वर्षभर चलेगा चुनावों का सिलसिला

 

थमेगी विकास कार्यों की गति

(ब्यूरो कार्यालय)

भोपाल (साई)। प्रदेश में अप्रैल – मई से फिर चुनावों का सिलसिला आरंभ हो जायेगा, जो सालभर चल सकता है। सबसे पहले त्रिस्तरीय पंचायत राज (जिला, जनपद और पंचायत) संस्थाओं के चुनाव कराने की तैयारी है।

इसी बीच जौरा और आगर विधानसभा के उपचुनाव भी संभावित हैं। अक्टूबर में नगरीय निकाय चुनाव कराया जाना प्रस्तावित है। वहीं, सहकारी समितियों के चुनाव फरवरी 2018 से नहीं हुए हैं तो कृषि उपज मण्डियों के चुनाव भी लंबित हैं। बताया जा रहा है कि इन चुनावों के मद्देनज़र जो आदर्श आचरण संहिता लागू होगी, उससे संबंधित क्षेत्रों में न सिर्फ कामों की गति रुकेगी बल्कि नये काम भी नहीं होंगे।

सूत्रों के मुताबिक सरकार ने अब चुनाव मैदान में उतरने की तैयारी कर ली है। सबसे पहले अप्रैल, मई में 52 जिला पंचायत, 313 जनपद पंचायत और 23 हजार 922 पंचायतों के चुनाव कराये जायेंगे। जिला पंचायत अध्यक्ष को छोड़कर बाकी पदों के लिये आरक्षण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।

वहीं, जौरा से काँग्रेस विधायक बनवारी लाल शर्मा और आगर से भाजपा विधायक मनोहर ऊंटवाल के निधन से रिक्त सीटों के उप चुनाव भी चुनाव आयोग मई में करा सकता है। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय अपने स्तर पर सभी जानकारियां आयोग को भेज चुका है।

उधर, 16 नगर निगम, 98 नगर पालिका और 294 नगर परिषद के चुनाव अक्टूबर में कराने पर अनौपचारिक कैबिनेट में सहमति बनी है। दरअसल, मंत्री चाहते हैं कि इस दौरान शहरों में कुछ ऐसे काम करा दिये जायें जो दिखायी दें और यह संदेश जाये कि काम हो रहे हैं। अभी वित्तीय संकट की वजह से कामों की गति बेहद धीमी है।

सवा चार हजार से ज्यादा प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति और ढाई सौ से ज्यादा कृषि उपज मण्डियों के चुनाव भी काफी समय से लंबित हैं। फिलहाल यहाँ प्रशासकों के माध्यम से सामान्य काम चलाया जा रहा है लेकिन नीतिगत निर्णय प्रभावित हो रहे हैं। दोनों चुनाव अधिनियम के अधीन आते हैं, इसलिये इन्हें अधिक समय तक टाला भी नहीं जा सकता है।

सभी चुनाव को लेकर अपनी अपनी आदर्श आचरण संहिताएं हैं। इनके मुताबिक चुनाव की घोषणा से प्रक्रिया पूरी होने तक कोई भी नये काम न तो स्वीकृत किया जा सकता है और न ही घोषणा हो सकती है। ऐसे काम जो आरंभ नहीं हुए हैं और चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं, आमतौर पर उनका क्रियान्वयन भी रोक दिया जाता है। इसके मद्देनज़र यह संभावना जतायी जा रही है कि अप्रैल से सालभर प्रदेश में कामों की गति धीमी रहेगी।

लगातार टल रहे हैं चुनाव : प्रदेश में सवा चार हजार प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियां हैं। इनके चुनाव फरवरी 2018 से लंबित हैं। तत्कालीन शिवराज सरकार नहीं चाहती थी कि विधान सभा चुनाव के पहले कोई और चुनाव हो क्योंकि इससे आंतरिक समीकरण गड़बड़ाते हैं और यदि हार होती है तो माहौल भी खिलाफ बनता है। हालांकि, समितियों के चुनाव गैर दलीय आधार पर होते हैं लेकिन राजनीतिक दलों का पूरा दखल रहता है।

यही वजह है कि चुनाव कराने की जगह पहले समितियों के अध्यक्ष व उपाध्यक्षों को प्रशासक बनाया गया और फिर सहकारिता अधिकारियों को प्रशासक की जिम्मेदारी सौंप दी गयी। कमल नाथ सरकार आने के बाद से भी यही व्यवस्था चली आ रही है। सूत्रों का कहना है कि कर्जमाफी की प्रक्रिया चलने की वजह से अभी चुनाव और टल सकते हैं क्योंकि किसानों ने कर्ज माफी होने की वजह से फिलहाल कर्ज अदायगी नहीं की है।

कर्ज जब तक अदा नहीं हो जाता है किसान डिफाल्टर की श्रेणी में रहेंगे और वे चुनाव लड़ने अपात्र माने जायेंगे। उधर, मण्डियों के चुनाव भी शिवराज सरकार ने रोककर रखे थे। छः-छः माह करके एक साल तक मण्डी समितियों का कार्यकाल बढ़ाया जाता रहा और फिर प्रशासक नियुक्त कर दिये गये। बताया जा रहा है कि इस साल चुनाव करा लिये जायेंगे। यह चुनाव भी गैर दलीय आधार पर होते हैं लेकिन राजनीतिक दखल पूरा रहता है।