उफ! कैसा वक्तः अंधेर नगरी, पार्टी राजा

 

 

(शंकर शरण)

अधिकांश लोग पार्टी-निरपेक्ष देशभक्त होते हैं। यहाँ कुछ लोग पार्टी-सापेक्ष देशभक्त भी हैं। इन में अनेक आजकल अन्य देशभक्तों की खिल्ली उड़ाने, डराने में लगे हुए हैं। यह दोहरी भूल है। एक तो देश हम सब का है, इस के हित-अहित पर सोच-विचार का सब को समान अधिकार है। अतः मत-वैभिन्य का आदर करना चाहिए। दूसरे, अनिच्छित परिणाम होने पर अन्य को दोष देना तर्कहीन होगा। आखिर जीत के बाद तो किसी को कोरा थैंक्यू भी नहीं दिया जाता! सारा श्रेय रणनीतिकार स्वयं लेते हैं। तब हार के बाद मोहभंगित समर्थकों को दोष क्यों देना, जिन की आवाज कभी-किसी गिनती में नहीं ली जाती?

इसलिए, भक्त लोग न उलाहना दें, न डराएं। केवल चित्र-विचित्र दलीलों से उन दो-तीन प्रतिशत लोगों को उत्साहित नहीं किया जा सकता जिन्हें भिन्न आशाएं थीं, और जो अब उदासीन हो चुके। ऐसा प्रायः किसी लोभ या मोह नहीं, वरन अनुभव से हुआ है।

भक्त जिन की तुलना में साहबों को बेहतर बता रहे हैं, उन से इन का कोई मौलिक अंतर नहीं है। वरना अनेक जरूरी काम निर्विवाद हो सकते थे। लेकिन वे तो अधिकांश समय इतराते, प्रवचन देते या दूसरों का मजाक उड़ाते रहे! यह भी न समझा कि उन से ऐसा हल्कापन अपेक्षित न था। बल्कि यह प्रदर्शन आश्चर्यजनक था। सर्वाेच्च स्थान से समय और संसाधनों की ऐसी र्बबादी बचपने की हद थी!

कोई बच्चा ही नया सूट या साइकिल पाकर इठलाता, उसे दिखाने दूसरे घर-मुहल्ले जाता है। वही चाहता है कि सब हमेशा उसे ही देखें, उसी की बड़ाई करें। चाहे झूठी भी। ऊट-पटाँग कामों पर भी वाह-वाह करें। वरना वह रूठता है। बच्चा ही कल्पना करता है कि किसी जादुई पोशाक, आवाज से दुश्मनों के छक्के छुड़ा देगा। वही भोला मानता है कि उस का काम केवल इच्छा करना है! पूरा करना तो दूसरों की जिम्मेदारी है।

सो, यदि व्यवस्था नहीं सुधरी, अपराधकर्मी वैसे ही बने रहे, लोग मरते, जलील होते रहे, मिलावटखोरी चलती रही, दुश्मन पस्त न हुए, शिक्षकों का एक्सपोर्ट शुरू न हो गया, वैज्ञानिकों-उद्योगपतियों ने नए-नए पेटेंट कराकर मेक इन इंडिया को सार्थक न किया, तो जरूर सब काहिल हैं। उन्होंने बच्चे की चाह पूरी न की। बच्चा तो बिलकुल अच्छा, सच्चा, सुनीयत वाला है। सारी गड़बड़ी दूसरों की। पर ऐसी सोच बचपना है। कोई समझदार तो हाथ में मिले साधन का कण-कण और क्षण-क्षण सदुपयोग करेगा।

तो कौन सा लक्ष्य निर्धारित हुआ था? सब का साथ, सब का विकास, या कांग्रेस-मुक्त भारत? दोनों लक्ष्य इतने खोखले थे कि छोड़े भी जा चुके। सो अब हिन्दू मुस्लिम राग अलापा जा रहा है। ऐसे बाल-नायक क्या करेंगे, जिन्हें चार साल चल सकने लायक भी नारा तक चुनना नहीं आता! जिन के शब्द विचारहीन हों, उन के कर्म सार्थक नहीं हो सकते। चाहे उन्हें जितना समय दे दो।

फिर, बच्चा ही हर हाल में सब को चकमा देने की आस रखता है। जिस ने होमवर्क नहीं किया, और अब दंड भय से बहाने बना, बात बदल कर, भुलावा देकर निकलना चाहता है। वही चाहता है कि उसे जिताने के लिए घरवाले जान-बूझ कर हार जाएं, खेल के नियम तोड़ें, और उस की गलतियाँ अनदेखा करें।

यह संपूर्ण परिदृश्य अयोग्यता, विचार-हीनता, प्रशिक्षण-हीनता का मामला है। नीयत का नहीं। सही नीयत रहते भी भारी विनाश हो सकता है। अतः सच्चे देशभक्तों को सदैव नीतियों, समस्याओं पर विमर्श व अभियान चलाना चाहिए – किन्हीं पार्टियों या नेताओं पर नहीं। मात्र सांकेतिक भंगिमाओं, जुमलों से आशान्वित हो-होकर वे हमेशा ठगे जाएंगे।

भंगिमाएं देने वाले तो कुछ समय सत्तासीन रह कर नेपथ्य, या परलोक जाते रहेंगे; और नए-नए स्वांग भरने वाले आते रहेंगे। वही हाल उन के भक्तों का होगा। वे भी लुप्त होते, बदलते रहेंगे। लेकिन इस बीच, सामाजिक स्थिति बिगड़ती जा सकती है। अतः चिन्ता सामाजिक उन्नति की रहे, दलीय नहीं।

हमारा समाज अनेक दलों को समर्थन देता है। केवल एक को देने से सामाजिक एकता मानना कम्युनिस्ट, हानिकारक मानसिकता है। उसे छोड़ कर सामाजिक चेतना की फिक्र करें। समर्थन या विरोध का फोकस ठोस नीतियों, कार्यों पर होना चाहिए। इस में इस्लामियों, ईसाई मिशनरियों से सीखें। वे हर उस दल, नेता को समर्थन देने बैठे रहते हैं, जो उन के बुनियादी हित बढ़ाए। किसी खास के वफादार वे नहीं रहते। वही ढंग हिन्दू भी अपनाएं। वरना धोखा खाते रहेंगे। उलटे उन्हीं से दुर्वचन सुनेंगे जिन की मदद की। सीताराम गोयल, अरुण शौरी, कोनराड एल्स्ट, जैसे कई समर्थकों का यही हश्र हुआ।

कम्युनिस्टों वाली पार्टी-मानसिकता से ही वैसे अनूठे विद्वानों का चरित्र-हनन और फजीहत की गई। मानो यदि उन्होंने किसी नेता-विशेष की जयकार न की, तो सत्यानाश कर दिया! उन का सारा सामाजिक-सांस्कृतिक काम बेकार रहा। ऐसी पार्टी-भक्ति बेहद हानिकर और मूर्खतापूर्ण है। केवल सत्तासीनों का मुँह देख-देख कर निंदा या प्रशंसा करना कोई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद नहीं है। पार्टी-बद्ध दलीलों को छोड़ कर मुद्दों पर टिकना ही श्रेयस्कर है। पार्टी-नेता-भक्ति से ऊपर देशभक्ति रहनी चाहिए। पार्टी-निरपेक्ष देशभक्तों का भी वही सम्मान करना चाहिए। बल्कि, कुछ अधिक ही! क्योंकि स्वतंत्र चेतना रखने के कारण वे उस से अधिक देख व बता सकते हैं जो पार्टी-सापेक्ष लोग नहीं कर पाते।

पर दुर्भाग्यवश यहाँ उलटा रहा है। गाँधी और नेहरू ने अपने वफादारों, चाटुकारों को प्रश्रय देने की पंरपरा चलाई। संयोगवश उन में कुछ सुयोग्य भी थे। किन्तु सचेत मानदंड शास्त्र-सम्मत नहीं, बल्कि मनमर्जी थी। इसीलिए अंधेर नगरी, पार्टी राजा (या बालक राजा) वाली बात उन के अनेक कामों से चरितार्थ हुई। जैसे, खलीफत, कश्मीर, तिब्बत, आदि मामले, सुरक्षा परिषद में भारत को मिल रही स्थाई सीट छोड़ना, स्तालिन का गुणगान, कारखानों को मंदिर कहना, अंग्रेजी को देश के सिर पर बैठा देना, आदि। यह सब अच्छी नीयत से किए हुए मूढ़ काम थे।

वही परंपरा जारी है। विशेषकर हिन्दू राष्ट्रवादियों में। योग्यता-अयोग्यता, नीति-अनीति, सामाजिक लाभ-हानि कोई कसौटी नहीं। सब कुछ राजा की झक और मन की तरंग। बाकी फूहड़ काम को भी महान कहने को पार्टी तैयार बैठी है!

इस बीच, सभी गड़बड़ी का दोष डालने के लिए मृत विदेशियों से लेकर वर्तमान कर्मचारियों तक, किसी के सिर डाल श्हम तो महात्माश्, हम शांति-प्रेमी, ईमानदार, कर्मठ, आदि लटके मौजूद हैं। जो गाँधी जी से लेकर आज तक चल रहे हैं। यह सब लज्जास्पद है।

फलतः समाज की दशा कुछ अंधेर नगरी जैसी है। नीति, कानून तोड़ने वाले विधि-निर्माता हैं। जिसे आचार्य होना चाहिए, वह बैंक-क्लर्क है। जिसे शिक्षक होना चाहिए था, वह अर्दली है। जिसे अर्दली होना चाहिए, वह विद्वानों को निर्देश देता है। ढोलबज्जा चिंतक बन बैठा है। जिसे किसी सामाजिक परियोजना का संचालक होना चाहिए, वह पार्टी-प्रचारक बनने को मजबूर है। साहित्यकार ट्रैफिक-सिगनल समझाने का काम कर रहा है। कोई बौद्धिक तपस्वी भूखे मरने के करीब है। अंधेर नगरी और किसे कहते हैं!

(साई फीचर्स)

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