वोट की खरीद फरोख्त कैसे रूकेगी?

 

 

(अजित कुमार)

टीएन शेषन ने बतौर चुनाव आयुक्त बूथ लूट बंद कराने का अभियान चलाया था। उस समय बैलेट पेपर से चुनाव होते थे और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती बूथ कैप्चरिंग थी। बंदूक के दम पर लोगों को मतदान केंद्रों से भगा दिया जाता था या मतदान केंद्र पर जाने से रोक दिया जाता था। शेषन ने इसे रोकने के लिए 1995 का बिहार विधानसभा का चुनाव तीन महीने में कराया था। चुनाव की तारीखें तीन बार बढ़ीं और पंजाब पुलिस की ड्यूटी लगा कर उन्होंने बहुत हद तक बूथ कैप्चरिंग पर रोक लगाई।

बाद में अर्धसैनिक बलों की तैनाती होने लगी फिर ईवीएम आ गए और बूथ कैप्चरिंग रूक गई। पर वोटों की खरीद फरोख्त तेज हो गई। अब बूथ लूटे नहीं जाते हैं, लोगों को वोट देने से रोका नहीं जाता है, उनका वोट खरीद लिया जाता है। अलग अलग राज्यों में इसकी कीमत अलग होती है और तरीका भी अलग होता है। दक्षिण के राज्यों में खास कर तमिलनाडु में ऐसा बहुत होता है। एक तरह से वोट खरीदने का काम सबसे पहले वहीं के नेताओं ने शुरू किया और इसके अलग अलग तरीके निकाले।

पिछले दिनों वेल्लोर लोकसभा सीट के उम्मीदवार के घर से चुनाव कार्य में लगे अधिकारियों ने 12 करोड़ रुपए जब्त किए। तमिलनाडु में ही एक विधानसभा सीट के उम्मीदवार के यहां से करीब दो करोड़ रुपए पकड़े गए हैं। वोटों की खरीद फरोख्त और चुनाव में धन की बढ़ती भूमिका को कम करना चुनाव आयोग और सभी पार्टियों की सबसे पहली चिंता होनी चाहिए।

तमिलनाडु की वेल्लोर लोकसभा सीट के उम्मीदवार के यहां से चुनाव आयोग ने 12 करोड़ रुपए पकड़े और वहां का चुनाव टाल दिया। इस पर क्षेत्र के मतदाताओं ने बड़ी हैरानी जताई। उन्होंने कहा कि इसमें कौन सी नई बात थी। इसका मतलब वहां हर चुनाव में पैसे बांटे जाते थे, जिसके लोग आदी हो गए हैं। तमिलनाडु से ही यह खबर भी आई है कि वहां कई इलाकों में बिजली जाती है तो लोग खुश होते हैं क्योंकि अंधेरे में रुपए की बारिश होती है।

चुनाव के दौरान आयोग की नजरों से बचने के लिए अंधेरे में लोगों के घरों में पैसे फेंके जाते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव से पहले खबर आई थी कि तब के डीएमके नेता एमके अलागिरी के चुनाव में पैसे बांटने के कई तरीके इस्तेमाल किए जाते थे। इसमें एक तरीका सुबह लोगों के घर में पहुंचने वाले अखबार के अंदर रख पैसे पहुंचाए जाते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे एक वोट की कीमत पांच हजार रुपए तक देते थे। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का बेटा लोकसभा का चुनाव लड़ रहा है। पिछले दिनों एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके मुताबिक मुख्यमंत्री के बेटे को चुनाव जिताने के लिए डेढ़ सौ करोड़ रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

ध्यान रहे चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव में खर्च की अधिकतम सीमा 70 लाख रुपए रखी है। पर इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर हर सीट पर इससे कई गुना ज्यादा खर्च होता है। चुनाव आयोग और आय कर अधिकारियों की निगरानी के बावजूद उम्मीदवार करोड़ों खर्च करते हैं। चुनाव में पैसे की भूमिका कैसे बढ़ी है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अभी तक ढाई हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की नकदी और शराब, नशीली चीजें आदि जब्त की जा चुकी हैं।

पिछले साल हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद एक संस्था एडीआर ने एक आकलन किया था, जिसके मुताबिक राज्य के चुनाव में सभी पार्टियों ने मिल कर कुल दस हजार करोड़ रुपए खर्च किए थे। 224 विधानसभा सीटों पर दस हजार करोड़ रुपए खर्च का मतलब है औसतन एक सीट पर 50 करोड़ रुपए का खर्च। चुनाव में होने वाले इस अंधाधुंध खर्च को देख कर लग रहा है कि पानी खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। इसका सिर्फ यह पहलू नहीं है कि इससे चुनावी प्रक्रिया दूषित हो रही है। इससे पूरी राजनीति और विधायी व प्रशासनिक काम भी प्रदूषित हो रहा है। चुनावी प्रक्रिया के इस प्रदूषण को भ्रष्टाचार की जननी कहा जा सकता है। क्योंकि सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करके चुनाव जीतने वाले का मकसद देश और इसके लोगों के हित में कानून बनाना तो कतई नहीं होता है।

चुनाव में पैसे की भूमिका को कम करने के लिए कई तरह के सुझाव दिए गए हैं। सरकार की ओर से चुनाव खर्च दिए जाने का भी एक प्रस्ताव है। पर यह कोई समाधान नहीं है। उलटा इससे यह होगा कि उम्मीदवार खर्च की अधिकतम सीमा तक पैसा सरकार से लेंगे और बाकी अपना खर्च करेंगे। इससे इस बात की गारंटी नहीं होती है कि उम्मीदवार सीमा से ज्यादा खर्च नहीं करेगा। इसका एक पहलू यह भी है कि उम्मीदवारों की खर्च की सीमा तो तय है पर पार्टियों के खर्च की सीमा तय नहीं है।

सो, सत्तारूढ़ पार्टियां बेहिसाब खर्च करती हैं। इससे विपक्षी और छोटी पार्टियों के लिए लड़ाई का एकसमान मैदान नहीं मिल पाता है। इसको रोकने में पार्टियों की दिलचस्पी कतई नहीं है। इसलिए चुनाव आयोग को ही हिम्मत दिखानी होगी। जिस तरह शेषन ने बूथ कैप्चरिंग रूकवाई थी उस तरह की सख्ती दिखा कर कार्रवाई करनी होगी। औपचारिकता की बजाय सचमुच की कार्रवाई हुई तभी यह बीमारी रूकेगी, नहीं तो पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया और दूषित होती जाएगी।

(साई फीचर्स)

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