समुद्र में घुलता घातक रसायन!

लिमटी की लालटेन 113

(लिमटी खरे)

कहा जाता है कि दुनिया का तीन चौथाई हिस्सा पानी से ढका है, इसके बाद भी पीने योग्य पानी के लिए आम लोग तरसते ही रहते हैं। इसका कारण यह है कि पानी मेें तेजी से घातक रसायन मिलते जा रहे हैं, जो पानी को पीने योग्य नहीं रहने देते हैं। हाल ही में मॉरीशस के समुद्री तट पर ब्लूवे मरीन में एक जापानी जहाज खड़ा था, यह जहाज दो टुकड़े हो गया। इस जहाज में लगभग चार हजार टन तेल भरा था जो जहाज के टूटते ही समुद्र के पानी में जा मिला। यद्यपि स्थानीय लोगों और पर्यावरण के पहरूओं ने तेल के रिसाव को रोकने का हर संभव प्रयास किया किन्तु खराब मौसम और तेज हवाएं उनकी राह में शूल बनकर उभरीं। समुद्र में फैले कच्चे तेल से आसपास का इलाका प्रदूषित हो गया और द्वीप के आसपास मौजूद समुद्री जीवों और समुद्री पौघों को खतरा भी उतपन्न हो गया।

हलांकि इन्हें सुरक्षित निकालने का प्रयास जारी है। वहीं कोरोना काल में ही मारीशस के प्रधानमंत्री प्रवंद जगन्नाथ ने इसे पर्यावरण के लिए आपातकाल की घोषणा करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मदद की गुहार लगाई है। देखा जाए तो मारीशस की आय के स्त्रोत में पर्यटन ही प्रमुख रूप से है। यहां समुद्री द्वीप, उन पर पाए जान वाले समुद्री जीव जंतु और पेड़ पौधे ही प्रमुख आकर्षण हुआ करते हैं। कोरोना काल मेें लॉक डाऊन के चलते पहले ही यहां पर्यटकों का टोटा महसूस किया जा रहा है इसके साथ ही अब तेल के इस रिसाव के कारण इस संकट को दूबरे पर दो असाढ़ ही माना जा सकता है।

पर्यावरणविदों की मानें तो कच्चा खाद्य तेल, कोयला, प्राकृतिक गैसों, पेट्रोलियम पदार्थ आदि के लगातार बढ़ते उपयोग से उतपन्न हो रहे प्रदूषण को पर्यावरण के लिए खतरा निरूपति किया है। हवा में घुले इस तरह के प्रदूषण से सांस लेने में तकलीफ, फेंफड़ों का केंसर, हृदय और त्वाचा आदि के रोगों की आशंकाएं बढ़तीं हैं तो दूसरी ओर इस तरह के पदार्थों से जमीन की उर्वरक क्षमता भी कम हो रही है। मारीशस तो एक उदहारण हो सकता है दुनिया भर में समुद्र के तटीय इलाकों में तेलीय पदार्थ और औद्योगिक अपशिष्ट का असुरक्षित निष्पादन भी पर्यावारणीय संकट के लिए उपजाऊ माहौल तैयार कर रहा है।

पिछले कई सालों से जब चाहे तब समुद्री तल में हजारों मीट्रिक टन तेल के रिसाव और कभी कभी तो इसमें आग लगने की खबरों से मीडिया अटा पड़ा रहता है। इसका दुष्प्रभाव जलचरों पर पड़ रहा है। देश की ही बात करें तो केरल के तटीय क्षेत्रों में इस तरह के प्रदूषण के चलते चिंगट और झींगा मछलियों का उत्पादन पच्चीस से तीस फीसदी तक कम हो गया है।

कुछ साल पहले डेनमार्क के बाल्टिक बंदरगाह में एक हजार नौ सौ टन का रिसाव हुआ था। इक्वाडोर के गौलापेगोस द्वीप के पास समुद्र में साढ़े छः लाख लीटर डीजल आदि का रिवास किसी से छिपा नहीं है। इसके अलावा कांडला बंदरगाह पर ही लगभग तीन लाख लीटन तेल जामनगर के पास कच्छ की खाड़ी में प्रवाहित हो गया था, जिससे जलचर बहुत बड़ी तादाद में मारे गए थे। जापान की राजधानी टोक्यो के पश्चिमी तट पर भी तीन सौ सत्रह किलोमीटर के लगभग पानी की सतह पर तेल फैल गया था। इतना ही नहीं रूस में बेलाय नदी के किनारे बिछाई गई पाईप लाईन से एक सौ पचास मीट्रिक टन तेल नदी के पानी में बह गया था।सैनजुआन जहाज जब कोरल चट्टानों से जाकर टकराया था तब अटलांटिक तट पर तीन लाख लीटर तेल फैल गया था। मुंबई हाई में भी एक हजार छः सौ मीट्रिक टन तेल का रिसाव इसके पहले हो चुका है।

एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में लगभग चौंसठ करोड़ वाहन सड़कों पर हैं। इनमें प्रयुक्त होने वाले डीजल पेट्रोल से कितना प्रदूषण हो रहा है इसका अनुमान सहज रूप से नहीं लगाया जा सकता है। प्रदूषण रोकने के लिए उपाय जरूर किए जा रहे हैं, किन्तु इस सबके बाद भी एक सौ पचास टन कार्बन डाय आक्साईड़ दस लाख टन नाईट्रोजन आक्साईड एवं पंद्रह लाख टन हाईड्रोकार्बन हर साल वायूमंडल में प्रवेश करती है जो ओजोन परत के लिए बहुत बड़ा खतरा बनी हुई है। अनुमान तो यह भी है कि इसके लिए विकसित देश सत्तर फीसदी दोषी हैं तो विकासशील देशों की भागीदारी महज 30 फीसदी ही है।

वहीं, विश्व बैंक के द्वारा जलीय प्रदूषण के कारण समुद्र तट पर रहने वालों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाला असर का आकलन कराया गया है। इसके मुताबिक इनके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की कीमत प्रति व्यक्ति 110 रूपए आंकी गई है। खतरे की बात तो यह है कि इसके चलते मछलियां कैंसर से पीड़ित भी हो रही हैं, जिनका सेवन अनजाने में ही लोगों के द्वारा कर लिया जाता है और इसके दुष्प्रभाव के रूप में त्वचा संबंधी रोग उभरकर सामने आ रहे हैं। समुद्र के पानी में मिलने वाला तेल और अन्य अपशिष्ट जलीय जीव जंतुओं, वनस्पतियों के साथ ही साथ मानव जीवन को संकट में डालने वाला ही प्रतीत हो रहा है, इसलिए जरूरत सावधान होने की है . . .!

आप अपने घरों में रहें, घरों से बाहर न निकलें, घर से निकलते समय मास्क का उपयोग जरूर करें, सोशल डिस्टेंसिंग अर्थात सामाजिक दूरी को बरकरार रखें, शासन, प्रशासन के द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का कड़ाई से पालन करें। हम लिमटी की लालटेन का 114वां एपीसोड लेकर जल्द हाजिर होंगे, तब तक के लिए इजाजत दीजिए . . .

(लेखक समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के संपादक हैं.)

(साई फीचर्स)