अदालतें न हों तो क्या होगा देश का . . .

(लिमटी खरे)

एक सवाल मन में कौंधना स्वाभाविक ही है कि अगर देश में अदालतें न हों तो क्या होगा! इसका कारण यह है कि सरकारों के द्वारा लोगों के हितों की अनदेखी इस कदर की जाती है कि अदालतों को इसमें हस्ताक्षेप करना पड़ रहा है। मामला चाहे जो भी हो पर यह विचारणीय प्रश्न अवश्य ही बन चुका है। भारतीय सेना में महिलाओं को स्थाई कमीशन देने का फैसला दिया गया है, जिसका चहुंओर स्वागत किया जा रहा है। कहने को तो देश में महिलाओं को पुरूषों की बराबरी का दर्जा दिया गया है, पर वास्तव में सोच इससे उलट ही दिखती है। पुरूष आज भी महिलाओं से आदेश लेने को अपनी शान के खिलाफ ही समझा जाता है। इस फैसले के बाद थलसेना में परिदृश्य बदला बदला दिख सकता है। इसके पहले वायुसेना और नौसेना में महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन के विकल्प काफी पहले से खुले रखे गए थे।

इक्कसवीं सदी का दूसरा दशक समाप्त होने को आ रहा है। विजन 2020 में भी अगर हम बाबा आदम के जमाने की सोच रखें तो निश्चित तौर पर यह उचित नहीं माना जा सकता है। आज के दौर में महिलाओं ने अपनी वजनदारी उपस्थिति दर्ज कराई है। महिलाएं चौका चूल्हा संभालने के साथ ही पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती नजर आती हैं। सरकारी और निजि क्षेत्र में भी महिलाओं के द्वारा किए जाने वाले कामों को सराहना मिलती आई है।

बात अगर सेना की हो तो सेना में महिलाओं को दिए जाने वाले दायित्वों का निर्वहन उनके द्वारा पूरी ईमानदारी से किया जाता रह है। इसके बाद भी थल सेना में महिला अधिकारियों को स्थाई कमीशन से वंचित रखने से उनका मनोबल भी कम होता दिख रहा था। अब शीर्ष अदालत के फैसले के बाद उम्मीद है कि सब कुछ पटरी पर लौट सकेगा।

शीर्ष अदालत के द्वारा दो टूक शब्दों में कहा है कि शार्ट सर्विस कमीशन के तहत आने वाली महिलाओं को स्थायी कमीशन दिया जाना चाहिए। यद्यपि युद्ध की स्थितियों में मोर्चे पर भेजने की बात को अदालत के द्वारा सरकार और सेना के विवेक पर ही छोड़ दिया गया है।

इस मामले में केंद्र सरकार के द्वारा यह दलील दी गई थी कि सेना में अधिकांश जवान ग्रामीण परिवेश से आते हैं और महिला अधिकारियों से आदेश लेना उनके लिए असहज हो जाएगा। इसके अलावा सरकार का कहना यह भी था कि महिलाओं की शारीरिक बनावट और पारिवारिक, सामाजिक दायित्व उनके कमांडिंग आफीसर बनने में बाधक साबित हो सकते हैं। कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। सरकार शायद यह भूल गई कि देश के अनेक जिलों में पुलिस अधीक्षक जैसे कमांडिंग आफीसर के पद पर महिलाएं पदस्थ हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री जैसे पदों पर भी महिलाओं ने पदस्थ रहकर अपने आप को साबित किया है कि वे किसी से कम नहीं हैं।

एक तरफ तो केंद्र सरकारों के द्वारा महिलाओं को आगे लाने के लिए उनके हित में विभिन्न क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था की गई है, पर जब बात सेना की आती है तो सरकार यू टर्न लेकर बाबा आदम के जमाने वाली सोच के साथ खड़ी दिखाई देती है जो पूरी तरह गलत ही मानी जा सकती है।

अभी जिस तरह की व्यवस्था लागू थी उसके चलते सेना में महिलाएं बहुत ही दुविधा में होती थीं। उन्हें यह पता नहीं होता था कि 14 साल की सेवा देने के बाद उन्हें अपनी बराबरी वाले पुरूष अधिकारियों की तरह मौके मिलेंगे अथवा नहीं! इसी के चलते महिलाएं शार्ट सर्विस कमीशन की मियाद पूरी होने के पहले ही अपने लिए रोजगार का दूसरा रास्ता भी खोजने लग जाती थीं।

अभी तक सेना में महिलाओं के द्वारा अशांत क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दी जाती हैं। पेरामिलिट्री फोर्सेस में भी महिलओं की शानदार भूमिकाओं के लिए उन्हें अनेकों बार सराहना भी मिली है। अभी तक थल सेना में आर्मड, आर्टिलरी और इन्फेंटरी को छोड़कर हर जगह पर महिलाओं को बराबरी से भागीदार बनाया जाता है। तपता रेगिस्तान हो, अपेक्षाकृत ठण्डे प्रदेश या बारिश के दौरान जंगलों की खाक छानने जैसे अभ्यास, हर जगह महिलाओं को पुरूषों के साथ ही रखकर अभ्यास कराए जाते हैं। यह बताने का तातपर्य महज इतना ही है कि महिलाओं में जब वे सारे गुण मौजूद हैं जो पुरूषों में हैं तब उन्हें किस आधार पर सेना में स्थाई कमीशन के अधिकार से वंचित रखा जाता रहा है!

लंबे समय से महिलाओं के द्वारा पुरूषों के बराबर खड़े होने के लिए संघर्ष किया जा रहा है। महिलाओं के लिए स्थानीय निकायो में तो आरक्षण है पर विधान सभा या लोकसभा सीट के लिए आरक्षण नहीं है। यहां भेदभाव साफ तौर पर दिखाई देता है। आजादी के पहले महिलाओं की क्या स्थिति थी इस बारे में इतिहास खंगालने पर अनेक बातें सामने आ सकती हैं। महिलाओं को बच्चे पैदा करने, घर संभालने और खाना बनाने के लिए ही समझा जाता था। अब समय बदल चुका है। धीरे धीरे परंपराएं और व्यवस्थाएं भी बदलीं। अब महिलाएं घरों की दहलीज लांघकर परिवार में मुखिया की भूमिका में भी दिखती हैं।

शीर्ष अदालत के फैसले से निश्चित तौर पर भेदभाव वाली परंपरा को काफी हद तक रोका जा सकता है। देखा जाए तो इस काम के लिए महिलाओं के अदालत का दरवाजा खटखटाने के पहले ही सरकार को इस मामले में कमोबेश इसी तरह का निर्णय दे दिया जाना चाहिए था। यह काम सरकार है, पर सरकारों की कथित अनदेखी के चलते इस काम को अदालत को करना पड़ रहा है। सरकार की सोच का एक नमूना यह भी है कि सरकार ने यहां तक दलीद दे डाली कि महिलाएं पुरूषों के मुकाबले शारीरिक रूप से भी कमजोर होती हैं। दरअसल, महिलाएं शारीरिक रूप से कमजोर नहीं होती हैं। होता यह है कि उनकी परवरिश के दौरान ही उन्हें यह बताया जाता है कि उन्हें किस तरह के मर्यादित आचरण को अंगीकार करना है। उनकी सीमाएं बचपन से ही निर्धारित कर दी जाती हैं, जिसके चलते साल दर साल की परवरिश के बाद वे पुरूषों के मुकाबले काफी हद तक कमजोर दिखाई देती हैं, क्योंकि पुरूषों की परवरिश में ज्यादा बंधन नहीं होते हैं।

भारतीय सेना में महिलाओं की हिस्सेदारी और उनके काम को देखते हुए उनकी क्षमताओं पर अगर केंद्र सरकार के द्वारा शक की नजरों से देखा जा रहा है तो यह निश्चित तौर पर महिलाओं और सेना का अपमान माना जा सकता है। इस तरह की सोच को सामंती सोच की संज्ञा अगर दी जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगा। इसे कुंठित मानसिकता से ज्यादा कुछ भी नहीं माना जा सकता है। अगर सरकार में बैठे लोग या अधिकारी कुंठित हैं तो इसकी कीमत भला स्त्रियां क्यों और कैसे चुकाएं!

कुल मिलाकर शीर्ष अदालत के द्वारा हाल ही में दिए गए फैसले से महिलाओं के सेना में स्थाई कमीशन का अधिकार मिल गया है। यह महिलाओं के भविष्य का एक स्वर्णिम दरवाजा था जो अब खुलता दिख रहा है। शीर्ष अदालत ने सौ टक्का सही बात कही है कि हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। सरकारों को सोचना होगा कि देश में लोगों के हक के लिए कब तक न्यायालय के दरवाजे खटखटाने होंगे, यह काम सरकारों का है, पर सरकारें इस तरह के काम में अनदेखी ही करती आई है। सरकार को अपना रवैया बदलना ही होगा।  (लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)