अपने अर्थ को पूर्ण करने भगवान श्रीकृष्ण ने लिया था जन्म

 

 

निर्विकल्प स्वरूप महाराज के श्रीमुख से जारी है भागवत कथा

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। ब्रह्म की कोई सीमा नहीं है। ब्रह्म सभी काल में है और सभी काल से परे हैं। परमात्मा किसी प्रकार से सीमित नहीं है। ब्रह्म में सजातीय भेद नहीं है।

इस आशय की बात बरघाट रोड रेलवे फाटक के समीप लॉन में जारी श्रीमद भागवत कथा महोत्सव में कथा वाचक शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती महाराज के शिष्य गीता मनीषी महाराज के शिष्य गीता मनीषी ब्रह्मचारी निर्विकल्प स्वरूप ने श्रद्धालुजनों से कथा के दूसरे दिन कही।

उन्होंने आगे कहा कि परमात्मा में सुगद भेद, सजातीय, विजातीय भेद नहीं है। ऐसे परम सत्य का ध्यान करना चाहिये। परमात्मा कैसा है यह बताते हुए उन्होंने कहा कि जिसके द्वारा इस जगत की उत्पति स्थिति, संवहन होता है। जागृत अवस्था, स्वप्न अवस्था जब हमारी इंद्रियां सो गयी और मन जागता है। मन ही सब जगह घूमता रहता है। सुसुप्त अवस्था जहाँ किसी प्रकार की न कामना करता है न ही किसी प्रकार का स्वप्न देखता है, गहरी नींद।

उन्होंने कहा कि परमात्मा सभी को प्रकाशित करता है। स्वयं प्रकाश है परमात्मा। परम सत्य ही श्रीकृष्ण भगवान हैं। कृष्ण गोकुल में अपने अर्थ को पूर्ण करने आये थे। ग्वालबालों, गोपियों, यशोदा माता, नंदबाबा सभी को सुख देने के लिये श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। सब कुछ कृष्णमय है। भगवान की लीलाएं समझना कठिन है।

महाराजश्री ने कहा कि भगवान की लीला में ब्रह्माजी, इंद्र मोहित हो गये। एक बार श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ भोजन कर रहे थे तब एक दूसरे को झूठा खा खिला रहे थे। ब्रह्माजी ने देखा कि भगवान झूठा खा रहे हैं ये कैसा परमात्मा है। यह बात जमी नहीं। ब्रह्मा ने ग्वालबालों का अपहरण कर ब्रह्म गुफा में छुपा दिया। भगवान को जब पता चला कि ब्रह्मा ने ग्वालबालों को उठा लिये हैं तो भगवान ही सभी रूपों में प्रकट हो गये।

उन्होंने आगे बताया कि स्वयं ही ग्वालबाल बन गये, छड़ी बन गये, कम्बल, बछड़े बन गये। एक साल तक यह लीला चलती रही। ब्रह्माजी ने जब आकर देखा तो वे चकित हो गये। जहाँ उन्होंने छुपाया था वहाँ भी ग्वालबाल नज़र आये, सभी जगह देख चकित हो गये। भगवान की शरण में जाने पर पता चला कि सब कुछ कृष्णमय है। भगवान की लीलाओं में जब ब्रह्मा मोहित हो गये तो दूसरों की क्या बात है।