सरकार उदासीन, शीर्ष अदालत ने फिर दिए निर्देश!

(लिमटी खरे)

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) के विरोध में शाहीन बाग में लगभग दो माह से धरना जारी है। दिल्ली चुनावों के दौरान इस धरने को मीडिया ने भी जमकर कव्हरेज दिया, किन्तु जैसे ही चुनाव समाप्त हुए उसके बाद मीडिया की सुर्खियों से यह मामला गायब हो गया। सरकार के कथित नकारात्मक और उदासीनात्मक रूख के चलते शीर्ष अदालत को एक बार फिर जनता से जुड़े मामले में निर्देश देने पर मजबूर होना पड़ा है। शीर्ष अदालत ने प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला, वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन को मध्यस्त की भूमिका निभाने की जवाबदेही दी है। एक सप्ताह में ये मध्यस्थ प्रदर्शन कर रहे लोगों से मिलकर प्रदर्शन स्थल बदलवाने के लिए उन्हें राजी करेंगे।

अदालत के द्वारा यह भी साफ किया गया है कि किसी भी कानून के खिलाफ धरना या प्रदर्शन करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है, किन्तु इसके लिए सड़क को बाधित करना उचित नहीं है। जाहिर है लोकतंत्र विचारों की अभिव्यक्ति से चलता है और विचारों की अभिव्यक्ति की कुछ सीमाएं निर्धारित हैं। अदालत ने सरकार को भी आड़े हाथों लिया है। शीर्ष अदालत ने सरकार को लगभग फटकारते हुए कहा कि सरकार के द्वारा इस प्रदर्शन को समाप्त करने की अब तक कोशिश क्यों नहीं की गई!

यहां यह बताना लाजिमी होगा कि शाहीन बाग में चल रहे धरना प्रदर्शन के चलते दो माहों से दिल्ली और नोएडा को जोड़ने वाला एक मार्ग बंद है, जिससे दिल्ली एवं एनसीआर के फरीदाबाद से नोएडा को जोड़ने वाला यह मार्ग बंद होने से यहां से होकर गुजरने वालों को बहुत ही लंबा चक्कर काटकर आना जाना पड़ रहा है। दूरी बढ़ने से छोटे व्यापारियों सहित अनेक नागरिकों को जिस असुविधा का सामना करना पड़ रहा है वह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है।

दो माहों से चल रहे धरने के बाद भी सरकार के अब तक के रूख को देखकर तो यही लग रह है कि इस धरने की सरकार ज्यादा परवाह नहीं ही कर रही है। दिल्ली चुनाव तक यह माना जा रहा था कि सरकार का नरम रवैया हो सकता है, किन्तु चुनाव संपन्न होने के बाद भी जिस तरह से सरकार इस मामले में निष्क्रिय है उसे देखकर तो यही लग रहा है सरकार इस मामले में झुकने को कतई तैयार नहीं है।

शाहीन बाग के इस धरने का राजनैतिक लाभ सियासी पार्टियों ने दिल्ली चुनाव में लेने का प्रयास किया गया। धरना स्थल पर विभिन्न दलों के नुमाईंदे भी गए, उनका समर्थन भी किया। पर किसी को इसका लाभ शायद इसलिए नहीं मिल पाया क्योंकि धरना बिना नेतृत्व के ही चल रहा था। धरने को भुनाने के प्रयास भी नेताओं के द्वारा जमकर किए गए। धरना दे रहे लोगो को देशद्रोही और न जाने क्या क्या कहा गया।

कहा तो यहां तक भी जा रहा है कि इस धरने के पीछे जिस कुटिल सियासी दिमाग को रखा गया था, उसके जरिए इस धरने का उद्देश्य पूरा कर लिया गया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार पूरे बहुमत में आई है। भाजपा की सीटें बढ़ी तो हैं पर उसे वैसा लाभ नहीं मिल पाया जैसी कि उम्मीद की जा रही थी।

इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह बार बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि धार 370, तीन तलाक, सीएए पर सरकार अपने कदम वापिस नहीं लेगी। सरकार के रूख को अगर अनशनकारी भांप जाते और अमित शाह के द्वारा बातचीत की पेशकश को स्वीकार कर लेते तो आज परिदृश्य कुछ और हो सकता था। इस पूरे धरने में एक बात साफ तौर पर उभरकर आई है कि इस धरने में अगुआई करने वाला कोई भी अब तक सामने नहीं आया है।

जाहिर है यह धरना स्वप्रेरणा से तो चल रहा है पर इसमें नेतृत्व नहीं होने से सरकार के सामने भी यह समस्या दिखाई दे रही है कि वह बात करे तो आखिर किससे! अब तक जैसी परंपराएं चली आईं हैं उनके अनुसार सरकार या प्रशासन कभी भी भीड़ से जाकर बात नहीं किया करते। बातचीत के लिए नेतृत्व करने वाले कुछ लोगों का दल सरकार से बातचीत करता है। अमित शाह शायद इस बात को भांप चुके थे कि अनशन करने वालों का नेता कोई नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी ओर से एक बात कहकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी कि अगर कोई चाहे तो वे तीन दिन के अंदर उनसे मिलने का समय दे देंगे।

इधर, आंदोलन कर रहे लोगों की शिकायत है कि उनसे बातचीत के लिए सरकार तैयार नही है। सरकार की ओर से भी अभी तक कोई नुमाईंदा सामने नहीं आया है। जबकि सरकार चाहती तो इस धरने के आरंभ में ही प्रदर्शन कर रहे लोगों के साथ बातचीत का रास्ता अपनाकर इसे समाप्त करवा सकती थी।

सरकार अगर चाहती तो अनशनकारियों को सरकार और आंदोलनकारियों की सीमाओं से आवगत कराती। इसके बाद बातचीत के जरिए बीच का रास्ता निकालने का प्रयास किया जाता। अनशन करने वालों की बात सुनी जातीं, इसके बाद आपसी सहमति से इसे समाप्त करने की दिशा में हल निकाले जाते, पर ऐसा कुछ होता नहीं दिखा।

दो माहों से दिल्ली का एक रास्ता बंद पड़ा हुआ है और दिल्ली में बैठी प्रदेश और केंद्र सरकार इस मामले में पूरी तरह गैर जिम्मेदाराना रवैया अख्तियार किए हुए है। सरकारों के इस रूख को किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता है। नगारिको को परेशानी न हो, उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलती रहें इस बात की जवाबदेही सरकारों की होती है। देखा जाए तो सरकारों को नागरिकों के अभिभावक के रूप में देखा जाता है।

दिल्ली चुनावों के बाद धरने की धार पहले जैसी नहीं रह गई है। अब धरना समाप्त किया जा सकता है, पर इसके लिए सरकार से बातचीत कर सम्मान जनक तरीके से हल अगर निकाला जाए तो इसकी इज्जत बचाई जा सकती है अन्यथा भविष्य में इस धरने का उदहारण दिया जाकर अन्य मामलों में सरकारी नीतियों का विरोध करने के मामलों को बोथरा भी किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत के द्वारा भी धरना समाप्त करने के लिए सरकार से बातचीत की बात नही कही गई है। अदालत ने भी धरना स्थल कहीं ओर ले जाकर सड़क को खुलवाने की बात कही है। शीर्ष अदालत के द्वारा मध्यस्थों के जरिए धरना स्थल बदले जाने के प्रयास किए जा सकते हैं, पर केंद्र सरकार के द्वारा अब तक धरना समाप्त करने की दिशा में किसी तरह की पहल नहीं की गई है। अब सरकार को चाहिए कि वह अपनी ओर से भी मध्यस्थ नियुक्त कर इस पूरे विवाद का हल निकलवाने का प्रयास करे, जिसकी गुंजाईश कम ही दिख रही है। सरकार के लिए एक बार फिर अपनी कार्यप्रणाली पर विचार करने की जरूरत इसलिए है क्योंकि एक के बाद एक कर अदालतों के द्वारा ही नागरिकों की बात को सुना जाकर दिशा निर्देश जारी किए जा रहे हैं, जो मूलतः सरकार के दायित्वों में शामिल है। (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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