अस्तित्व खोने की ओर तेजी से अग्रसर हैं ऐतिहासिक बावड़ियां

 

 

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। सिवनी में गर्मी ने अपने तेवरों को मार्च के दूसरे पखवाड़े से ही जताना आरंभ कर दिया। स्थिति यह है कि मार्च के अंतिम दिनों में अधिकतम तापमान जहाँ 40 डिग्री सेल्सियस को पार करने के बाद वापस लौटता दिख रहा था वह अप्रैल की तीन तारीख को एक बार फिर 40 डिग्री सेल्सियस के ऊपर पहुँच गया।

नागरिकों की मानें तो गर्मी के तल्ख होते तेवरों के मध्य पेयजल की समस्या को भी समझा जा सकता है क्योंकि सिवनी एक ऐसा जिला है जो एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बाँध को अपने अंदर सहेजने के बावजूद जल संकट से बारिश के दिनों में भी जूझता रहता है। सिवनी के जल स्त्रोत उपेक्षा के शिकार हो चले हैं। इनमें से कई स्त्रोत तो ऐसे हैं जो भविष्य में इतिहास का हिस्सा भी बन सकते हैं।

एक समय था जब सिवनी में कई बावड़ियां हुआ करतीं थीं जो अपने आसपास के संपूर्ण क्षेत्र को पानी से तर करतीं थीं लेकिन ये बावड़ियां रख रखाव के अभाव में आज खुद प्यासे दिखने लगी हैं। कुछ वर्षों पहले सिवनी में पदस्थ रहे जिला कलेक्टर धनराजू एस. ने अवश्य इन बावड़ियों की सुध लेने की कोशिश की थी लेकिन उनकी कोशिश परवान चढ़ पाती उसके पहले ही उनका तबादला हो गया और उनके जाते ही यह जन हितैषी पहल भी दम तोड़ गयी।

सिवनी ही नहीं बल्कि जिले के अन्य क्षेत्रों के बारे में जानकारी देते हुए संबंधित क्षेत्रों के नागरिकों ने बताया कि लखनवाड़ा और लखनादौन के साथ ही साथ घंसौर में भी इस तरह के जल संरक्षण की व्यवस्थाएं मौजूद थीं। क्षेत्र वासियों का कहना है कि यदि यहाँ स्थित बावड़ियों की आज भी सुध ले जी जाये तो ये पुनः विशाल क्षेत्रों की प्यास बुझाने में सक्षम हैं। यही नहीं बल्कि यदि इन बावड़ियों के रख रखाव की ओर ध्यान दिया जाकर पहल की जाती है तो भूमिगत जल स्तर को भी उठाया जा सकता है।

सिवनी के शुक्रवारी क्षेत्र में दीवान महल आज भी है। बताया जाता है कि दीवानखाने में कभी कचहरी भी लगा करती थी। इसी दीवान महल में एक प्राचीन बावड़ी भी स्थित है जिसके बारे में शहर के ही अधिकांश लोगों को शायद जानकारी भी नहीं हैं बताया जाता है कि इस बावड़ी से एक सुरंग भी निकाली गयी थी जो लखनवाड़ा स्थित बावड़ी तक पहुँचती थी।

इस बावड़ी के बारे में बताया जाता है कि यह कभी नहीं सूखा करती थी। लखनवाड़ा स्थित बावड़ी तो आज भी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में मानी जा सकती है। देखरेख के अभाव में यहाँ झाड़ियां ऊग आयी हैं। लखनवाड़ा की बावड़ी के बारे में एक जनश्रुति यह भी है कि यहाँ से निकली सुरंग लगभग सौ किलोमीटर दूर स्थित रामटेक तक जाती थी।

बताया जाता है कि सिवनी का क्षेत्र पूर्व में विदर्भ राज के अंतर्गत आता था। जानकार बताते हैं कि शेरशाह सूरी के द्वारा बनायी गयी जीटी रोड के किनारे कई बावड़ियां स्थित हैं। पुरातत्व विभाग से यदि इस संबंध में जानकारी जुटानी की कोशिश की जाये तो वह भी ज्यादा कुछ नहीं बता पता है जिसके कारण यह जानना मुश्किल हैं कि इन बावड़ियों को किसके शासन काल में निर्मित करवाया गया था और ये कितने वर्षों पुरानी हैं।

लखनादौन स्थित बावड़ी भी रख रखाव के अभाव में दम तोड़ रही है। गंदगी से सराबोर हो चुकी यह बावड़ी वर्तमान में अतिक्रमण की चपेट में है। आदेगाँव क्षेत्र जहाँ भोसले राजाओं के द्वारा बनवायी गयी एक गढ़ी भी स्थित है, के अंतर्गत ही पहले लखनादौन आता था। जानकारों का कहना है कि लखनादौन की बावड़ी भी इसी गढ़ी का हिस्सा हो सकती है। विदर्भ राज्य से आने वाली सेनाएं पहले इसी गढ़ी में विश्राम किया करतीं थीं।

बताया जाता है कि बाद में गढ़ा मण्डला के गौड़ राजाओं के आधिपत्य में यह क्षेत्र आ गया। मण्डला जिले के रामनगर में भी एक बावड़ी पायी जाती है जिसकी संरचना इन्हीं बावड़ियों की तरह है। लखनादौन की बावड़ी से सुरंग के बारे में क्षेत्रीय वासी बताते हैं कि कुछ दशक पूर्व यहाँ एक भैंस डूब गयी जो लगभग 15 किलोमीटर दूर दर्शनीय स्थल मठघोघरा में में मिली थी। इसी तरह की एक बावड़ी हनुमान मंदिर के पास भी है जहाँ आज लोग कण्डे थोपा करते हैं।

सिवनी जिले में पुरानी बावड़ियों के रख रखाव की ओर ध्यान न दिये जाने के कारण यहाँ उत्पन्न होने वाले जल संकट के समय लोगों को काफी जद्दोजहर का सामना करना पड़ता है। बैनगंगा नदी के तट पर बसे होने के बावजूद लखनवाड़ा में पानी की किल्लत जब-तब सिर उठाये खड़ी रहती है। यहाँ स्थित कुंए में फ्लोराईड की मात्रा अत्याधिक होने के कारण यह पीने के योग्य नहीं है ऐसे में यहाँ स्थित बावड़ी को पेयजल का बेहतर माध्यम बनाया जा सकता है लेकिन इस दिशा में कोई प्रयास न किये जाने के कारण ग्राम वासियों में निराशा का वातावरण है।

लखनादौन की बावड़ी अतिक्रमण की चपेट में आ चुकी है जिसके कारण इसका रख रखाव संभव नहीं रह गया है। इस बावड़ी में गंदगी ने पैर पसार लिये हैं और पानी अत्यंत दूषित हो चुका है जिसमें काई ऊग आयी है। रही बात सिवनी की बावड़ी की तो यह भी समाप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी है।

पुरातत्व विभाग में इन बावड़ियों से संबंधित कोई जानकारी नहीं मिलती है जिसके कारण संभव है कि इनकी ओर ध्यान देने का ही प्रयास नहीं किया गया। इन बावड़ियों की यदि प्रशासन सुध लेता है तो इनके संरक्षण की दिशा में कदम उठाये जाकर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जाने की अपेक्षा की जा सकती है। युवा एवं ऊर्जावान संवेदनशील कलेक्टर प्रवीण सिंह अढ़ायच से लोग अपेक्षा कर रहे हैं कि वे अवश्य इन लुप्त होतीं बावड़ियों के बेहतर रख रखाव की दिशा में कदम अवश्य उठायेंगे।

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