महंगाई डायन खाय जात है . . . कैसे रोकें मंहगाई को!

(लिमटी खरे)

देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है। इस व्यवस्था के तहत जो भी सत्ता पर काबिज होता है वह रियाया के दुखदर्द की दिशा में अपनी आंखें पूरी तरह बंद किए हुए ही दिखता है। विपक्ष में बैठे लोग जनता के हिमायती बनते दिखते हैं। सत्ता में जब कांग्रेस रहती है तो मंहगाई के मामले में विपक्ष में बैठी भाजपा आसमान सर पर उठा लेती है, पर जब भाजपा सत्ता में आती है तो उसे महंगाई दिखाई नहीं देती है और विपक्ष में बैठी कांग्रेस के द्वारा जनता को राहत दिलाए जाने की मांग की जाती है। इस सबके बीच लोग यह भूल जाते हैं कि महंगाई पर अंकुश लगाने की मूल जवाबदेही सरकार में बैठे लोगों की है। विपक्ष को संसद में इस बारे में वजनदारी के साथ प्रश्न करने चाहिए कि सरकार के द्वारा मंहगाई को थामने, उसे कम करने की दिशा में क्या प्रयास किए जा रहे हैं। विडम्बना ही कही जाएगी कि इस मामले में सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी दिखाती है और विपक्ष सब कुछ जानते बूझते हुए भी खामोश ही रह जाता है।

देश में मंहगाई का ग्राफ साल दर साल ऊपर उठता जा रहा है। एक समय था जब दस पांच पैसों के सिक्कों की कीमत होती थी, अब तो सिक्कों को कोई पूछ ही नहीं रहा है। पचास रूपए का नोट भी अब बहुत छोटा माना जाने लगा है। अगर आप घर से बाहर निकलते हैं तो शाम तक पांच सौ रूपए खर्च होना आम बात है। इसका कारण यह है कि हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। रोजगार के साधनों का अभाव किसी से छिपा नहीं है। नौकरियां गायब होती जा रही हैं। दुकानदारों की आय भी पहले की तुलना में बहुत ही कम हो चुकी है। इन परिस्थितियों में मंहगाई से आम जनता कैसे निपटे यह बड़ा प्रश्न खड़ा हुआ है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के राष्ट्रीय सांख्यिकी संगठन (एनएसओ) ने औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े जारी किए हैं। इन्हें देखने के बाद यही लग रहा है कि सरकारों के द्वारा औद्योगिक उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में मार्ग प्रशस्त नहीं किए हैं। भले ही इसमें 0.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है पर आंकड़े चिंताजनक माने जा सकते हैं। इस साल जनवरी में ही मंहगाई का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। सब्जी, किराना, तेल आदि हर चीज के दाम आसमान छू रहे हैं। हाल ही में बिना सब्सीडी वाली रसोई गैस के दामों में डेढ़ सौ रूपए की बढ़ोत्तरी कर दी गई है। अब तक की यह सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी मानी जा रही है।

बरसात के मौसम में प्याज ने लोगों को जमकर रूलाया। इसी बीच टमाटर के दामों में आग लगी। रोजमर्रा की जरूरतो की सामग्री दिनों दिन मंहगी होने से जनता के अंदर रोष और असंतोष पनपना स्वाभाविक है। विपक्ष के घड़ियाली आंसू भी जनता के रिसते घावों पर मरहम लगाने में सक्षम नहीं दिख रहे हैं। जनता आज खून के आंसू रो रही है यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा इस पर चिंता जताई जा रही है। उसके द्वारा नीतिगत दरों में कटौति इसलिए नहीं की गई कि कहीं उससे महंगाई में कहीं आग न लग जाए। जिस तरह से महंगाई बढ़ रही है उसे देखकर तो यही लग रहा है कि सरकार भी इसके सामने बेबस ही नजर आ रही है।

एनएसओ के आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो जनवरी में महंगाई दर 7.59 फीसदी थी, जबकि 2019 के दिसंबर माह में यह 7.35 फीसदी थी। जबकि इसके पहले वाले साल अर्थात 2018 के दिसंबर में यह आंकड़ा महज 1.97 फीसदी था। आंकड़ों को देखें तो यह साफ हो जाता है कि एक साल में ही यह दर 5.38 फीसदी तक बढ़ी है जो चिंता के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है। इसी तरह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों पर अगर गौर करें तो साफ होता है कि थोक मुद्रा स्फीति जो जनवरी में 3.1 फीसदी थी वह दिसंबर 2019 में 2.59 फीसदी थी। ये आंकड़े हैं जिन पर चर्चा की फुर्सत न तो सरकार को है और न ही विपक्ष में बैठे दलों को।

देखा जाए तो विपक्ष को मंहगाई के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए इस तरह के आंकड़ों के जरिए देश व्यापी बहस आरंभ कराना चाहिए। विपक्ष को संसद में हुक्मरानों से यह पूछना चाहिए कि सरकार मंहगाई को रोकने के लिए किस तरह के प्रयास कर रही है। मंत्रियों के द्वारा हजारों की तादाद में नौकरियां लाने की बात कही जाती है पर जमीनी स्तर पर बेरोजगारों की तादाद देखकर लगता है कि सरकारों के द्वारा कोरी बयानबाजी ही की जा रही है। और तो और नौकरियां आ तो नही रहीं हैं, वरन लोगों की नौकरियां जा जरूर रहीं हैं। आज आम आदमी के पास उसकी जरूरत के हिसाब से पैसे तक नहीं रह गए हैं। लोगों के पास उनकी जरूरत के हिसाब से पैसे ही नहीं होगें तो मंहगाई के आंकड़ों का जनता अचार डालने से तो रही। (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *