अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर यह दोहरा मापदंड!

 

(बलबीर पुंज) 

कई वर्षों से देश में बार-बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार का मुद्दा विपक्ष द्वारा उठाया जा रहा है। क्या मोदी सरकार में देश के भीतर ऐसा वातावरण बन गया है, जिसमें अन्य विचारों के प्रति असहिष्णुता बढ़ गई है? नववर्ष 2020 के मेरे पहले कॉलम में इस प्रश्न का जन्म केरल की उस घटना के गर्भ से हुआ है, जिसमें राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को अपनी राय रखने से मार्क्सवादी इतिहासकार इरफान हबीब ने न केवल रोकने का प्रयास किया, अपितु आरिफ तक पहुंचने की कोशिश में उन्होंने सुरक्षाकर्मियों से धक्का-मुक्की तक भी कर डाली।

विडंबना देखिए कि देश का जो वर्ग वर्ष 2014 से उपरोक्त संवैधानिक मूल्यों के तथाकथित हनन को मुद्दा बनाकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहा है, वह केरल के मामले में चुप है और इसके विरुद्ध कोई आंदोलन भी नहीं कर रहे है। क्या केरल का घटनाक्रम असहिष्णुता के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार पर आघात नहीं है? आखिर इस दोहरे मापदंड के पीछे कौन-सा विचार है?

इन प्रश्नों का उत्तर खोजने से पहले यह जानना आवश्यक है कि केरल में उस दिन क्या हुआ? बीते शनिवार (28 दिसंबर) केरल स्थित कन्नूर विश्वविद्यालय में भारतीय इतिहास कांग्रेस के 80वें संस्करण का आयोजन हुआ। मंच पर प्रदेश के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के अतिरिक्त अन्य गणमान्य अतिथियों के साथ वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब भी उपस्थित थे। अधिकतर वक्ताओं ने संविधान की दुहाई देकर नागरिक संशोधन अधिनियम के खिलाफ अपने विचार व्यक्ति किए। जैसे ही आरिफ मोहम्मद ने बोलना प्रारंभ किया, वैसे ही दर्शक-दीर्घा में बैठे कुछ लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से नारे लगाने शुरू कर दिए।

बकौल आरिफ मोहम्मद, मंच पर प्रसिद्ध मलयाली साहित्यकार शाहजहां मादमपर, जिनके विचार भी मुझसे अलग थे- मैंने उनसे अनुरोध किया कि जो भी लोग उनका विरोध कर रहे हैं, आप उन्हें मेरी ओर से बातचीत का निमंत्रण भेजिए। वह गए और उन्होंने लौटकर बताया कि प्रदर्शनकारी बात करने नहीं, वहां केवल प्रदर्शन करने आए हैं। इसपर मैंने कहा कि जब आप बातचीत का दरवाजा बंद कर देते हैं, तो फिर हिंसा और घृणा का माहौल शुरू हो जाता है। मेरे इतना कहने पर इरफान साहब उठे और मेरी तरफ बढ़ने लगे। एडीसी ने उन्हे रोका, फिर वह सोफे के पीछे से मेरी तरफ आने लगे, जहां भी सुरक्षाकर्मियों ने उन्हे फिर से रोक दिया। सुरक्षाकर्मी और कन्नूर विश्वविद्यालय के कुलपति मेरे और इरफान हबीब के बीच दीवार बनकर खड़े हो गए।

राज्यपाल आरिफ कहते हैं कि हबीब ने उनसे मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को उद्धृत करने के अधिकार पर सवाल उठाते हुए गोडसे का उल्लेख करने को कहा। इसपर उन्होंने कहा, मैं अपने भाषण में किसको कोट करूं और किसको नहीं, यह मैं तय करूंगा। मौलाना आजाद किसी की जायदाद नहीं हैं। यहां हल्ला मचा रहे लोग मुझे धमकी देकर चुप नहीं करा सकते हैं। मेरी बातों को भी आपको शांति से सुनना पड़ेगा।

कांग्रेस सहित अधिकांश सेकुलरिस्ट जिस प्रकार नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ देशभर में हुए हिंसक प्रदर्शन, जिसमें प्रदर्शनकारियों ने करोड़ों रुपयों की सार्वजनिक-निजी संपत्ति को या तो स्वाहा कर दिया या फिर उन्हे भारी क्षति पहुंचाई, यहां तक कई पुलिसकर्मियों को पत्थर मार-मारकर अधमरा कर दिया- उसे वामपंथी सहित देश के अधिकांश स्वयंभू सेकुलरिस्ट असहमति और अभिव्यक्ति के चश्मे से देख रहे है। अब यदि प्रदर्शनकारियों का हिंसक और असंवैधानिक व्यवहार असहमतिका प्रतीक है, तो राज्यपाल आरिफ मोहम्मद को क्यों रोक गया, जो सौम्यता और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे?

सच तो यह है कि मार्क्सवादी चिंतक इरफान हबीब के व्यवहार से मैं बिल्कुल भी हैरान या अचंभित नहीं हूं। इसका कारण वामपंथी विचारधारा का वह स्वाभाविक दर्शन है, जिसमें अधिनायकवाद, हिंसा, असहमति और मानवाधिकारों को दबाना- इसका केंद्रबिंदु है। इसी कारण मैं व्यक्तिगत रूप से इरफान हबीब को इतिहासकार भी नहीं मानता हूं, क्योंकि वह भी उसी रुग्ण चिंतन के विशुद्ध प्रतीक है, जिसमें भारत और उसकी सनातन संस्कृति के प्रति केवल घृणा का भाव है।

क्या यह सत्य नहीं कि जिस समाजवाद की परिकल्पना कार्ल मार्क्स ने की थी, उससे अंगीकृत साम्यवादियों की सरकार दुनिया के जिस भू-भाग में आई- वहां के अधिनायकवादी शासन में नागरिक अधिकार छीन लिए गए, उनके विचारों से असहमति रखने वालों और विरोधियों को या तो मौत के घाट उतार दिया गया या फिर अमानवीय यातनाएं दी गई? कालांतर में व्लादिमीर लेनिन-जोसेफ़ स्टालिन (सोवियत संघ), माओ से-तुंग (चीन) और पोल पोट (कंबोडिया) का दौर इसका मूर्त रूप है। यदि इन सभी की कुनीतियों से जनित मानव-त्रासदी को अलग भी कर दें, तब भी इन सभी के शासन में लाखों निरपराध लोगों को केवल इसलिए मार दिया गया था, क्योंकि वह उनके विचारों से सहमत नहीं थे या उनकी नीतियों के विरोधी थे। भारत में प.बंगाल, केरल और त्रिपुरा- इसी प्रकार के वामपंथी मॉडल का दंश झेल चुका है। वर्तमान समय में केरल के वामपंथी शासन में अब भी राजनीतिक विरोधियों की निर्मम हत्या कर दी जाती है।

इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस और वामपंथियों सहित अधिकतर स्वघोषित सेकुलरवादी राजनीतिक विरोध के नाम पर अक्सर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्तारुढ़ भाजपा को फासीवादी कहते हुए उनकी तुलना जर्मन तानाशाह एडोल्फ हिटलर से करते है। अब यदि हिटलर अपने दुराचारों के लिए मानवता के लिए कलंक था, तो लेनिन, स्टालिन और माओ से अलग व्यवहार क्यों होता है?

कन्नूर विश्वविद्यालय घटनाक्रम में गोडसे का नाम भी उछला था। यदि गांधीजी की हत्या करने के कारण कांग्रेस, वामपंथियों और अन्य स्वघोषित सेकुलरवादी के लिए हत्यारे गोडसे का नाम मानवता-विरोधी और घृणा का पात्र बन गया है, तो उसी जमात के लिए तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत एम.करुणानिधि के सुपुत्र स्टालिन नाम का उदारवाद का प्रतिबिंब क्यों है?

आज हम भारतीय समाज के एक वर्ग को अपनी विशाल सांस्कृतिक विरासत, कालजयी संस्कृति और परंपराओं से कटा हुआ पाते है, यहां तक उनमें इन सब के प्रति घृणा का भाव भी ज्वलंत रहता है। इस विकृति के लिए इरफान हबीब जैसे मार्क्सवादी चिंतक ही सर्वाधिक रूप से जिम्मेदार है, जिन्होंने भारतीय इतिहासकार के रूप में देश के नागरिकों को उनकी जड़ों से काटने में मुख्य भूमिका निभाई। यह हबीब जैसों का वामपंथी समूह था, जिन्होंने 1970 के दशक में अयोध्या स्थित विवादित ढांचे के नीचे विशाल राम मंदिर के अवशेष होने संबंधी भारतीय पुरातात्विक विभाग की रिपोर्ट को गौण करते हुए मुस्लिम समाज सहित पूरे देश को भ्रमित किया था।

मार्क्सवादी हबीब 1975-77 और 1984-94 के बीच अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए.एम.यू.) के उन्नत अध्ययन केंद्र के मुख्य संचालक रहे और 1986-90 तक भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की बतौर अध्यक्ष जिम्मेदारी भी संभाली। यही वो कालखंड था, जब औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी चिंतन से जकड़े मैकॉले आदि यूरोपीय विद्वानों की शिक्षा पद्धति का अनुसरण करते हुए भारत के मूल इतिहास और उसकी सांस्कृतिक जड़ों को विकृत तथ्यों के आधार पर काटने वाला शैक्षणिक पाठ्यक्रम को तैयार किया गया। विडंबना देखिए, यह पाठ्यक्रम आज भी देश के स्कूली-स्नातक कार्यक्रम का हिस्सा है।

स्वतंत्र भारत में वामपंथियों को अपना भारत-हिंदू विरोधी एजेंडा लागू करने में देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का भरपूर समर्थन मिलता रहता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि 1969 से कांग्रेस के वैचारिक-राजनीतिक दर्शन में वाम-चिंतन का परचम लहरा रहा है। उस दौर में कई वामपंथियों ने कांग्रेस की सदस्यता ली थी, जिसमें सैयद नुरूल हसन का नाम सबसे अग्रणी है। 1971 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हे अति-महत्वपूर्ण शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली, जिसके बाद देश के शीर्ष शिक्षण नियामक संस्थानों में व्यापक स्तर पर वामपंथियों की नियुक्तियां की गई। इन्हीं में इरफान हबीब आदि का नाम भी शामिल है। वर्तमान समय में हबीब उसी ए.एम.यू. में बतौर इतिहास विषय के प्राध्यापक है, जिसके परिसर से स्वतंत्रता पूर्व पाकिस्तान का विचार आंदोलन बना, जिसमें वामपंथियों ने अंग्रेजों और मुस्लिम लीग का साथ दिया। अब 72 वर्षों में पात्र भले ही बदल गए हो, किंतु देश को फिर कई टुकड़ों में बांटने के घोषित वाम-एजेंडे को छद्म-सेकुलरवाद के नाम पर आगे बढ़ाया जा रहा है। सच तो यह है कि वामपंथ और फासीवाद दोनों एक दूसरे के ही पर्यायवाची है, जो विकृत उदारवाद के नाम पर न केवल अलगाववादियों और जिहादियों की ढाल बनते है, अपितु स्वयं भी प्रतिकूल विचारों को दबाने या उसे मिटाने हेतु जिहादी आचरण का भी खुलकर दोहन करते है। केरल में मार्क्सवादी इरफान हबीब द्वारा राज्यपाल आरिफ मोहम्मद को अपने विचार रखने से रोकना- उसी वामपंथी जिहाद का सबसे बड़ा मूर्त रूप है।

(साई फीचर्स)

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