पानी का संकट, मौन नगर पालिका

 

 

(शरद खरे)

हर साल के मानिंद इस साल भी गर्मी के आते ही जिला मुख्यालय में पानी का संकट मुँह फाड़ते ही जा रहा है। इस साल तो मार्च से ही हाल काफी हद तक चिंताजनक हो चुके हैं। हर साल पालिका को सांसद, विधायक निधि से पानी के टैंकर मिला करते हैं। ये पानी के टैंकर साल भर में ही पूरी तरह जर्ज़र हो जाते हैं जो आश्चर्य से कम नहीं है। वहीं निजि तौर पर संचालित होने वाले पानी के टैंकर सालों साल सेवाएं देते नजर आते हैं।

सिवनी शहर के अंदर बबरिया, दलसागर, मठ, बुधवारी के अलावा रेल्वे स्टेशन के पास दो तालाबों के साथ ही अन्य तालाब भी हैं। इन तालाबों में पानी की मात्रा भरपूर रहती है। इसके अलावा शहर में अनगिनत जल स्त्रोत भी हैं, जिनका रखरखाव अगर करीने से किया जाये तो गर्मी में पानी की किल्लत से निजात पायी जा सकती है। हाल ही में लाखों रूपये खर्च कर पालिका के द्वारा कुंओं की सफाई करायी गयी है। कुंओं एवं अन्य जल स्त्रोतों के हालत देखकर लगता है कि पूरी कवायद सिर्फ और सिर्फ कागजों तक ही सीमित रही है।

दूसरी ओर चिंताजनक बात यह भी है कि जिले में भू जल स्तर भी काफी नीचे जाता जा रहा है। एक समय था जब साठ-सत्तर से सौ फीट तक ही पानी मिल जाया करता था। आज बोरिंग करवाने पर चार पाँच सौ फीट से ज्यादा गहरायी पर पानी मिल रहा है। जाहिर है कि जल संरक्षण के प्रयासों में सालों से कोताही बरती जा रही है।

दरअसल, रेन वाटर हार्वेस्टिंग को स्थानीय निकायों के द्वारा प्रोत्साहित न किये जाने का ही नतीजा है कि जल स्तर तेजी से नीचे जाता जा रहा है। नगर पालिका के द्वारा भी रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर सख्ती नहीं की जाती है। देखा जाये तो पालिका को चाहिये कि वह सबसे पहले सरकारी इमारतों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का प्रयोग करे और इसके प्रभावों को आम जनता को दिखाकर उन्हें प्रोत्साहित करे कि वे अपने-अपने घरों में इसे अपनायें।

कहने को तो नगर पालिका के द्वारा नक्शा पास कराते वक्त रेन वाटर हार्वेस्टिंग के लिये कुछ राशि जमा करवायी जाती है, किन्तु बाद में बिना भौतिक सत्यापन के ही छाया चित्रों को देखकर यह राशि वापस कर दी जाती है। यह वाकई में दुःखद ही माना जायेगा। इसके लिये प्रभावी पहल की आवश्यकता है।

अभी मई माह के 22 दिन और जून माह बीतने के हैं। लगभग बावन दिन तक गर्मी की जबर्दस्त मार रहेगी। गर्मी में पानी की खपत बढ़ना स्वाभाविक ही है। नवीन जलावर्धन योजना का अता पता नहीं है, पुरानी जलावर्धन योजना दम तोड़ रही है। नगर पालिका सहित चुने हुए प्रतिनिधियों को इससे सरोकार नजर नहीं आ रहा है।

संवेदनशील जिला कलेक्टर प्रवीण सिंह भी लगातार ही इस योजना का निरीक्षण कर निर्देश जारी कर रहे हैं। उनके द्वारा तीन माह से प्रयास किये जा रहे हैं पर अगर उनके प्रयास सफल नहीं हो पाये, इसका कारण यही माना जा सकता है कि नगर पालिका के अधिकारी कर्मचारी और ठेकेदार के द्वारा जिला कलेक्टर की मंशाओं पर पानी ही फेरा जा रहा है।