दिशा निर्देश बहुत हुए, अब हो कार्यवाही!

 

 

हम शर्मिंदा हैं शुभाश्री . . . 02

(लिमटी खरे)

अर्द्ध सैनिक बल की महिला आरक्षक शुभाश्री के निधन के बाद प्रशासन जागा है। आनन-फानन जिला अस्पताल के ट्रामा केयर यूनिट की सुध ली गयी है। 65 करोड़ की लागत का यह भवन सालों से धूल खा रहा है। डॉ.राजेंद्र कुमार श्रीवास्तव मुख्य चिकित्सा अधिकारी रहे, उनके बाद वर्तमान में डॉ.के.सी. मेश्राम सीएमएचओ हैं। इधर, सिविल सर्जन की बात की जाये तो जिस समय इस भवन को बनाया गया था उस समय डॉ.एस.एन. सोनी इस पद पर थे। उनके बाद डॉ.पुष्पा तेकाम, फिर डॉ.महेंद्र नारायण सूर्यवंशी और इनके बाद एक बार फिर डॉ.आर.के. श्रीवास्तव को सीएस का प्रभार दिया गया। डॉ.श्रीवास्तव के सेवा निवृत्त होने के बाद अब डॉ.विनोद नावकर को सिविल सर्जन बनाया गया है।

सिवनी में साल भर में होने वाली दुर्घटनाओं, इनमें घायल होने वाले और जान गंवाने वालों के बारे में जिला प्रशासन को जानकारी एकत्र करना चाहिये। इसके साथ ही साथ जिला चिकित्सालय में एक साल में दुर्घटना के कितने मरीज आये और कितने मरीजों को सिवनी से नागपुर रिफर किया जाये इसकी जानकारी भी निकाली जानी चाहिये। अगर ईमानदारी से इस बात का पता लगाया जाये तो आँकड़े निश्चित तौर पर भयावह ही होंगे।

इस सबको देखते हुए जिला मुख्यालय में ट्रामा केयर यूनिट की स्थापना सालों पहले हो जाना चाहिये थी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के द्वारा फोरलेन बनाने के पूर्व बनाये गये विस्तृत प्राक्कलन (डीपीआर) में सिवनी शहर के बायपास पर ट्रामा केयर यूनिट की संस्थापना की बात ऐसे ही नहीं प्रस्तावित की गयी थी। किसी भी सड़क को बनाने के पहले उस सड़क पर यातायात का दबाव, दुर्घटनाओं की तादाद आदि का ध्यान भी रखा जाता है।

विडंबना ही कही जायेगी कि सिवनी में एनएचएआई का ट्रामा केयर यूनिट जो वर्ष 2010 में इस सड़क के अधिकांश हिस्से के पूरा होते ही करवा दिया जाना चाहिये था, उसका निर्माण आज दिनाँक तक नहीं हो पाया है। यह है सिवनी में सियासतदारों और अधिकारियों की सिवनी के नागरिकों के प्रति जवाबदेही। इस सड़क के लिये आंदोलन करने वाले नेता भी अब पार्श्व में ही चले गये हैं। उन्हें भी इस बात से अब ज्यादा सरोकार नहीं रह गया है।

वर्ष 2012 से समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया के द्वारा इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया जाता रहा है। दैनिक हिन्द गजट के द्वारा भी इस मामले को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया जाता रहा है। तत्कालीन जिला कलेक्टर भरत यादव का कार्यकाल जिले के निवासियों और उनके समय से अब तक यहाँ पदस्थ रहे सरकारी नुमाईंदों को बेहतर तरीके से याद होगा। उनके कार्यकाल से अब तक जिलाधिकारियों के द्वारा सिर्फ और सिर्फ निर्देश ही जारी किये जाते रहे हैं। याद नहीं पड़ता कि किसी जिलाधिकारी के द्वारा सिवनी की समस्याओं को लेकर कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ किसी तरह की ठोस कार्यवाही की गयी हो। अधिकारी भी यह जानते हैं कि जो भी जिलाधिकारी कड़े निर्देश जारी कर रहे हैं उनकी आँख-नाक-कान बने बैठे उनके पिछलग्गुओं के द्वारा उन्हें इस कदर शीशे में उतार लिया जाता है कि इस तरह के निर्देशों को अमली जामा पहनाने के बारे में इन पिछलग्गुओं को शायद ही कभी फुर्सत मिल पाये। यही कारण है कि जिलाधिकारियों के निर्देशों को जिले में पदस्थ रहे अधिकारियों के द्वारा हवा में ही उड़ा दिया जाता रहा है। अधिकारी अपना कार्यकाल पूरा करते हैं और दूसरे जिले के लिये रवानगी डाल देते हैं।

हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि जिले के किसी भी जिलाधिकारी का स्पष्ट विजन कभी सामने आया हो, ये परिस्थितियां इक्कीसवीं सदी में ही बनीं हैं। इसके पहले अधिकारियों के एक निर्देश पर उनके मातहत अधिकारी सहम जाया करते थे। यह परंपरा सालों से बंद ही दिख रही है।

हमारा कहना महज इतना सा है कि जिलाधिकारियों को आम जनता से संवाद करना चाहिये। अगर संवादहीनता की स्थिति बनी रहेगी तो अधिकारी सिवनी को उसी रंग से देख पायेंगे जिस रंग का चश्मा इन पिछलग्गू अधिकारियों के द्वारा लगाया जायेगा। इसका परिणाम पिछले दो दशकों में सिवनी में देखने को मिला है। या यूँ कहा जाये कि जिले को प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया गया है तो अतिश्योक्ति नहीं होगा।

जिले के सांसद-विधायकों के द्वारा भी जनता की समस्याओं पर अधिकारियों से चर्चा करने और उसका हल निकालने की बजाय इससे बचने का प्रयास ही किया जाता रहा है। यह परंपरा जिले के लिये घातक मानी जा सकती है। हमने यह किया, हमने वह किया, वह अधिकारी हमारी नहीं सुनता, फलां अधिकारी पर उस बड़े नेता का हाथ है जैसे जुमले आये दिन सियासतदारों के मुँह से सुनने को मिल जाते हैं।

जनता ने इन सियासतदारों को जनादेश इसलिये नहीं दिया है कि ये सियासतदार भी जनता की तरह ही अपने आप को बेबस और लाचार होने का स्वांग रचें। एक सांसद एक विधायक के अधिकार कर्त्तव्य क्या हैं! इस बात को अगर सियासत दार समझ जायें तो क्या कहने। हो सकता है कि सियासतदार इन अधिकार और कर्त्तव्यों को जानते-बूझते अंजान बनने का स्वांग रचते हों। किसी ने सही कहा है कि जगाया उसे जा सकता है जो सो रहा हो! जो सोने का नाटक करे उसे आप कभी भी जगा नहीं सकते!

बहरहाल, शुभाश्री के मामले में जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह कुछ संजीदा नजर आ रहे हैं। इसलिये उन्हें चाहिये कि वे इस मामले में कुछ ठोस अवश्य करें। दिशा निर्देश तो पहले भी जारी होते आये हैं पर इन दिशा निर्देशों का क्या असर हुआ यह बात किसी से छुपी नहीं है। (क्रमशः जारी)

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