फिर भी सुबह हो गई . . .

(अनिल शर्मा, सिवनी)

रात रोकती रही
फिर भी सुबह हो गई
सुबह के प्यार से
पागल दोपहर हो गई
मिलने की हिचकिचाहट में
सांझ हो गई
कब तक रोकोगे तुम खुदको
अपने सब भरम छोड़ो
आओ रात होंने से पहले
वरना ख्वाब बनके
सताने मौत आ जायेगी
फिर शिकायत न कर पाओगे
मैं हूँ एक पल
ज़िन्दगी का . . .