इस ठप्पे से बाहर आना चाहता है अंबानी परिवार?

 

 

(अवधेश कुमार)

स्वतंत्र भारत का शायद यह पहला चुनाव है, जिसमें देश के कुछ शीर्ष उद्योगपतियों और कारोबारियों ने खुलकर किसी उम्मीदवार का समर्थन किया है। दक्षिण मुंबई से कांग्रेस के उम्मीदवार मिलिंद देवड़ा ने हाल में सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष मुकेश अंबानी और कोटक महिंद्रा बैंक के प्रबंध निदेशक उदय कोटक के साथ कई कारोबारी उनका नाम लेकर उनके प्रति अपना समर्थन व्यक्त कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इसके पहले उद्योगपति या कारोबारी किसी उम्मीदवार या पार्टी का समर्थन नहीं करते थे पर वह सब पर्दे के पीछे से होता था। एक औसत व्यापारी की आम सोच यही होती है कि एक पार्टी को खुलेआम समर्थन करना दूसरी पार्टियों का कोपभाजन बनना होगा, जिसका उनके कारोबार पर बुरा असर पड़ सकता है। मुकेश अंबानी और उदय कोटक जैसे दिग्गजों ने वीडियो में खुलेआम समर्थन जताकर इस परंपरा को तोड़ा है।

बढ़ता हुआ असंतोष

अंबानी और कोटक ने पार्टी का नाम भले न लिया हो पर सबको पता है कि वे जिस उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं वह कांग्रेस का है। संभव है अंबानी परिवार कांग्रेस से रिश्ते सुधारना चाहता हो। राहुल गांधी और कांग्रेस इधर अनिल अंबानी को निशाना बना रहे हैं। हो सकता है, अंबानी परिवार मोदी समर्थक होने के ठप्पे से बाहर आना चाहता हो। पर यह बात उदय कोटक और अन्य उद्योगपतियों पर लागू नहीं होती। बहरहाल, इनका उद्देश्य चाहे जो हो लेकिन सच यह है कि पिछले दो वर्षों में उद्योगपतियों और कारोबारियों के भीतर मोदी सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा है।

आप व्यापारी संगठनों से बात करिए या किसी बिल्डर या बैंकर से, आपको स्थिति का आभास हो जाएगा। नोटबंदी और जीएसटी दूरगामी दृष्टि से लाभकारी कदम होंगे लेकिन तात्कालिक तौर पर कारोबारियों को इनसे सीधा आघात लगा है। देश में नकद कारोबार और उसके माध्यम से कर चोरी सहज स्वीकृत रही है। नोटबंदी ने इस पर चोट की। बिल्डरों के लिए तो आफत ही आ गई, क्योंकि उनका करीब 80 प्रतिशत कारोबार नकद में था, जिसका न हिसाब देने की आवश्यकता थी, न उस पर टैक्स देने की। वे इससे उबरने की कोशिश ही कर रहे थे कि जीएसटी आ गया। हालांकि जीएसटी में अब काफी सुधार आ गया है और यह व्यापारियों के काफी अनुकूल बन चुका है, फिर भी पारंपरिक मानसिकता वालों के लिए नई व्यवस्था को स्वीकार करना कठिन होता है।

इसके साथ नरेंद्र मोदी ने ऐसे कानून बनाए जिनकी अपेक्षा आमतौर पर कम्युनिस्ट सरकारों से की जाती है। भवन निर्माण में बिल्डरों की मनमानी और भ्रष्टाचार रोकने के लिए रेरा जैसा कानून बना। निचले स्तर पर पुलिस-प्रशासन के भ्रष्टाचार के कारण यह जमीन पर भले ही पूरी तरह लागू नहीं हो पा रहा है लेकिन कानून का भय तो पैदा ही हुआ है। इस कानून के अनुसार बिल्डर खरीदारों को निर्धारित समय में मकान देने के लिए विवश हैं तथा एक परियोजना का धन दूसरे में तब तक नहीं लगा सकते जब तक कि वह पूरी न हो जाए। इसके साथ ही कालाधन कानून, दिवालिया कानून, बेनामी संपत्ति कानून, आर्थिक अपराधी भगोड़ा कानून और आयकर कानूनों में व्यापक परिवर्तन ने हर प्रकार के कारोबारियों के मन में थोड़ा या ज्यादा भय पैदा किया है। डूबता कर्ज वसूलने के लिए बैंकों को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। विमुद्रीकरण के बाद से मोटे तौर पर दो लाख कंपनियों के निबंधन रद्द हुए हैं। कई लाख निदेशकों को भविष्य में किसी कंपनी का निदेशक बनने के अयोग्य करार दिया गया है। तीन लाख से ज्यादा कंपनियों की आय और कारोबार की जांच चल रही है। प्रवर्तन निदेशालय के पास धनशोधन के एक लाख के आसपास छोटे-बड़े मामले हैं। इन सारे कदमों से ईमानदार और नियम-कानूनों का पालन करने वाले खुश भी हैं, पर एक बड़े वर्ग को भय है कि अगर मोदी सरकार लौटी तो उसके लिए और समस्याएं पैदा होंगी। वैसे वे यह भी कहते हैं कि सत्ता में आने वाले दूसरे लोग कहीं और ज्यादा परेशानियां न पैदा कर दें।

यह भी सच है कि मोदी सरकार ने व्यापार को सुगम और पारदर्शी बनाने के लिए भी काफी काम किए हैं। अनेक बाधक कानूनों को समाप्त किया है। नियमों को लचीला बनाया है। कंपनियों का रजिस्ट्रेशन आसान हुआ है। उद्योग या कारोबार के लिए बैंक से कर्ज लेना भी सरल हुआ है। लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। नौकरशाही की भूमिका काफी कम हुई है। जिन कार्यों के लिए विभागीय कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे, उनमें से ज्यादातर को वेबसाइट पर पूरा किया जा सकता है। व्यापार ज्यादा सुगम हुआ है और इस मामले में भारत की ग्लोबल रैंकिंग सुधरी है। इन सबके बावजूद कारोबारी आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।

गुजरात के विधानसभा चुनाव में पटेलों के अलावा व्यापारियों की भी नाराजगी का अहसास बीजेपी को हो गया था। प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनाव में वहां 34 आम सभाएं कीं। कर्नाटक में बहुमत से वंचित रहने के पीछे भी व्यापारियों का पूरा समर्थन न मिलना माना गया। लोकसभा चुनाव के दो चरणों के मतदान के बाद भी शायद कुछ विपरीत संकेत मिले। इसलिए प्रधानमंत्री ने राजधानी के तालकटोरा स्टेडियम में कारोबारियों से संवाद किया। उन्होंने व्यापारियों के हित में उठाए गए कदमों की जानकारी देने के साथ ही भविष्य की योजनाएं भी साझा कीं। मोदी ने अपनी ओर से आश्वस्त करने की कोशिश की कि उनका लक्ष्य उद्योग और कारोबार को प्रोत्साहित कर भारत को दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनाना है इसलिए वे आशंकाओं में न रहें, किसी प्रकार का भय न पालें। उनके आश्वासन का कुछ असर अवश्य हुआ होगा किंतु कारोबारियों का बड़ा वर्ग आज भी बीजेपी को लेकर दुविधा की स्थिति में है।

(साई फीचर्स)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *