किसके हित में है श्रम कानूनों में तब्दीलियां!

लिमटी की लालटेन 98
(लिमटी खरे)
देश के कई राज्यों ने कोरोना कोविड 19 से लड़ने के नाम पर श्रम क़ानून के कई प्रावधानों को तीन सालों के लिए स्थगित कर दिया है। मज़दूर संगठनों से जुड़े लोगों का कहना है कि औद्योगिक क्रांति से पहले जिन हालात में मज़दूरों को काम करने पर मजबूर होना पड़ता था, देश के कुछ प्रमुख राज्यों में मज़दूरों के लिए कुछ वैसे ही हालात हो जाएंगे।
वे ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि देश के कई राज्यों ने श्रम क़ानून के कई प्रावधानों को तीन सालों के लिए ताक पर रख दिया है। इसका अर्थ हुआ कि उद्योगपतियों और उद्योगों के मालिकों को छूट दे दी गई है और वे मज़दूरों की बेहतरी के लिए बनाए गए क़ानूनों का पालन करने के लिए अब बाध्य नहीं हैं।
इसमें सबसे पहले फ़ैसला उत्तर प्रदेश की सरकार ने बुधवार को अपने मंत्रिमंडल की बैठक में लिया और बताया गया कि यह सब प्रदेश में निवेश को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक के बाद जारी किए गए बयान में कहा गया कि अब राज्य में श्रमिकों से जुड़े सिर्फ़ तीन क़ानून ही लागू होंगे, बाक़ी सारे क़ानून तीन साल के लिए प्रभावी नहीं रहेंगे।
जो कानून लागू रहेंगे उसमें भवन और निर्माण श्रमिक क़ानून, बंधुआ मज़दूरी विरोधी क़ानून और श्रमिक भुगतान क़ानून की पांचवीं अनुसूची को शामिल किया गया है। बदली हुई परिस्थितियों में अब मज़दूरों को 12 घंटे की पाली में काम करना पड़ेगा।
उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव आरके तिवारी ने मंत्रिमंडल के फ़ैसले के बारे में पत्रकारों से बात करते हुए वजह बतायी थी कि अब प्रदेश के बहुत सारे प्रवासी मज़दूर वापस अपने घरों को लौट रहे हैं। इसका मतलब है कि सबको रोज़गार की ज़रूरत पेश आएगी, इस कारण को क्या नियोज योजना में लिया जाए, प्रश्नाधीन होना चाहिये।
इसी तरह मध्य प्रदेश सरकार ने तो श्रमिक अनुबंध क़ानून को 1000 दिनों के लिए निरस्त करने का फ़ैसला किया है। इसके अलावा औद्योगिक विवाद क़ानून और औद्योगिक व्यवहार संहिता को भी निरस्त कर दिया है। मध्य प्रदेश ने जो फ़ैसला लिया है वो मौजूदा औद्योगिक इकाइयों और नई खुलने वाली इकाइयों के लिए भी है।
मज़दूरों के काम की जगह को उनके मानसिक और शारीरिक तौर पर उनके अनुकूल रखने की जवाबदेही उद्योगों के मालिकों पर ही आहूत होती है। कामगारों को बुनियादी सुविधाएं भी मिलती रहें, इस बात का ध्यान भी उद्योग संचालकों को ही रखना होता है, पर कुछ राज्यों के द्वारा उद्योगपतियों को इस तरह की बुनियादी जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाकर मजदूरों के हितों पर कुठाराघात करने का प्रयास किया जा रहा है। अब उद्योगपति उन पाबंदियों को मानने के लिए बाघ्य नहीं होंगे जो अब तक वे मानते आए हैं।
कुछ प्रावधानों पर नज़र डालें जो अगले तीन साल तक के लिए निरस्त कर दिए गए हैं। इसमें काम की जगह या फैक्ट्री में गंदगी पर कार्रवाई से राहत, वेंटिलेशन या हवादार इलाक़े में काम करने की जगह नहीं होने पर कोई कार्रवाई नहीं होगी। किसी मजदूर की अगर काम की वजह से तबीयत ख़राब होती है तो फैक्ट्री के मैनेजर को संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करना होगा।
इसके अलावा शौचालयों की व्यवस्था नहीं होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होगी। इकाइयां अपनी सुविधा के हिसाब से मज़दूरों को रख सकती हैं और निकाल सकती हैं वो भी अपनी ही शर्तों पर। बदहाली में काम करने का न तो श्रमिक अदालत संज्ञान लेगी और ना ही दूसरी अदालत में इसको चुनौती दी जा सकती है।
इसके अलावा श्रमिकों के लिए रहने और आराम करने की व्यवस्था या महिला श्रमिकों के लिए बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच भी बनाना नई कंपनियों के लिए अनिवार्य नहीं होगा। नए नियमों के प्रस्ताव को लेकर श्रमिक संगठन उद्वेलित दिख हैं। उनका कहना है कि इससे एक बार फिर औद्योगिक क्रांति से पहले जैसे हालात पैदा हो जाएंगे।
उनका आरोप है कि श्रमिकों को बंधुआ मजदूरी की तरफ धकेला जा रहा है। लंबे संघर्ष के बाद मज़दूर अपनी स्थिति को बेहतर करने की कोशिश में लगे थे, लेकिन सरकारों ने महामारी का सहारा लेते हुए श्श्रम क़ानूनश् को मालिकों के पास गिरवी रख दिया है.
हालांकि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश और गुजरात के फ़ैसलों पर केंद्र सरकार ने अभी तक मुहर नहीं लगाई है किन्तु केंद्र सरकार के अनुमोदन के बाद सभी राज्यों ने जो श्रम क़ानून में बदलाव लाने के प्रस्ताव रखे हैं, वो लागू हो जाएंगे।
हालात देखकर यही लग रहा है कि कोई व्यक्ति अगर अगर किसी विचार धारा का गुलाम हो जाए तो उस पर मानसिक दिवालियापन हावी हो जाता है, आज मजदूरों का भी यही हाल है। विशेष और सर्वश्रेष्ठ के भावों वाली विचारधारा ने उसे मानसिक रोगी बना दिया है जिस से व अपने अधिकारों से वंचित होते जा रहे हैं। वे कहीं रेल पटरियों पर कट रहे हैं, कहीं हाईवे पर ही भूख से दम तोड़ रहे हैं। हर सड़क पर लाचारी का झोला लिए मज़दूर पैदल चले जा रहे है। उन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब नहीं हो पा रहा है।
इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 मजदूरों को कुछ राहत मांग सकने का एक जरिया था, अब वे अधिकार विहीन हो जाएंगे। आश्चर्य इस बात का है कि मजदूरों का हिमायती कहलाने वाला भारतीय मजदूर संघ इस पर अब तक चुप्पी साधे हुए है। कुछ अन्य श्रमिक संघटन इसे चुनौती देने के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी में हैं।
विचारणीय होगा कि क्या अब पुराने कानूनों को वर्तमान परिवेश के हिसाब से पुनरीक्षण करने का समय आ गया है या अभी भी अकबर के बनाये सराय कानून के हिसाब से होटलों में पीने के पानी का अधिकार जताना और अंततः सीलबंद पानी ख़रीद कर पीना और लज्जित होना जारी रखना हैं या घोड़े और तांगे की रिवाज बरकरार रखते हुए अब भी रिक्शों का लाइसेंस वेटनरी डॉक्टर से ही लेते रहने है!
आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करते हुए घर पर ही रहें।
(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)
(साई फीचर्स)

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