लोकतंत्र मजबूत तो नहीं हो रहा!

 

 

(शशांक राय)

हर चुनाव के साथ लोकतंत्र को मजबूत होना चाहिए और चुनाव प्रचार के मुद्दों से लेकर नेता के व्यवहार तक को और बेहतर होना चाहिए। पर भारत में उलटा हो रहा है। पहले गंभीर और आम लोगों के जीवन से जुड़े मुद्दों पर वोट मांगे जाते थे। पर अब लोगों को भावनात्मक रूप से, जातिगत रूप से, धार्मिक रूप से एकजुट करने का प्रयास होता है। पहले नेताओं की भाषा शालीन होती थी अब धीरे धीरे बेहद हिंसक और आक्रामक होती जा रही है।

पहले शायद ही कोई नेता होता होगा, जो चुनाव आयोग की तय सीमा से ज्यादा खर्च करता होगा पर अब नकदी की अधिकता के कारण चुनाव रद्द किए जा रहे हैं। पहले अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बगैर ही चुनाव हो जाते थे पर अब तमाम तैनाती के बावजूद कानून-व्यवस्था की स्थिति के आधार पर चुनाव टाले जा रहे हैं। पहले बूथ कैप्चरिंग होती थी और अब इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में छेड़छाड़ के आरोप लग रहे हैं। पहले विचारधारा के नाम पर पार्टियां बनती थीं और अब जाति के नाम पर पार्टियां बन रही हैं।

तभी सवाल है कि 1952 के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर 2019 के 17वें लोकसभा चुनाव तक भारत का लोकतंत्र कहां से कहां पहुंचा है? पहला चुनाव देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि में लड़ा गया था पर तब भी इसकी मिसाल नहीं है कि किसी पार्टी ने हिंदू और मुसलमान के नाम पर वोट मांगा। चुनाव से ठीक पहले बनी पार्टी भारतीय जनसंघ हिंदुओं की प्रतिनिधि पार्टी थी पर उसने भी ध्रुवीकरण का कोई प्रयास नहीं किया। अब छोटा-बड़ा हर नेता धर्म और जाति के नाम पर वोट मांग रहा है।

इस बार के चुनाव प्रचार की नंबर एक चिंता प्रचार में धर्म के इस्तेमाल की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के पिछले विधानसभा चुनाव में शमशान और कब्रिस्तान की बात कही थी। इस बार बात उससे आगे बढ़ गई है। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह घुसपैठियों, आतंकवादियों, पाकिस्तान आदि के सहारे छद्म रूप से हिंदू-मुस्लिम की बात कर रहे हैं तो कुछ नेता खुल कर इस नाम पर वोट मांग रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुल कर कहा कि विपक्ष अली वाला है और हम बजरंग बली वाले हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने मुस्लिम मतदाताओं से अपील कर डाली कि भाजपा को हराने के लिए वे अपना वोट नहीं बंटने दें।

कांग्रेस के स्टार प्रचारक नवजोत सिंह सिद्धू ने भी मुसलमानों से एकजुट होकर वोट डालने की बात कर दी। धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल कैसे हो रहा है इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि केरल में भगवान अयप्पा के भक्तों और व्यापक रूप से हिंदू वोट के लिए प्रधानमंत्री तक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर दिया। चुनाव आयोग ने कुछ नेताओं पर कार्रवाई जरूर की है पर दुर्भाग्य से ऐसा लग रहा है कि यह बुराई भारत की राजनीति से दूर नहीं होने वाली है।

इस बार के चुनाव में नंबर दो चिंता धन के बेतहाशा इस्तेमाल की है। भारत जैसे गरीब देश में चुनाव इतने खर्च का काम हो गया है कि आम आदमी चुनाव लड़ने की नहीं सोच सकता है। सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता या सिविल सोसायटी का कोई व्यक्ति चुनाव लड़ने की सोचे तो वह लड़ाई में चंद मिनट भी नहीं टिक पाएगा।

नामांकन के साथ दायर किए गए हलफनामे से पता चल रहा है कि हर लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों एक सर्वेक्षण से पता चला कि किसी प्रत्याशी की संपत्ति पांच करोड़ या उससे ज्यादा है तो उसके चुनाव जीतने की संभावना बाकी प्रत्याशियों के मुकाबले 50 फीसदी से ज्यादा होती है।

हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी के जरिए काला धन बिल्कुल खत्म कर देने का दावा किया था पर इस चुनाव में दूसरे चरण के मतदान तक ढाई हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की नकदी, शराब, नशीली दवाएं और दूसरी चीजें जब्त की जा चुकी हैं। तमिलनाडु में एक प्रत्याशी के घर से 12 करोड़ रुपए नकद मिले तो वहां चुनाव रद्द करना पड़ा है औऱ हैरान परेशान लोगों ने कहा है कि नकदी बांटा जाना कौन सी नई बात है! यह तय है कि ऐसे नेताओं से बनी लोकसभा देश के सवा सौ करोड़ से ज्यादा लोगों के हित के बारे में नहीं सोच सकती है।

चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है और मतदान को पवित्र माना जाता है। पर अब इसकी कोई पवित्रता नहीं रह गई है। किसी न किसी तरह की खैरात बांट कर इसे खरीदने का प्रयास हो रहा है। कई जगह उम्मीदवार सीधे पैसे देकर वोट खरीद रहा है और पार्टियां सरकारी खजाना लूटा कर वोट खरीदने का प्रयास कर रही है। मतदान के अपवित्र होने का संकेत यह है कि आज से करीब 50 साल पहले गरीबी हटाओ के नारे पर जीती पार्टी को गरीबी हटाने के लिए पांच करोड़ परिवारों को हर महीने छह हजार रुपए देने का वादा करना पड़ रहा है।

यह सीधे तौर पर वोट के लिए रिश्वत देने का मामला है। पर उससे पहले सत्तारूढ़ पार्टी ने किसानों के खातों में हर महीने पांच सौ रुपए डालने का सिलसिला शुरू कर दिया था। पार्टियां सिंदूर, बिंदी, मंगलसूत्र से लेकर वाशिंग मशीन तक बांट कर वोट खरीद रही हैं।

लोकतंत्र के लिए नंबर चार खतरा जाति के नाम पर बन रही पार्टियां हैं। देश भर में छोटी छोटी जातियों के नाम पर पार्टियां बन गई हैं और देश की राष्ट्रीय पार्टियां उनको मुख्यधारा में ला रही हैं।

(साई फीचर्स)

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