ठेकेदार की लापरवाही पर लचीला रवैया

 

 

(शरद खरे)

सिवनी में अजीब तरह की प्रशासनिक व्यवस्था का आलम है। जनता का, जनता के लिये, जनता के द्वारा शासन की अवधारणा से उलट यहाँ जनता की सुध लेने या जनता के रिसते घावों पर मरहम लगाने की बजाय ठेकेदारों के प्रति लचीला रवैया अपनाया जा रहा है जो चिंतनीय है।

एक नहीं सैकड़ों उदाहरण सिवनी में मौजूद हैं जो यह बात सिद्ध करने के लिये पर्याप्त माने जा सकते हैं कि ठेकेदारों को घोषित या अघोषित तौर पर लाभ पहुँचाने के लिये प्रशासनिक तंत्र को ठेकेदारों के द्वारा अपने हिसाब से हांका जा रहा है। जनता कराह रही है पर इसकी सुध लेने की फुर्सत किसी को भी नहीं दिख रही है।

सिवनी में फोरलेन पर नये बायपास के किसी स्थान पर लेवल तीन का ट्रामा केयर यूनिट प्रस्तावित था। नियमानुसार इस ट्रामा केयर यूनिट को वर्ष 2010 में आरंभ हो जाना चाहिये था। विडंबना ही कही जायेगी कि इस यूनिट को 2019 में भी बनाया तक नहीं जा सका है। इन नौ सालों मेें दो लोकसभा के चार सांसद भी इसे बनवा नहीं पाये। इस सड़क का काम करने वाले ठेकेदार को इस काम को किये बिना ही भुगतान कर दिया गया जो अवैध ही माना जायेगा, क्योंकि इस पर किसी तरह की रोक की बात भी सामने नहीं आयी थी।

इसके अलावा जिला अस्पताल में बनी ट्रामा केयर यूनिट की बिल्डिंग भी लगभग चार सालों से ठूंठ के मानिंद ही खड़ी है। इसी तरह पॉलीटेक्निक कॉलेज में गर्ल्स हॉस्टल का भवन भी कमोबेश इतने ही समय से बनकर तैयार है। इस तरह के भवनों का उपयोग अगर नहीं किया जाना था तो इन्हें बनाया क्यों गया!

इसके अलावा नवीन जलावर्धन योजना भी इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण माना जा सकता है। नवीन जलावर्धन योजना आज लगभग चार साल विलंब से चल रहा है। इसके निर्माण में गलती ठेकेदार की है अथवा नगर पालिका के द्वारा ठेकेदार को जरूरी अनुमतियां नहीं उपलब्ध करायी गयीं यह शोध का विषय हो सकता है पर जनता को इससे ज्यादा सरोकार नहीं है। जनता तो बस यही कहती है कि समय सीमा के मायने क्या हैं!

इस योजना में जिला स्तर की जाँच समिति खामी पाती है। उसके सामने टेस्टिंग लैब का न होना सबसे बड़ी गलती के रूप में सामने आता है। इसके बाद राज्य स्तर की जाँच समिति को ठेकेदार के द्वारा प्रयोगशाला कहाँ दिखा दी गयी इस बारे में प्रश्न करने से सांसद-विधायक भी कतराते नजर आते हैं।

जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह के द्वारा 28 फरवरी की तारीख इस योजना को आरंभ करने के लिये तय की गयी थी। उनके द्वारा दी गयी समय सीमा बीते 33 दिन हो गये हैं, इसके बाद भी कार्यवाही सिफर ही है। प्रदेश में सत्तारूढ़ काँग्रेस और विपक्ष में बैठी भाजपा के विधायक भी मौन हैं। मौन तो दोनों के जिला और नगर संगठन भी हैं। अंततोगत्वा मरण तो आम जनता की ही है . . .!

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