुद से साढ़े तीन साल बड़ी प्रेमिका के लिए लिखा था। मेरे पिता ने वह चिट्ठी मुझे लाकर दी। वह कुछ नहीं बोले। यद्यपि वह अपसेट लग रहे थे। इस प्रसंग का इस्तेमाल मैंने अपनी पहली कहानी में किया, जिसमें रचना-पिता बेटे की जेब में प्रेम पत्र पाकर खासा उग्र हो जाता है। उसे लगता है कि यह घटना उसके पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देगी। हिंदी के नायाब कहानीकार ज्ञानरंजन अपनी कहानी पिता में दो पीढ़ियों के बीच की संवादहीनता को विचलित करनेवाली सूझ के साथ लाते हैं। वह बहुत नियंत्रित और ठंडे वृत्तांतों के जरिए मूल्यों में आते बदलावों को डिकोड करते हैं। इस कहानी के संदर्भ में कई बार यह बतंगड़ खड़ा किया जाता था कि ज्ञान जी के अपने पिता के साथ संबंध सहज नहीं थे। जब कि ऐसा नहीं था। लेकिन सवाल यह है कि कोई भी संबंध क्या सचमुच सहज होता है?

पिता-पुत्र का संबंध तो अपनी जैविक, समयगत और मूल्यगत संरचना में ही द्वंद्वात्मक होता है। यह पुराने और नए का विस्मयकारी और विलक्षण एंटी-थीसिस और सिंथेसिस होता है। यद्यपि इसकी मूलवृत्ति टकराहट का विलयन हो नहीं पाता। इसका महान आख्यान फ्रांसीसी फिल्मकार त्रुफो की फिल्म 400 ब्लोज है। इसमें एक पिता अपने किशोर बेटे की हरकतों से परेशान है। बेटे को सुधारने के लिए पिता उसे जेलनुमा सुधारगृह में डाल देता है। जाहिर है त्रुफो पितृ सत्ता की क्रूरता को एक मेटाफर और सिनेमाई आख्यान में बदलते हैं, जिसके स्रोत उनके बचपन के अनुभवों में फैले थे। परिवार के स्तर की पितृसत्तात्मक क्रूरता राज्य के स्तर पर आततायी राजसत्ता में बदलती है। तब वह भी पूरे राष्ट्र को सुधारगृह की तरह ही देखती है। करेक्शन होम। यहां लोगों को ठीक किया जाता है। फूको राज्य के इस पितृसत्तात्मक रूप को बहुत गहरे पहचानते थे, जो मूलतः दंड और नियमन द्वारा संचालित होती थी। मौजूदा सरकार भी देश को सुधारगृह की तरह ही चलाना चाह रही है। उसे लगता है कि विचार और विमर्श व्याधियां हैं, जिन्हें सेंसर, दंड या भय के जरिए नियंत्रित और नियमित किया जा सकता है। आलोचना का मुंह बंद किया जा सकता है।

प्रतिरोध की रीढ़ तोड़ी जा सकती है। विरोध करनेवालों पर लाठियां बरसाई जा सकती हैं। इस तरह राज्य एक आततायी महापिता में बदल जाता है और समाज एक करेक्शन होम में। इस पूरी अवस्थिति की विडंबना बस यह होती है कि सुधारगृह का ताला कभी भी टूट सकता है।

(साई फीचर्स)

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