देशवासियों का मनोबल बढ़ा रहे नरेंद्र मोदी

लिमटी की लालटेन 89

(लिमटी खरे)

कोरोना कोविड 19 के संक्रमण की जद में दुनिया भर के अनेक देश हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। देश में कोरोना के संक्रमित मरीजों की तादाद तीस हजार से ज्यादा हो चुकी है। देश भर में टोटल लॉक डाउन अर्थात पूर्ण बंदी का दौर चालू है। लोग एक माह से अधिक समय से घरों पर हैं।

इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा समय समय पर देश को संबोधित किया जा रहा है। देश के लोगों का मनोबल जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा बढ़ाया जा रहा है वह तारीफे काबिल ही है। देशवासियों को इस समय इसी तरह के मनोबल बढ़ाने वाले चीजों की महती जरूरत है।

देखा जाए तो विपक्ष के नेताओं को भी विपदा की इस घड़ी में सरकार पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाए सरकार के कांधे से कांध मिलाकर देशवासियों को समझाने की जरूरत है। सोशल मीडिया पर अनेक सियासी दलों के छुटभैया नेताओं के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्रा मोदी के खिलाफ जिस तरह का विषवमन किया जा जा रहा है, यह उसके लिए माकूल समय नहीं है। सोशल मीडिया पर इस तरह से की जाने वाली टिप्पणियों से उन नेताओं की छवि अवश्य प्रभावित होती दिख रही ळै।

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा समय समय पर देश के लोगों को संबोतिधत करते हुए नपे तुले शब्दों में ही बहुत सारी बातें कहीं जा रहीं हैं, जिसकी जितनी तारीफ की जाए कम ही होगी। एक आंकलन के अनुसार देश में आजादी के बाद पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी तीसरे ऐसे प्रधानमंत्री होंगे जिन्हें लोग धेर्य, संयम के साथ सुन रहे हैं।

प्रधानमंत्री का यह कहना बहुत ही सटीक है कि देश इस समय पूरी दृढ़ता के साथ कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा है। देश का हर निवासी अपने अपने सामर्थय के हिसाब से जंग का सिपाही बना हुआ है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि यह जज्बा बना रहना चाहिए। देश के लोगों को प्रधानमंत्री की बात को अंगीकार करना चाहिए।

देखा जाए तो चिकित्सक हों, पेरामेडिकल स्टॉफ हो, पुलिस हो या प्रशासन, यहां तक कि मीडिया के कर्मी भी अपने अपने तौर तरीकों से इस युद्ध को लड़ते दिख रहे हैं। सभी के सहयोग से अब तक देश में महज तीस हजार संक्रमित मरीज मिलना और इसमें से बीस हजार के लगभग एक्टिव मरीज मिलना अपने आप में किसी उपलब्धि से कम नहीं है।

टोटल लॉक डाउन के बजाए अगर प्रधानमंत्री के द्वारा कर्फ्यू शब्द का प्रयोग किया गया होता तो ज्यादा उचित होगा। उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग के बजाए दो गज की दूरी जैसे शब्द का प्रयोग किया जो लोगों को समझने में बहुत आसान है। शुरूआती दौर में सेनेटाईजर से हाथ धोना या मास्क लगाना बहुत ही अटपटा लगा पर अब सभी की आदत में यह आ चुका है। लोग बार बार हाथ धो रहे हैं, जिससे उल्टी दस्त आदि जैसी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

देखा जाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जोर इस बात पर है कि कोरोना का संकट लंबा चलने वाला है। लिहाजा इससे लड़ने के लिए हमें जीवन शैली में आमूल बदलाव करना ही होगा। इधर, लॉकडाउन की एक सीमा है। आज नहीं तो कल उसे हटाना ही होगा क्योंकि उसकी वजह से जीवन यापन पर ही संकट आ सकता है। इसलिए प्रधानमंत्री देशवासियों को यह संदेश देना चाहते हैं कि लॉकडाउन हटने के बावजूद हमें कई बंदिशों के बीच रहना होगा और हम इन्हें पाबंदी मानने की बजाय जीवन पद्धति का हिस्सा मानें, इन्हें आत्मानुशासन का रूप दे दें।

इसके लिए केंद्र और सूबाई सरकारों को चाहिए कि वे अपने अपने जिलों के प्रशासन को इस बारे में पाबंद करें कि टोटल लॉक डाउन को हटाने के बाद नागरिकों को क्या क्या करना होगा, इसकी हिदायत अभी से देना आरंभ कर दें। लगभग एक माह में सभी को समझ में आ चुका है कि आने वाले दिन बहुत आसान नहीं हैं, इसलिए बंदिशों में रहने का मन हर नागरिक बना चुका है।

आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)

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