आखिर अखिलेश हुए सक्रिय

 

 

 

 

(ब्‍यूरो कार्यालय)

लखनऊ (साई)। समाजवादी पार्टी (एसपी) के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के उम्मीदवार बनने को लेकर चली एक लंबी उठापटक रविवार को खत्म हो गई। तय हो गया कि पिता की विरासत यानी आजमगढ़ लोकसभा सीट पर दावेदारी करने अखिलेश यादव ही मैदान में उतरेंगे। दरअसल, शिवपाल फैक्टर को देखते हुए आजमगढ़ से चुनाव लड़कर अखिलेश यह स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं कि वही अपने पिता की विरासत के असली उत्तराधिकारी हैं।

आपको बता दें कि मुलायम सिंह यादव ने वर्ष 2014 में आजमगढ़ सीट से महज 63 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी। मुलायम के चेहरे पर वोटों का यह अंतर अखिलेश के लिए भी किसी चुनौती से कम नहीं है जबकि अब तो शिवपाल भी एसपी खेमे से अलग हो गए हैं। एसपी चीफ अखिलेश यादव पर आजमगढ़ फतह करने का जिम्मा है तो वेस्ट यूपी की रामपुर सीट आजम खान के हवाले की गई है। सवाल यह है कि आखिर आजमगढ़ से अखिलेश और रामपुर से आजम खान क्यों चुनाव लड़ रहे हैं। इस बीच, चर्चा है कि अभिनेत्री जया प्रदा बीजेपी में शामिल हो सकती हैं और रामपुर से आजम खान के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर सकती हैं।

अखिलेश कन्नौज में भी पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत संभाल चुके हैं। वर्ष 2000 में मुलायम के कन्नौज सीट खाली करने पर अखिलेश पहली बार लोकसभा पहुंचे थे। 2012 के विधानसभा चुनाव में एसपी को पहली बार पूर्ण बहुमत मिला तो मुलायम ने मुख्यमंत्री की कुर्सी भी अखिलेश को सौंप दी थी।

शिवपाल फैक्टर को कम करना चाहते हैं अखिलेश?

आजमगढ़ से अखिलेश के चुनाव लड़ने के राजनीतिक मायने भी हैं। पूर्वांचल समाजवादी पार्टी का बड़ा गढ़ रहा है, लेकिन 2014 में मोदी लहर ने एसपी के इस सबसे मजबूत गढ़ को ध्वस्त कर दिया था। पूर्वांचल से एसपी को सिर्फ एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा था। यह सीट भी आजमगढ़ थी, जो मुलायम ने तकरीबन 63 हजार वोटों के अंतर से जीती थी। पूर्वांचल में एसपी का दबदबा बरकरार रहे इसी रणनीति के तहत मुलायम ने मैनपुरी सीट छोड़ी और आजमगढ़ सीट बरकरार रखी। अब इस सीट से चुनाव लड़कर अखिलेश कार्यकर्ताओं को संदेश देना चाहते हैं कि पार्टी दमदार तरीके से चुनाव लड़ेगी। इस दांव से अखिलेश पूर्वांचल में शिवपाल फैक्टर भी कम करना चाहते हैं।

आसान नहीं आजमगढ़ में अखिलेश की राह

अखिलेश यादव ने अपना पहला चुनाव वर्ष 2000 में कन्नौज से लड़ा था। यह लोकसभा उपचुनाव था। उस समय मुलायम ने कन्नौज सीट अखिलेश के लिए खाली थी। 2004 के आम चुनाव में भी अखिलेश ने कन्नौज से चुनाव लड़ा और बीएसपी के ठाकुर राजेश को एकतरफा हराया। 2009 में भी अखिलेश की जीत का सिलसिला नहीं रुका और उन्होंने कन्नौज सीट से ही बीएसपी के महेश चंद्र वर्मा को शिकस्त दी। इसी साल उन्होंने फिरोजाबाद सीट पर हुए उपचुनाव में भी जीत दर्ज की, लेकिन बाद में यह सीट खाली कर दी। अखिलेश के बाद डिंपल यादव कन्नौज से सांसद बनीं। वर्ष 2014 में कन्नौज से डिंपल यादव ने महज 19 हजार वोटों के अंतर से मुकाबला अपने नाम किया था। चुनावी विश्लेषकों के मुताबिक, अखिलेश के लिए आजमगढ़ सीट जीतना आसान नहीं होगा। मोदी लहर में मुलायम भी सिर्फ 63,204 वोटों से जीत पाए थे।

तोड़ दिया गया रामपुर में बना उर्दू गेट

उधर, आजम खान के लिए लोकसभा का यह पहला चुनाव होगा। वह एक बार राज्यसभा सदस्य जरूर रहे। यूपी में उनकी पहचान समाजवादी पार्टी के फायरब्रैंड नेता की है। अपने बयानों को लेकर वह अक्सर चर्चा में रहते हैं। उनके करीबियों के मुताबिक, आजम के चुनाव लड़ने की वजह जौहर यूनिवर्सिटी हो सकती है। पिछले दिनों आजम खान के खिलाफ एफआईआर हुई। एसआईटी ने जांच की। उनके ड्रीम प्रॉजेक्ट जौहर यूनिवर्सिटी पर जांच बैठा दी गई। उनके मंत्री रहते रामपुर में बनाए गए उर्दू गेट को प्रशासन ने 15 दिन पहले तुड़वा दिया। आजम के मदरसे के कमरे भी खाली करा लिए गए। यूनिवर्सिटी में सरकारी और गरीबों की जमीन कब्जाने की जांच चल रही है। निर्माण गिराए जाने का खतरा भी बना हुआ है।

डीएम बीजेपी वर्कर की तरह कर रहे हैं काम

आजम खान कार्रवाई पर रोक लगवाने के लिए अदालत तक पहुंच गए। डीएम रामपुर पर बीजेपी वर्कर की तरह काम करने का आरोप लगाकर चुनाव आयोग से उन्हें हटवाने की गुहार लगाई गई है। आजम के करीबियों का कहना है कि सरकार राजनीतिक रंजिश निकाल रही है। परेशान कर रही है। आजम अपने खिलाफ तमाम कार्रवाई को सियासी लड़ाई में तब्दील करने के मकसद से भी चुनावी मैदान में उतरे हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि आजम हमेशा यूपी के साथ राष्ट्रीय मुद्दों पर मुखर रहते हैं। खासकर पीएम नरेंद्र मोदी उनके निशाने पर रहते हैं। वह आमतौर पर यूपी से संसद में मुस्लिमों की नुमाइंदगी नहीं होने पर करीबियों से चिंता जताते रहते थे। यह भी उन्हें प्रत्याशी बनाए जाने का एक कारण हो सकता है।

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