तो राजनीतिक दल इस तरह करते हैं अपने उम्मी दवारों का चयन…

 

 

लोकसभा चुनाव सिर पर है तो भारत के राजनीतिक दलों के अंदर तूफान-सा मचा हुआ है। सभी दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है ऐसे नेताओं को चुनने की, जो चुनावी बिसात पर विरोधियों को पटकनी दे सके। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चयन कैसे करते हैं? जानते हैं नरेन्द्र नाथ और पूनम पांडे की इस रिपोर्ट में३

भाजपा : कैंडिडेट कौन होगा, इसका फैसला बीजेपी में केंद्रीय चुनाव समिति करती है, लेकिन कैंडिडेट चुनने की प्रक्रिया जिला स्तर से शुरू होती है। राज्य के प्रभारी पहले राज्य में हर जिला स्तर की इकाई की राय जानते हैं कि वह अपने क्षेत्र से किसे कैंडिडेट बनाना चाहती है और क्यों? फिर राज्य के सीनियर नेताओं से भी राय लेते हैं। यह सब प्रक्रिया अनौपचारिक तौर पर चलती है। इसके बाद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन मंत्री और पार्टी प्रभारी उन राज्य के कुछ सीनियर नेताओं के साथ अनौपचारिक तौर पर बातचीत कर हर सीट पर एक कैंडिडेट के नाम पर सहमति बनाते हैं।

इस सहमति बनाने में हर राज्य में कई बार अलग-अलग मानदंड तय कर दिए जाते हैं तो कई बार नेताओं की अपनी पसंद-नापसंद की भी अहम भूमिका होती है। कहीं सोशल मीडिया में कितनी लोकप्रियता है, यह भी देखा जाता है तो कुछ राज्य में प्रभारी अपने हिसाब से सर्वे भी कराते हैं। भले ही कैंडिडेट के मामले में अलग-अलग राय हो, लेकिन उनकी सहमति बनाते हुए एक लिस्ट तैयार की जाती है, जो प्रदेश की तरफ से तय किए गए कैंडिडेट होते हैं। यह लिस्ट फिर केंद्रीय चुनाव समिति के पास जाती है। जब जिस प्रदेश के लिए कैंडिडेट फाइनल होने की मीटिंग होती है, उसमें केंद्रीय चुनाव समिति के मेंबर के साथ उस राज्य के अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन मंत्री और प्रभारी भी शामिल होते हैं। मीटिंग शुरू होते ही लिस्ट सभी मेंबरों को दे दी जाती है। फिर हर एक सीट पर प्रदेश की तरफ से कौन कैंडिटेट तय हुआ है, उसका नाम लिया जाता है। अगर इस नाम पर किसी मेंबर को ऐतराज होता है तो वह अपनी बात रखते हैं। फिर चर्चा होती है।

कई बार प्रदेश की तरफ से तय किया गया कैंडिडेट केंद्रीय चुनाव समिति में बदल जाता है। आखिरी फैसला इस चुनाव समिति का ही होता है। पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने नेताओं को साफ संदेश दिया था कि अगर उन्हें अगले आम चुनाव में बीजेपी का टिकट चाहिए या वह पार्टी कैडर में प्रमोशन पाने की हसरत रखते हैं तो उन्हें अपने फेसबुक या ट्विटर पर कम-से-कम 3 लाख फॉलोअर की संख्या रखनी ही होगी। हर एमपी उम्मीवारों के लिए 5 लाख और एमएलए उम्मीदवारों के लिए 3 लाख फॉलोअर बनाने का लक्ष्य तय किया गया था।

कांग्रेस : कांग्रेस ने टिकट देने के लिए हाल के दिनों में शक्ति ऐप को सबसे बड़ा आधार बनाया है। इसी ऐप की मदद से वह सभी क्षेत्रों से उम्मीदवारों के बारे में कायकर्ताओं की राय पूछती है। सूत्रों के अनुसार लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अब तक 100 से ज्यादा उम्मीदवारों के नाम शॉर्ट-लिस्ट भी कर लिए हैं। बाकी नाम भी इससे ही तय किए जा रहे हैं। इसके लिए शक्ति ऐप को मिले फीडबैक का आधार बनाया गया। गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों से पार्टी उम्मीदवारों के लिए ऐप पर कार्यकर्ताओं से उनकी पसंद के नाम मांगे गए थे। उसी आधार पर ये नाम तय किए गए हैं। राहुल गांधी हर दिन इस ऐप से मिले फीडबैक पर रिपोर्ट लेते हैं और जिन चीजों पर राय मांगी जाती है, उसके डेटा सिर्फ वही देख सकते हैं।

अभी दिल्ली में आप से कांग्रेस समझौता करेगी या नहीं, इस बारे में भी शक्ति से ही फीडबैक मांगे गए हैं। ऐप देश की सभी पंचायतों से जुड़ी हुई है। इसमें लोगों को कोई पसंद का नाम नहीं दिया जाता है, बल्कि उनसे बस उनकी पसंद का एक नाम लेने को कहा जाता है। इन नामों को शॉर्ट-लिस्ट कर बाद में यह कांग्रेस की उच्चस्तरीय टीम के पास भेजा जाता है जहां से हरी झंडी मिलने के बाद टिकट का ऐलान होता है। अधिकतर सीटों पर उम्मीदवार तय करने में शक्ति ऐप की अहम भूमिका रही है। हालांकि कांग्रेस ने एक साल पहले अपने नेताओं की लिखित परीक्षा भी लेनी शुरू की थी। इसके तहत प्रवक्ता से लेकर अलग-अलग जूनियर लेवल पद पर एंट्री के लिए लिखित परीक्षा आयोजित की गई थी। इसमें सामान्य ज्ञान के सवालों से लेकर कांग्रेस की विचारधारा के बारे में पूछा गया था। हालांकि लिखित परीक्षा का प्रयोग अधिक सफल नहीं हुआ और उसे बंद कर दिया गया।

जेडीयू ने भी किया प्रयोग : वहीं पार्टी में नए मेंबर बनने में कमी आने के रुख से परेशान जेडीयू ने भी नया प्रयोग करने की पहल की है। पार्टी उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर को इस मोर्चे पर काम करने का पहला टास्क दिया गया। नए मेंबर बनाने के लिए पार्टी ने प्रशांत किशोर के नेतृत्व में एक टीम बनाई है। इसके लिए एक टेलीफोन लाइन भी चालू की गई। अगर कोई पार्टी से जुड़ना चाहता है तो वह फोन कर समय ले सकता है। इसके बाद उसे पटना आना होता है और वहां उसे एक फॉर्म भरना होता है, जिससे उसकी राजनीतिक समझ और झुकाव जानने में मदद मिलती है। इस फॉर्म को पढ़ने के बाद इनमें से युवाओं को शार्ट लिस्ट किया जाता है, जिनकी बाद में प्रशांत किशोर से अकेले मीटिंग तय हो रही है। प्रशांत किशोर से साथ डायरेक्टर इंटरव्यू के बाद अगर युवा का चयन हो गया तो फिर उसे पार्टी में जिम्मेदारी दी जा सकती है। इसमें से कुछ नामों को 2020 के विधानसभा चुनाव में टिकट देने की भी बात की जा रही है।

क्षेत्रीय दलों में नाम ही काफी है : ज्यादातर क्षेत्रीय दलों में टिकट देने के पीछे बस सामाजिक समीकरण बड़ी भूमिका निभाते हैं। दरअसल क्षेत्रीय दलों के नेता चाहे वह लालू हों या मायावती या केसीआर, सभी चुनाव बस अपने नाम पर लड़ते हैं। इन दलों के प्रभुत्व वाले इलाके में चुनाव इनके इर्द-गिर्द ही घूमते हैं। बिहार में जब लालू अपने शीर्ष पर थे, तब वह सभी क्षेत्र में जाकर कहते थे कि वोट देते समय उम्मीदवार नहीं, उनके नाम पर वोट दें। पिछले चुनाव और विधानसभा चुनाव में तमिलनाडु में जयलललिता ने भी यही बात कही थी।

दरअसल इनकी सियासी ताकत इनका खुद का कद ही होता है और ये क्षेत्रीय नेता जानबूझकर खुद को पार्टी के रूप में प्रॉजक्टद करते हैं। ऐसे में किसे टिकट मिलता है, वह बहुत मायने नहीं रखता। हालांकि इस बार खासकर दो क्षेत्रीय दल, बीजेडी और टीएमसी ने टिकट देने में बड़ा प्रयोग करते हुए महिलाओं को अधिक-से-अधिक टिकट दिए। नवीन पटनायक ने लोकसभा और विधानसभा सीट में 33 फीसदी टिकट महिलाओं के लिए आरक्षित करने का ऐलान किया तो ममता बनर्जी ने बंगाल की 42 में से 17 सीटें महिलाओं को दीं, जोकि अब तक का एक रिकॉर्ड है।

आम आदमी पार्टी : अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी में कैंडिडेट चुनने की प्रक्रिया बदलती रही है। जब आप ने दिल्ली विधानसभा का पहला चुनाव लड़ा था तब कार्यकर्ताओं से राय लेने की साथ ही विधानसभा में संभावित उम्मीदवारों के बीच वोटिंग भी कराई गई थी। फिर लोगों से राय लेने के बाद पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी ने उम्मीदवारों के नाम तय किए। पिछली लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनने के लिए कई राज्यों में लोगों से आवेदन मांगे गए। आवेदन में हर विधानसभा क्षेत्र से 100-100 वोटरों के साइन कराने थे जिसके बाद स्क्रीनिंग कमिटी ने आवेदकों के इंटरव्यू लिए।

शॉर्टलिस्ट किए गए कैंडिडेट्स पर लोगों की राय मांगी और फिर पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी ने नाम फाइनल किए। लेकिन इस बार दिल्ली में पार्टी ने पहले नेताओं को लोकसभा प्रभारी बनाया। इन नेताओं ने उस लोकसभा क्षेत्र में काम करना शुरू किया और बाद में उन्हीं प्रभारियों को लोकसभा उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। पंजाब में भी पार्टी ने अपने उम्मीदवार घोषित किए हैं। वहां पंजाब की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी से आए उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा के बाद मुहर लगाई गई।

(साई फीचर्स)

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