मण्डला हेतु स्थानीय का नारा नहीं हुआ बुलंद!

 

 

मार्गदर्शक मण्डल की ओर बढ़ रहे नेताओं की धड़कने हो रहीं तेज

(लिमटी खरे)

सिवनी (साई)। जिले के भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने अब अस्तित्व का संकट खड़ा दिखायी देने लगा है। विधान सभा चुनावों में टिकिट पाने की हर संभव कोशिश के बाद भी सारे प्रयासों पर पानी फिरने के बाद अब इन नेताओं की नजरें सिर्फ और सिर्फ बालाघाट लोकसभा पर जाकर टिक गयी हैं। मण्डला संसदीय क्षेत्र से स्थानीय का नारा कोई भी बुलंद करता नहीं दिख रहा है।

भाजपा के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि सिवनी विधान सभा सीट पर पूर्व में निर्दलीय विधायक रहे दिनेश राय को संगठन के द्वारा इन सारे नेताओं के पुरजोर विरोध के बाद भी टिकिट दे दी गयी। दिनेश राय ने चुनावों में एक बार फिर विजयश्री का वरण कर सभी के विरोध का शमन भी बहुत ही उम्दा तरीके से कर दिया।

सूत्रों का कहना है कि इसके पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जब मेडिकल कॉलेज का भूमि पूजन करने सिवनी आये थे तब इन नेताओं के द्वारा मुख्यमंत्री का अघोषित विरोध करते हुए कार्यक्रम का बहिष्कार किया गया था। इन सारी बातों का संदेश प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं में बहुत अच्छा नहीं गया था।

सूत्रों की मानें तो गत दिवस ऐसे सभी नेताओं ने एक जुट होकर एक वरिष्ठ नेता के घर पर बैठक की। इन नेताओं के बीच यह बात तय हुई कि वे सबसे पहले भोपाल जाकर संगठन मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भेंट करके सिवनी के किसी नेता को इस बार बालाघाट से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये टिकिट देने के संबंध में अपनी बात रखेंगे। इसके उपरांत ये नेता दिल्ली का रूख करने वाले थे।

सूत्रों ने बताया कि ये नेता सोमवार को भोपाल पहुँचे और इन नेताओं ने संगठन मंत्री से भेंट भी की, किन्तु संगठन मंत्री के रूख को देखते हुए इन नेताओं ने भोपाल से दिल्ली की दौड़ लगाने की बजाय सिवनी वापस लौटना ही उचित समझा। सूत्रों की मानें तो मंगलवार सुबह तक ये नेता सिवनी वापस लौट जायेंगे।

सूत्रों ने इस बात के संकेत भी दिये कि कुछ साल पहले तक सिवनी के एक कद्दावर नेता के चाहने पर ही विधान सभा या लोकसभा में हारजीत हुआ करती थी। इनमें से कुछ नेता उस विजय को अपना जनाधार मानने की भूल कर बैठे थे और इसके बाद एक के बाद एक चुनावों में इन नेताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था।

इधर, भाजपा के नेताओं के बीच चल रहीं चर्चाओं के अनुसार जिस तरह विधान सभा चुनाव हारने के बाद भी दिनेश राय के द्वारा 2008 से 2013 तक लगातार क्षेत्र में जनसंपर्क जारी रखा गया और केवलारी क्षेत्र में टिकिट मिले या न मिले पर राकेश पाल सिंह के द्वारा लगातार जनसंपर्क जारी रखा गया इन्ही सभी बातों का परिणाम रहा है उनकी विजय।

चर्चाएं तो यहाँ तक हैं कि अब प्रदेश में भाजपा सरकार नहीं है। इस लिहाज से अगर 2019 में इन नेताओं को मौका नहीं मिल पाया तो इन्हें पाँच साल तक अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये लंबा संघर्ष करना पड़ सकता है, और पाँच सालों में एक और पीढ़ी जवान होकर पार्टी के मंच पर खड़ी दिखेगी, जो इन नेताओं के लिये सबसे बड़ी चुनौती भी साबित हो सकती है। चर्चाओं के अनुसार मार्गदर्शक मण्डल की ओर बढ़ रहे इन नेताओं की धड़कने अभी तेज ही चल रहीं हैं।

सूत्रों ने कहा कि भाजपा के आला नेताओं के द्वारा अपने – अपने स्तर पर गुप्त रूप से सर्वेक्षण भी कराये जाते हैं। इन सर्वेक्षणों के हिसाब से ही टिकिट वितरण होता है, पर कभी – कभी दस फीसदी मामलों में किसी के दबाव के चलते किसी की टिकिट काट कर किसी अन्य को दे दी जाती है।

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