मोती . . .

(अनिल शर्मा ,सिवनी)
मोती की महिमा बड़ी निराली है
वो तो सीप के कवच से खुश है
उसे शिकायत नही सागर की
गहराई से न खारेपन से
न नदियों की लाई गन्दी मिट्टी से
सागर के अन्य जीव जंतु से
उसे तो बस पनपना है
कवच रूपी सीप के खोल में
उसे नही ढूंढ़ना
सीप ढूंढ़ लेगी उसकी
सेवा के लिये उचित वातावरण
सब कुछ उसका सीप ही है
माता पिता ,सीप ही है
सबके कवच ही तो होते है
हमारे व्यक्तिव के मोती के
चमक दमक  के विकास के
जब तक हम उनके कवच में है
हम कहाँ करते है फिक्र किसी की
उनका कवच हटा और
सामने आया सब कुछ
फिर लग जाती है कीमत जीवन की
जीवन रूपी मोती की. . .