क्षेत्रीय दलों के पास है लोकसभा चुनाव की कुंजी

 

 

(दिलीप पाण्डेय)

कांग्रेस की हालिया जीत से उसे मजबूत होने का छद्म अहसास हो सकता है। छद्म इसलिए क्योंकि छत्तीसगढ़ में ही उसे स्पष्ट बहुमत मिला है, जबकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में पार्टी मुश्किल से सत्ता में वापस आ पाई है। लेकिन यह कहना कि कांग्रेस के पक्ष में लहर चल रही थी और इससे वह बीजेपी को परास्त करने में सफल रही, गलत होगा। तमाम एग्जिट पोल्स कांग्रेस को राजस्थान में काफी मजबूत बता रहे थे। ऐसा लग रहा था कि वसुंधरा राजे बुरी तरह हारेंगी। वहां भी कांग्रेस को बहुमत से दो सीटें कम मिलीं और बीजेपी ने तगड़ा मुकाबला किया।

मध्य प्रदेश में 15 साल की एंटी-इंकम्बेंसी के बावजूद कांग्रेस वहां बीएसपी और एसपी के सहयोग से सरकार बनाने का दावा पेश कर पाई। अगर नोटा में 4 लाख वोट नहीं पड़े होते तो परिणाम कुछ और हो सकता था। ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव परिणाम कांग्रेस की आशाओं के विपरीत आए तो हैरानी नहीं होगी। कांग्रेस मोदी-शाह के मुकाबले कोई समांतर विजन या नैरेटिव बनाने में नाकामयाब रही है, इसलिए बीजेपी के लिए कांग्रेस आसान टारगेट है। लेकिन क्या 2019 में कांग्रेस मोदी सरकार को हटा पाएगी? मेरा जवाब है- नहीं।

कांग्रेस अगर क्षेत्रीय दलों को नजरअंदाज करके, एकला चलो रे की नीति पर चलती है तो वह कुछ नहीं कर पाएगी। उसकी स्थिति तभी बेहतर होगी जब वह अपने मजबूत आधार वाले क्षेत्रों में थोड़ा बहुत अलायंस पार्टनर्स को समायोजित करे। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस का बीएसपी और एसपी से गठबंधन हो गया होता तो परिदृश्य कुछ और ही होता। बीएसपी 4.6 प्रतिशत वोट शेयर पाने में सफल रही। अगर उसमें कांग्रेस का 41 प्रतिशत वोट शेयर जोड़ दिया जाए तो बीजेपी इतनी मजबूत स्थिति में नहीं दिखती। लेकिन क्षेत्रीय दलों के प्रति कांग्रेस में अभी भी एक स्वाभाविक दुराव दिखता है।

बीजेपी के खिलाफ मजबूत मोर्चा खड़ा करने के लिए कांग्रेस को राज्यवार गठबंधन करने होंगे। पंजाब और दिल्ली में आम आदमी पार्टी बीजेपी और अकालियों के विस्तार का मुकाबला कर सकती है। हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल और कुछ अन्य क्षेत्रीय दल हैं जिनके साथ वह तालमेल कर सकती है। हर राज्य में बीजेपी के विरोधी मतों का बिखराव रोककर ही उसे पछाड़ा जा सकता है। मेरे ऐसा सोचने के पीछे कुछ कारण हैं। 13 बड़े राज्यों में बीजेपी 430 संसदीय सीटों में 254 सीटें जीने में सफल रही थी। इनमें से मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में 166 सीटों में से 147 सीटें जीतने में समर्थ रही थी। इन राज्यों के लिए उसे विशेष रणनीति बनानी होगी।

कुछ ऐसे राज्य हैं जहां बीजेपी ने 2014 में बेहतरीन प्रदर्शन किया था, लेकिन वहां कांग्रेस के साथ कुछ अन्य क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि 2014 में बीजेपी दिल्ली की सभी सात सीटों पर जीतने में सफल रही थी। यहां भी कांग्रेस की स्थिति आम आदमी पार्टी के मुकाबले काफी कमजोर है। आज मोदी-शाह को, क्षेत्रीय दल ही सशक्त चुनौती दे रहे हैं। मसलन मोदी के प्रचंड लहर में भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उड़ीसा में नवीन पटनायक ने बीजेपी का सूपड़ा साफ कर दिया था। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल नें लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद 70 में 67 सीटों पर प्रचंड विजय हासिल की थी।

सारांश यह कि राहुल गांधी के तमाम जोर लगाने के बाद भी कांग्रेस मोदी को टक्कर नहीं दे पाएगी, अगर वह अहंकार नहीं त्यागती है। इसका ताजातरीन उदाहरण है हरियाणा में जींद के चुनाव परिणाम। बिल्कुल यही सियासी गणित दिल्ली का बन रहा है, जिसके मुताबिक दिल्ली में सिर्फ आम आदमी पार्टी ही बीजेपी से लड़ने और परास्त करने की स्थिति में है, बशर्ते कांग्रेस हरियाणा की तरह, दिल्ली में बीजेपी के लिए बैटिंग न करे। देखना होगा कि जींद में हार के बाद क्या कांग्रेस बीजेपी के खिलाफ जनादेश को खंडित होने से रोकने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति जुटा पाएगी? (लेखक आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं.)

(साई फीचर्स)