गुलजार हुआ दिल्ली का पर्दाबाग, पुरुषों का आना है निषिद्ध

 

 

(विवेक शुक्ला)

यह आधी दुनिया के लिए चंद पल चौन से गुजारने-टहलने की जगह है। महिलाओं की सत्ता यहां स्थायी रूप से बनी रहती है। सत्ता का हस्तांतरण यहां संभव ही नहीं है। इस जगह का नाम है पर्दाबाग। दरियागंज में हैपी स्कूल से चंदेक कदम की दूरी पर है पर्दाबाग। नाम से ही संकेत मिल रहा है कि यह पुरुषों के लिए निषिद्ध स्थान है। उनका प्रवेश इधर वर्जित है। पुरुषों के नाम पर इस पार्क के भीतर सिर्फ माली या पांच-सात साल की उम्र वाले बच्चे ही जा सकते हैं।

इस हरे-भरे बगीचे में गुलाब ही गुलाब खिले हैं। तपती दोपहरी में पर्दाबाग में लगे नीम, अर्जुन, जामुन, पीपल वगैरह के दर्जनों पेड़ों के नीचे बैठने पर सुकून मिलता है। इन बुजुर्ग पेड़ों की छाया राहत देती है। इन पेड़ों को लगाए एक अर्सा गुजर गया है। इन्हीं छायादार पेड़ों के नीचे आजकल कुछ अनजाने चेहरे दिखाई देने लगे हैं। ये विभिन्न दलों की महिला कार्यकर्ता हैं। चुनाव प्रचार के लिए ये पर्दाबाग में घूमने के लिए आने वाली महिलाओं से मिल रही हैं। उन्हें बता रही हैं कि क्यों उनकी पार्टी की नीतियां बाकी पार्टियों से बेहतर हैं। यहां घूमने के लिए आई महिलाएं इनसे सवाल भी पूछ रही हैं। इनके बीच राजनीतिक चर्चा कायदे से चलती है। जैसे-जैसे दिल्ली में लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आएगी, वैसे-वैसे पर्दाबाग और ज्यादा गुलजार होने लगेगा। तब ये महिला कार्यकर्ता प्रायः दरियागंज और चांदनी चौक से इस तरफ आने वाली महिलाओं से अपना संपर्क बढ़ाएंगी।

और यह मत समझिए कि पर्दाबाग में सिर्फ अनाम राजनीतिक कार्यकर्ता ही आती हैं। कम से कम दो बार तो खुद इंदिरा गांधी पर्दाबाग में प्रचार के लिए आ चुकी हैं। वह 1971 और 1980 के लोकसभा चुनावों में प्रचार के लिए यहां पर आईं। वह जब पर्दाबाग के भीतर गईं तो उनके साथ कांग्रेस की कुछ महिला कार्यकर्ता ही थीं। उनके अलावा वह अपने साथ एक-दो महिला सुरक्षाकर्मी को भी लेकर भीतर गईं। कुछ देर तक शाहजहानाबाद की महिलाओं से बातचीत करने के बाद वह आगे निकल जाया करती थीं।

पर्दाबाग में चुनाव प्रचार के लिए अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी, सुभद्रा जोशी और ताजदार बाबर जैसी सम्मानित महिला नेता भी जाती थीं। अरुणा जी यहां पर घूमने के लिए भी आना पसंद करती थीं। पर्दाबाग मुगल बादशाह शाहजहां की पुत्री जहांआरा बेगम ने बनवाया था। इसे बेगम का बाग भी कहा जाता रहा है, हालांकि यह नाम अब नेपथ्य में चला गया है। एक पर्दाबाग चांदनी चौक में हरदयाल लाइब्रेरी के पीछे भी है, पर वह दरियागंज वाले पर्दाबाग के मुकाबले काफी छोटा है।

(साई फीचर्स)

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