तब गांधी का पैगाम क्या था

 

(रामचंद्र गुहा) 

भले ही पश्चिमी दिल्ली की एक मुख्य सड़क उनके नाम पर हो, लेकिन मेरा मानना है, बहुत कम ही लोग जानते होंगे कि हकीम अजमल खान कौन थे। वह बहुत दुलारे हकीम थे, यूनानी-स्वदेशी दवाओं के जानकार। उनके मरीजों में हिंदू, मुस्लिम, अमीर, गरीब, मध्यवर्गीय, सब शामिल थे। अपनी हकीमी से अलग अजमल खान एक बड़े देशभक्त थे। वह आजीवन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य रहे और कुछ समय उसके अध्यक्ष भी। विद्वान और देशभक्त होने की दोहरी क्षमता के बल पर उन्होंने उस राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय की स्थापना में अहम भूमिका निभाई थी, जो आजकल खबरों मंक है।

जब 1920 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना हुई थी, तब अजमल खान इसके पहले चांसलर नियुक्त हुए थे। मुश्किल शुरुआती सालों में उन्होंने जामिया का हर तरह से पोषण किया, लेकिन दिसंबर 1927 में 59 की उम्र में अचानक ही दुनिया को अलविदा कह गए। उनकी मौत से उनके करीबी दोस्त महात्मा गांधी भी हिल गए थे। बंबई में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था, श्इस मोड़ पर उनकी मौत एक बहुत बड़ी क्षति है। हकीम अजमल खान भारत के सच्चे सेवकों में थे और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए भी सबसे अनमोल इंसानों में एक थे।श् 

गांधी जानते थे कि हकीम के इंतकाल को उस जामिया मिल्लिया इस्लामिया में शिद्दत से महसूस किया जाएगा, जो अभी भी एक बनता हुआ संस्थान है। इसलिए उन्होंने तत्काल एक पैगाम भेजा, जो जामिया के स्टाफ और छात्रों के बीच पढ़ा जाना था। अपने पैगाम में गांधी ने लिखा था, जाने वाले की आत्मा हमेशा हमारे साथ रहती है। हम जामिया को (हिंदू-मुस्लिम) एकता का जीवंत मंदिर बनाकर उनकी स्मृति को हमेशा ताजा रखेंगे। आपको उम्मीद नहीं खोनी चाहिए। जामिया का अंत तब तक नहीं हो सकता, जब तक इसके प्रति प्रोफेसर और छात्र सच्चे हैं। मेरा आप सभी से वादा है, ईश्वर करे, जो भी वह देगा, इस संस्थान को बेहतर वित्तीय आधार देने के लिए मैं अपनी पूरी शक्ति लगा दूंगा। गांधी ने अपना वादा निभाया। जामिया को चलाए रखने के लिए पैसे की कमी नहीं पड़ी। वाइस चांसलर जाकिर हुसैन और मोहम्मद मुजीब के नेतृत्व में विश्वविद्यालय चमक उठा। जामिया ने खुद को देश के एक सर्वश्रेष्ठ संस्थान के रूप में खड़ा किया। 

अब दिसंबर 2019 में हकीम अजमल खान के इंतकाल के 72 साल बाद जामिया ने फिर संकट का सामना किया, जब सीएए के खिलाफ छात्रों के प्रदर्शन ने पुलिस को कैंपस में घुसकर कार्रवाई के लिए उकसाया। वहां के वीडियो पूरे देश और दुनिया में वायरल हो गए। जामिया कैंपस पर दिल्ली पुलिस ने 15 दिसंबर को धावा बोला था। उसके दूसरे दिन सुबह एक साथी इतिहासकार से मुझे एक संदेश हासिल हुआ। छात्रों ने तो राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों में पहले भी भाग लिया था। उस इतिहासकार ने मुझसे पूछा, क्या 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन या आपातकाल के दौरान कभी किसी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में सरकार द्वारा तोड़-फोड़ की गई थी? मैंने जवाब में इनकार किया और कहा, इंदिरा गांधी और वायसराय अधिनायक थे, लेकिन वे किताबें पढ़ते थे।

एक महान विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी पर इस तरह हुए हमले से देश को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। हालांकि यह आश्चर्यजनक था कि इस घटना पर विरोध किस कदर भड़क उठा। हकीम अजमल खान के इंतकाल के बाद के हालात से अलग, इस बार जामिया के लिए संकट की घड़ी में मदद के लिए भले ही कोई महात्मा गांधी नहीं था, लेकिन हर उम्र के आम लोग ही सामने आ गए। पूरे देश में ऐसे बहुत भारतीय हैं, जिन्हें नागरिकता संशोधन कानून पर आपत्ति है। जामिया के लिए उन संस्थानों की ओर से भी समर्थन उमड़ पड़ा, जो पारंपरिक रूप से गैर-राजनीतिक हैं, जैसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, नेशनल लॉ स्कूल इत्यादि। पीड़ितों के प्रति सहानुभूति जल्द ही सीएए के विरुद्ध व्यापक विरोध में बदल गई। 

जामिया ही नहीं, अलीगढ़ में भी शासन ने शायद यह संदेश देने की कोशिश की थी कि कभी भी हिंदुओं को निशाना नहीं बनाया जाएगा, लेकिन यह सांप्रदायिक रणनीति नाकाम हो गई। 15 दिसंबर के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों में सभी धर्म के लोगों ने भाग लिया। अधिकांश सभाओं में सभी का समावेश दिखा। विशिष्ट बहुलतावाद पोस्टरों पर दिखने लगा। पोस्टरों में हर जगह गांधी, आंबेडकर, भगत सिंह व अन्य महापुरुष थे और राष्ट्रीय ध्वज भी हर जगह लहरा रहा था। मैं खुद बेंगलुरु में तीन विरोध सभाओं में शामिल हुआ। वहां सभी बिल्कुल शांत थे। हर उम्र, हर धर्म, हर व्यवसाय के स्त्री-पुरुष मौजूद थे। वहां एक समूह छात्रों का भी था। पूर्वाेत्तर के भी कई प्रतिनिधि थे। एक राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के भी प्रतिनिधि वहां थे। मैंने हिरासत में कई घंटे बिताए, पर वहां न मेरी किसी कांग्रेसी से मुलाकात हुई, न किसी को मैंने देखा।  

आज जब हम नए साल में प्रवेश कर चुके हैं, तो लगता है कि यहां मानो बहुसंख्यकों का सशक्तीकरण किया जा रहा है, ताकि मुस्लिमों और असहमत लोगों को डरा दिया जाए। एक दूसरी राह जामिया, बेंगलुरु और मुंबई इत्यादि दिखा रहे हैं। यह घाव पर मरहम लगाने, नफरत और पूर्वाग्रहों को दूर करने की राह है। यह उन बहुलतावादी सिद्धांतों की बहाली और पुनर्वास करने की राह है, जिन पर इस गणतंत्र की स्थापना हुई थी।

महात्मा गांधी के हवाले से ही मैंने शुरू किया था और वैसे ही समाप्त करने दीजिए। जामिया के पहले चांसलर अजमल खान को श्रद्धांजलि देते हुए गांधी ने टिप्पणी की थी, मेरे लिए हकीम जी की मृत्यु एक महान व्यक्तिगत क्षति है। मैं खुद को पूरी तरह से डॉक्टर एमए अंसारी और अन्य नेताओं की अपील के साथ जोड़ता हूं। बहुत नजाकत के साथ हकीम जी ने राष्ट्रीय मुस्लिम विश्वविद्यालय को संभाल रखा था, देशभक्त भारतीय इस पर किसी भी तरह से वित्तीय जोखिम नहीं आने देंगे। निश्चय ही, जामिया एक महान देशभक्त की स्मृति में खड़ा सबसे अच्छा स्मारक होगा और हिंदुओं, मुसलमानों और भारत में रहने वाले अन्य समुदायों के बीच अटूट एकता लाएगा। 

(साई फीचर्स)

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