चुनाव में शालेय वाहन!

 

 

इस स्तंभ के माध्यम से मैं जिला प्रशासन से अपील करना चाहता हूँ कि लोकसभा चुनाव में शालेय वाहनों का उपयोग न करना पड़े, ऐसी व्यवस्थाएं बनायी जायें।

चुनाव के दौरान शालेय वाहनों को अधिग्रहित कर लिये जाने के कारण शिक्षण कार्य पर इसका प्रभाव पड़ता है जिसके कारण विद्यार्थियों का नुकसान होता है। एक तरफ तो शिक्षा को सभी के द्वारा अत्यंत महत्व दिया जाता है लेकिन चुनाव के दौरान शालेय वाहनों का अधिग्रहण किये जाते समय इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया जाता है कि इसके चलते विद्यार्थियों का शाला पहुँचना मुश्किल हो जायेगा।

संभव है कि प्रशासन के पास वाहनों की कमी हो तो इसके लिये पड़ौसी राज्य महाराष्ट्र से यदि हो सके तो वाहनों को बुलवाया जाना चाहिये लेकिन विद्यार्थियों की सुविधा को देखते हुए शालेय वाहनों को चुनाव ड्यूटी में खपाये जाने से परहेज किया जाना चाहिये। इससे संदेश भी सही नहीं जायेगा।

महाराष्ट्र से इसलिये वाहनों को बुलवाया जा सकता है क्योंकि वहाँ 29 अप्रैल को चुनाव नहीं हैं। पता नहीं इस संबंध में प्रशासन ने पहले से कोई विचार करते हुए कोई व्यवस्था बनायी है अथवा नहीं लेकिन ऐसा पता चला है कि चुनाव में शालेय वाहनों के उपयोग के चलते कुछ शालाएं 23 अप्रैल के आसपास से ही छुट्टी करने का विचार कर रही हैं। यदि ऐसा होता है तो वर्तमान सत्र में लगभग एक हफ्ते की पढ़ायी का नुकसान विद्यार्थियों को तब हो जायेगा जबकि इस बीच में कोई घोषित छुट्टी भी नहीं है।

यदि प्रशासन को शालेय वाहनों की बहुत ही ज्यादा आवश्यकता है तो कम से कम इतना तो अवश्य ही किया जा सकता है कि इन शालेय वाहनों को अंतिम समय में ही चुनाव ड्यूटी के लिये बुलवाया जाये, इससे विद्यार्थियों की पढ़ायी का होने वाला नुकसान तो नहीं रोका जा सकेगा अलबत्ता उसे कम जरूर किया जा सकता है। इसके साथ ही इन शालेय वाहनों को आसपास के ही क्षेत्रों में भेजा जाये जिससे ये 29 अप्रैल की शाम या रात को जल्द लौटकर आ जायें जिसका फायदा ये होगा कि ये वाहन 29 अप्रैल के दूसरे दिन अपनी सेवाएं शालाओं में पूर्ववत देने लगेंगे और विद्यार्थी समय पर अपनी शाला पहुँच जायेंगे।

वैसे चुनावों में शालेय वाहनों का उपयोग किया जाना समझ से परे ही होता आया है। शासन – प्रशासन के द्वारा शिक्षा के महत्व को दरकिनार करते हुए अपनी सुविधा के हिसाब से शालेय वाहनों को अधिग्रहित किया जाता रहा है जबकि संबंधितों के द्वारा यदि इस संबंध में पहले से तैयारी की जाये तो शायद शालेय वाहनों की आवश्यकता चुनाव में न पड़े। शालाओं के शिक्षक चुनाव ड्यूटी पर अवश्य जाते हैं लेकिन उन्हें इतने लंबे समय तक शालाओं से दूर नहीं रहना होता है जितना पहले वाहनों का अधिग्रहण कर लिया जाता है। अपेक्षा है कि सिवनी में प्रशासन शालेय वाहनों को चुनाव ड्यूटी से दूर रखने का हर संभव प्रयास करेगा जिससे दूसरे स्थानों के लिये यह नजीर बन सके।

इरफान खान