जूट मिलों की चिंता

 

चिंतनीय है कि 20 जूट श्रमिकों को अस्पताल ले जाना पड़ा। ये मजदूर आमरण अनशन पर बैठे थे और बुरी तरह बीमार पड़ने लगे थे। आंदोलन में जुटे कम से कम 576 अन्य मजदूरों की स्थिति भी बिगड़ गई थी। सर्द मौसम में सड़कों पर रहना वाकई कठिन है। खुलना में राज्य के स्वामित्व वाली नौ जूट मिलों के श्रमिक अपनी 11 सूत्री मांगों के साथ पिछले कुछ महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं।

उनकी प्रमुख मांगों में जूट मिलों के सार्वजनिक-निजी स्वामित्व को रद्द करने, सेवानिवृत्त श्रमिकों के लिए भविष्य निधि व ग्रेच्युटी भुगतान और साप्ताहिक वेतन के नियमितिकरण की मांग शामिल है। इसके अलावा, 2015 के वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने और बकाया भुगतान की मांग भी वे प्रमुखता से कर रहे हैं। कर्मचारियों को पिछले साल कई बार सड़क पर उतरना पड़ा था, क्योंकि सरकार के बार-बार आश्वासन के बावजूद मांगों को पूरा नहीं किया गया, और अब स्थिति ज्यादा खराब हो गई है।

मजदूरों के बच्चों को भी अपने माता-पिता के साथ सड़कों पर देखना चौंकाता है। कई बच्चे ऐसे हैं, जिनके माता-पिता को वेतन भुगतान नहीं हुआ है, तो उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ेगा। बांग्लादेश में वैसे ही आम जूट कर्मी को कम वेतन मिलता है। कहने की जरूरत नहीं कि हमारा जूट उद्योग जर्जर स्थिति में है। सरकार की जूट मिलें दशकों से घाटे में चल रही हैं और इसीलिए बांग्लादेश जूट मिल्स कॉरपोरेशन के लिए अपने कर्मचारियों को नियमित वेतन भुगतान मुश्किल हो गया है। 

सवाल यह है कि इस क्षेत्र को उबारने के लिए सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए हैं? यदि निजी तौर पर चलने वाली जूट मिलें लाभ कमा सकती हैं, तो सरकार संचालित मिलें क्यों नहीं? यहां भ्रष्टाचार, अनाश-शनाप योजना और खराब प्रबंधन जैसे मसले साफ नजर आते हैं। इस क्षेत्र को पुनर्जीवित करना बेहद जरूरी है। यदि ऐसा किया जाए, तो इस क्षेत्र पर निर्भर लाखों लोग सभ्य जीवन जी सकेंगे। इस बीच वर्तमान संकट के समाधान के लिए तुरंत श्रमिकों को बकाया भुगतान करना चाहिए, ताकि श्रमिकों व उनके परिवारों को भूखे न रहना पड़े। (द डेली स्टार, बांग्लादेश से साभार)

(साई फीचर्स)

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