निर्भया केस में उभरीं कानून की कमजोरियां

 

(राजेश चौधरी) 

पूरे देश की नजरें आज निर्भया केस पर टिकी हैं। हर कोई जानना चाहता है कि गुनहगारों को फांसी कब होगी? जिस तरह से उनकी सजा बार-बार टल रही है, उससे लोगों के मन में कई तरह की आशंकाएं पैदा हो रही हैं। दरअसल यह मामला हमारे सिस्टम के लिए एक टेस्ट केस बन गया है। यह जैसे-जैसे आगे बढ़ा, कानून की तमाम पेचीदगियां सामने आने लगीं। आजादी के 60-70 साल बाद महसूस किया गया कि ऐसे जघन्य मामलों में हमारा कानून कितना बेबस है। दोषियों ने 16 दिसंबर 2012 की रात करीब 9 बजे निर्भया से चलती बस में गैंग रेप किया और तमाम दरिंदगी की। बाद में निर्भया ने अस्पताल में दम तोड़ दिया। उसके बाद देश में लोगों का जबर्दस्त गुस्सा फूटा। लेकिन मुजरिम अभी तक फांसी के तख्त पर नहीं पहुंच पाए हैं क्योंकि कानूनी उपचार अभी बाकी हैं।

निर्भया के गुनहगारों के खिलाफ गैंग रेप और मर्डर का केस दर्ज किया गया। तब के कानून के अनुसार रेप में अधिकतम उम्रकैद की सजा का प्रावधान था। फिर केंद्र सरकार ने रेप लॉ में बदलाव किए और रेप को नए सिरे से परिभाषित किया गया। बलात्कार के कारण विक्टिम मरणासन्न अवस्था में पहुंच जाए तो फांसी की सजा का प्रावधान किया गया, साथ ही कहा गया कि गैंग रेप में अधिकतम ताउम्र जेल होगी। साथ ही दूसरी बार रेप के लिए फांसी का प्रावधान किया गया। इसी केस के बाद जूवनाइल जस्टिस (जेजे) एक्ट भी बदलाव हुए क्योंकि उसमें कानूनी गैप महसूस हुआ। दरअसल निर्भया केस का एक अपराधी अवयस्क था और जेजे एक्ट में प्रावधान था कि अपराध चाहे कितना भी भयानक हो, 18 साल से कम उम्र के आरोपी को जेल नहीं भेजा जा सकता, उसे तीन साल सुधार गृह में रखा जा सकता है। इस केस के बाद जेजे एक्ट में प्रावधान किया गया कि अगर नाबालिग की उम्र 16 साल से 18 साल के बीच हो और उसने जघन्य अपराध किया हो तो मामले में उसका केस सेशन कोर्ट में चलाया जा सकता है।

निर्भया केस की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक का गठन किया गया और 9 महीने के भीतर फांसी की सजा सुना दी गई। मामला हाई कोर्ट पहुंचा तो वहां भी गुनहगारों की अर्जी छह महीने में खारिज हो गई। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में 15 मार्च 2014 को ही अर्जी दाखिल कर दी गई। लेकिन वहां दो साल तक मामला पेंडिंग रहा। इस दौरान अभियोजन पक्ष यानी दिल्ली पुलिस की ओर से जल्द सुनवाई के लिए गुहार लगाई जानी चाहिए थी लेकिन वह गुहार आखिर में निर्भया के पिता की ओर से लगाई गई। 4 अप्रैल 2016 से सुनवाई शुरू हुई। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2017 को चारों गुनहगारों की फांसी की सजा बरकरार रखी और अर्जी खारिज कर दी। 9 जुलाई 2018 को तीन की रिव्यू पिटिशन भी खारिज कर दी गई। लेकिन फिर भी मामला कानूनी दांव-पेच में उलझा रहा।

रिव्यू खारिज होने के बाद किसी भी मुजरिम ने डेढ़ साल तक न तो क्यूरेटिव पिटिशन दाखिल की और न ही मर्सी पिटिशन। फिर निर्भया के पैरेंट्स ने निचली अदालत में अर्जी दाखिल कर गुहार लगाई कि गुनहगारों को फांसी आखिर कब होगी, तो अदालत ने जेल अथॉरिटी से जवाब दाखिल करने को कहा। इसी दौरान जेल अथॉरिटी ने नवंबर 2019 में मुजरिमों को सात दिन का अल्टीमेटम दिया कि उन्हें जो भी कानूनी उपचार करना है वे कर लें। जबकि रिव्यू पिटिशन खारिज होने के बाद ही उनसे कहा जाना चाहिए था कि उनके पास जो भी कानूनी उपचार बचा हुआ है उसका इस्तेमाल वे सात दिन में कर लें। सवाल उठा कि आखिर क्यूरेटिव और मर्सी पिटिशन दायर करने की समय सीमा क्यों नहीं है। मौजूदा कानूनी प्रावधान के मुताबिक क्यूरेटिव पिटिशन और दया याचिका दायर करने के लिए कोई समय सीमा नहीं है। यही कारण है कि अभी तक इस मामले में क्यूरेटिव पिटिशन और दया याचिका का ऑप्शन बचा हुआ था।

एक मुजरिम के पास यह कानूनी विकल्प अभी भी बचा हुआ है। मौजूदा मामले में देरी इसी कारण हुई और फिर सरकार ने इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। होम मिनिस्ट्री ने अर्जी दाखिल कर गाइडलाइंस में बदलाव की गुहार लगाई है और कहा है कि क्यूरेटिव पिटिशन और मर्सी पिटिशन दाखिल करने की समय सीमा तय होनी चाहिए। सरकार का कहना है कि रेप, आतंकवाद और मर्डर जैसे कई अपराध देश में हुए हैं जिस कारण लोग सकते में हैं। समय की मांग है कि विक्टिम परिवार और देश के व्यापक हितों को ध्यान में रखकर गाइडलाइंस जारी हों। निर्भया केस में पहली बार सवाल उठा कि क्या मुजरिमों को एक साथ फांसी दिया जाना अनिवार्य है या फिर अलग-अलग फांसी हो सकती है? एक फरवरी को चारों को फांसी पर लटकाए जाने का आदेश दिया गया था। लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। इसी दौरान विनय की ओर से दया याचिका दायर कर दी गई, फिर अक्षय की ओर से भी दया याचिका दायर की गई।

दलील दी गई कि प्रिजन रूल कहता है कि जब तक किसी एक भी मुजरिम का अर्जी या आवेदन पेंडिंग हो तब तक किसी भी मुजरिम को फांसी नहीं हो सकती। केंद्र सरकार लगातार कह रही है कि मुजरिमों को अलग-अलग फांसी पर लटकाया जा सकता है। इस मामले में जो मौजूदा कानून है, उसकी व्याख्या के लिए केंद्र गुहार लगा रहा है। तमाम सवालों पर अभी सुप्रीम व्याख्या होनी बाकी है। उम्मीद करें कि निर्भया केस में आखिरी इंसाफ जल्द ही होगा, लेकिन इस टेस्ट केस ने कानून में जो कमियां उजागर की हैं उन्हें दूर करने की जरूरत है ताकि आने वाले दिनों में विक्टिम और समाज को समय से इंसाफ मिल सके।

(साई फीचर्स)

 

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