कुपोषण, भुखमरी, खाद्य बर्बादी रोके बगैर खाद्य सुरक्षा असंभव

(विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस विशेष – 7 जून 2022)

खाद्य सुरक्षा स्वास्थ्य का एक प्रमुख निर्धारक है। यह व्यक्ति और अंततः समाज के अस्तित्व, कल्याण, आजीविका और उत्पादकता को प्रभावित करता है। पर्याप्त सुरक्षित और पौष्टिक भोजन प्राप्त करना जीवन को बनाए रखने और अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की कुंजी है। खाद्य सुरक्षा यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि खाद्य श्रृंखला के उत्पादन से लेकर कटाई, प्रसंस्करण, भंडारण, वितरण और खपत तक हर चरण में भोजन सुरक्षित है। हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी या रसायनों वाले असुरक्षित भोजन से डायरिया से लेकर कैंसर तक 200 से अधिक बीमारियां हो सकती हैं। यह बीमारी और कुपोषण का एक दुष्चक्र भी बनाता है, विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों को प्रभावित करता है। संयुक्त राष्ट्र ने दूषित भोजन और पानी के स्वास्थ्य प्रभावों पर वैश्विक ध्यान आकर्षित करने के लिए 7 जून को विश्व खाद्य सुरक्षा दिवस के रूप में घोषित किया है। 2022 की थीम ‘सुरक्षित भोजन, अच्छा स्वास्थ्य’ है।

दुनिया के अविकसित देशों की तरह भारत में भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें जीवित रहने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है। इतना ही नहीं, उन्हें जो भोजन मिलता है उसमें पोषक तत्वों की भी कमी होती है। इस खाद्य समस्या ने देश की बड़ी आबादी पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। आज भी बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक लोगों के भूख से मरने की खबरें आ रही हैं। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, भारत की लगभग 14.8 प्रतिशत आबादी कुपोषित है। प्यू रिसर्च सेंटर ने बताया था कि भारत में ऐसे लोगों की संख्या पिछले एक साल में तीव्र गति से बढ़ गई हैं जो 150 रुपये प्रति दिन (क्रय शक्ति के आधार पर आय) नहीं कमा सके। सालभर में ऐसे लोगों की संख्या में छह करोड़ की वृद्धि हुई है, जिससे कुल गरीबों की संख्या 13.4 करोड़ हो गई है। 1974 के बाद पहली बार देश में गरीब लोगों की संख्या बढ़ी है लेकिन 45 साल बाद भारत फिर से अत्यधिक गरीबी का देश बन गया है। नीति आयोग ने हाल ही में बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) जारी किया है जिसमें कहा गया है कि हर चार में से एक भारतीय बहुआयामी गरीब है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खाद्य सुरक्षा, पोषण और खाद्य बचत का अटूट संबंध है। अनुमानित 600 मिलियन अर्थात दुनिया में 10 में से 1 व्यक्ति दूषित भोजन खाने से बीमार पड़ जाते हैं और हर साल 420,000 लोग जान गवाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप 33 मिलियन स्वस्थ जीवन वर्ष का नुकसान होता है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में असुरक्षित भोजन के परिणामस्वरूप उत्पादकता और चिकित्सा व्यय में प्रत्येक वर्ष 110 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुकसान होता है 5 साल से कम उम्र के बच्चे खाद्य जनित बीमारी के बोझ का 40% वहन करते हैं, जिसमें हर साल 125,000 मौतें होती हैं। खाद्य जनित रोग स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों पर दबाव डालकर और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं, पर्यटन और व्यापार को नुकसान पहुंचाकर सामाजिक आर्थिक विकास में बाधा डालते हैं।

116 देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2021 में भारत 2020 के 94वें स्थान से फिसलकर अब 101वें स्थान पर आ गया है। भारत अपने अधिकांश पड़ोसियों से पीछे है। पाकिस्तान 92वें, नेपाल 77वें, बांग्लादेश 76वें और श्रीलंका 65 वें स्थान पर है। इंडेक्स के मुताबिक भारत से अधिक सिर्फ 15 देशों की हालत खराब है। 2014 की रैंकिंग में भारत 55 वें स्थान पर था। द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड 2019 के अनुसार, दशकों की लगातार गिरावट के बाद, 2015 से वैश्विक भूख लगातार बढ़ रही है। 2018 में, दुनिया भर में अनुमानित 821 मिलियन लोग भूख से पीड़ित थे। गरीबी उन्मूलन के लिए काम करने वाली संस्था ऑक्सफैम के मुताबिक, दुनिया भर में हर मिनट भूख से 11 लोगों की मौत हो जाती है। पिछले एक साल में दुनिया भर में सूखे जैसे हालात छह गुना बढ़ गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में लगभग 155 मिलियन लोग गंभीर खाद्य असुरक्षा संकट का सामना कर रहे हैं, जो पिछले साल के आंकड़े से 20 मिलियन अधिक है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की खाद्य अपशिष्ट सूचकांक रिपोर्ट 2021 अनुसार, भारत में, घरेलू खाद्य अपशिष्ट प्रतिवर्ष 50 किलोग्राम या देशभर में प्रतिवर्ष कुल 68,760,163 टन होने का अनुमान है। यूएनईपी रिपोर्ट मुताबिक 2019 में अनुमानित 93.1 करोड़ टन खाना बर्बाद हुआ। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 में 690 मिलियन से अधिक लोग भूख से प्रभावित थे। हमारी एक और समस्या यह है कि देश अपनी कृषि उपज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, फलों और सब्जियों का 16% कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की कमी के कारण हर साल खो देता है। भारतीय खाद्य निगम के गोदामों में हर साल अनाज का ढेर सड़ता है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने खुलासा किया है कि पिछले पांच वर्षों में 38,000 मीट्रिक टन से अधिक खाद्यान्न का नुकसान हुआ है। भारत ने वित्त वर्ष 2022 में अब तक 610.22 बिलियन का सामान आयात किया है, जो पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 54.71 प्रतिशत अधिक है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सभी असमय होने वाली मौतों में से 80 प्रतिशत दूषित भोजन और पानी के कारण होती हैं। भारत में खाद्य पदार्थों में मिलावट तो खेतों से ही शुरू हो जाती है जहां उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है।

आज इतनी बड़ी मात्रा में गरीबी, मंहगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता के साथ सभी लोगों के लिए पौष्टिक भोजन प्राप्त करना मुश्किल हो गया है, खाद्य सुरक्षा तो दूर, गरीबों को स्वच्छ ऑक्सीजन या स्वच्छ पानी भी नहीं मिलता। बड़ी मुश्किल से दो रोटियों का इंतजाम करने में गरीब का जीवन ख़त्म हो जाता है, तो फिर भरपूर पौष्टिक आहार कहां से मिलेगा? शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कई पोषक तत्वों की जरूरत होती है, इनकी कमी से हम कई बीमारियों के शिकार हो सकते हैं। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज ऐसे पोषक तत्व हैं जिनकी शरीर को सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

खाद्य सुरक्षा अच्छे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करती है। देश के विकास के लिए खाद्य सुरक्षा योजना और कार्यान्वयन का उचित संचालन आवश्यक है। खाद्य असुरक्षा समाज के हर तत्व को प्रभावित करती है, समाज में आर्थिक असंतुलन, कुपोषण, गरीबी, भुखमरी, बीमारी, मिलावटखोरी ये समस्याएं बढ़कर अन्य समस्याओं को जन्म देती हैं। देश का विकास बाधित होता है, आर्थिक तनाव बढ़ता है और मानवीय जीवन मूल्यों का ह्रास होता है। देश के हर नागरिक के लिए सरकार को खाद्य सुरक्षा की गारंटी के साथ युद्ध स्तर पर काम करने की जरूरत है। कुपोषण, गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, भूख, खाद्य असुरक्षा जैसी समस्याओं को नियंत्रित करने की जरूरत है। ताकि प्रत्येक नागरिक को उसका सही पौष्टिक आहार मिल सके, जिससे सभी को विकास के अवसर मिलेंगे, जीवन प्रत्याशा बढ़ेगी, बीमारी कम होकर उसपर खर्च कम होगा, आयात कम होकर निर्यात बढ़ेगा, देश आत्मनिर्भर बनेगा, देश की आय बढ़ेगी और देश समृद्धि के प्रगति पथ पर अग्रसर होगा।

(डॉ. प्रितम भि. गेडाम)

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