क्या भाजपा सरकार को फिर से लाना चाहती है कांग्रेस?

 

 

(ऋषि)

इस बार लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस की रणनीति उसे खलनायक साबित करने जा रही है। देश मोदी सरकार से त्रस्त है। इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस की हवा है, लेकिन कांग्रेस को गलतफहमी है कि अगर भाजपा की सरकार नहीं बनती है तो सरकार उसे ही बनाना है। मोदी सरकार चुनाव जीतने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ रही है, फिर भी उसका विरोध रहा है। पुलवामा, बालाकोट जैसी घटनाओं के बाद भी लोग सरकार बदलने का मन बनाए हुए हैं, जिससे कांग्रेस का उत्साह बढ़ा हुआ है और वह मान न मान मेरा मेहमान की तर्ज पर अगली सरकार बनाने का दावा ठोक रही है।

कांग्रेस एक परिवार के प्रति समर्पित पार्टी बनकर रह गई है और उससे यह उम्मीद करना फालतू है कि वह देश का कोई भला कर सकती है। कांग्रेस का मतलब है सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा। जो लोग इनके प्रति भक्ति भाव रखते हैं, वे कांग्रेसी हैं और जो नहीं रखते हैं, वे कांग्रेस के खिलाफ हैं। कांग्रेस विरोधी होने का मतलब भाजपा समर्थक नहीं होता। इसी तरह भाजपा विरोधी होने का मतलब कांग्रेस समर्थक नहीं होता। लोग मोदी सरकार के खिलाफ हैं, लेकिन वे कांग्रेस के समर्थन में हैं, इसकी गारंटी नहीं है। इस वातावरण में कांग्रेस शतरंज के घोड़े की ढाई घर वाली चाल चल रही है।

पिछले साल भर से माहौल बन रहा है कि देश को मोदी सरकार से पीछा छुड़ाना है। पूरे देश में अलग-अलग स्तर पर मोदी सरकार का विरोध हो रहा है। इस विरोध को दबाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल हो रहा है। मीडिया मोदी सरकार के इस विरोध को कांग्रेस के समर्थन के रूप में परिभाषित करते हुए चुनाव को मोदी बनाम राहुल प्रचारित कर रहा है, जो कि दरअसल नहीं है। लोग मोदी को पसंद नहीं कर रहे हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि वे राहुल को पसंद कर रहे हैं। जब भी किसी को हटाना होता है तो उसकी जगह कोई भी विकल्प बन सकता है। लेकिन इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विकल्प पर अपना कापीराइट बता रही है।

कांग्रेस जिस तरह देश में तोड़फोड़ के जरिए सरकार चलाती रही है, उसी तर्ज पर मोदी सरकार भी चल रही है। कांग्रेस विपक्ष को एकजुट नहीं होने देती थी। मोदी सरकार इससे भी आगे बढ़कर सरकार के निगरानी तंत्र को ही मटियामेट करने पर उतारू है जिससे भविष्य में सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लग जाएंगे। कांग्रेस के पास देश को चलाने के लिए कोई विजन नहीं है। मोदी सरकार ने चुनाव जीतने के लिए लोगों को आर्थिक प्रलोभन देने का रास्ता पकड़ा तो कांग्रेस भी न्यूनतम आय उपलब्ध कराने का वादा लेकर आ गई। प्रकारांतर से सोचा जाए तो यह कह सकते हैं कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियां देश के मतदाताओं को पैसे के लालची भिखारी समझे बैठी है।

कांग्रेस की सरकार को चलते हुए लोगों ने कई वर्ष देखा। अब मोदी सरकार को भी देख रहे हैं। कांग्रेस कम तानाशाह थी। वह अपनी सत्ता को सुरक्षित रखते हुए सरकार चलाती थी। मोदी सरकार ज्यादा तानाशाह है और भाजपा में अपनी सत्ता को सुरक्षित बनाए रखने के लक्षण नहीं है। यह अटल बिहारी वाजपेयी के समय भी दिखा और अब मोदी सरकार के समय भी दिख रहा है। कांग्रेस का विरोध होने पर भाजपा विकल्प होने का दावा करती थी। अब भाजपा का विरोध होने पर कांग्रेस विकल्प होने का दावा कर रही है। मीडिया ने लोकसभा चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस की नूरा कुश्ती बनाकर रख दिया है।

लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश महत्वपूर्ण है। कांग्रेस की जड़ें भी उत्तर प्रदेश में ही है, लेकिन उसके पास समर्थन नहीं है। मुस्लिमों ने समाजवादी पार्टी का दामन थामा और दलितों ने बहुजन समाज पार्टी को समर्थन देना शुरू कर दिया। जो सवर्ण पहले कांग्रेस के साथ थे, वे भाजपा के साथ हो गए। इस परिस्थिति में कांग्रेस चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं है, फिर भी कांग्रेस सबसे ज्यादा प्रचार उत्तर प्रदेश में ही कर रही है। खास तौर से प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का माहौल बनाने में लगी है। कांग्रेस को गलतफहमी है कि वह मोदी सरकार के विरोध के माहौल में उत्तर प्रदेश में अपने वोट बैंक पर वापस कब्जा कर सकती है।

इस तरह कांग्रेस दुधारी तलवार बनी हुई है। एक तरफ वह भाजपा का विरोध कर रही है, वहीं दूसरी तरफ वह सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को भी नष्ट करने पर उतारू है। उत्तर प्रदेश में अस्सी सीटें हैं, जिनमें से सत्तर से ज्यादा सीटें भाजपा के पास है। भाजपा को पिछले चुनाव जैसी सफलता उत्तर प्रदेश में नहीं मिलेगी, यह तय है। फिर भी कांग्रेस के प्रयास इसी दिशा में दिख रहे हैं कि भाजपा को कम से कम नुकसान हो। चौथे चरण का मतदान होने के बाद उत्तर प्रदेश में अभी भी इकतालीस सीटों पर मतदान बाकी है। अब तक उनतालीस सीटों पर मतदान हो चुका है, जिसके बाद कांग्रेस ने चुनाव की रणनीति भी बदल गई है।

प्रियंका गांधी वाड्रा प्रचार के दौरान दावा कर रही है कि कांग्रेस मोदी सरकार को हराना चाहती है। दूसरी तरफ बसपा-सपा-रालोद ने कांग्रेस पर भाजपा की मदद करने का आरोप लगा दिया है। इस तरह विपक्ष के दोनों प्रमुख धड़े आपस में ही उलझ रहे हैं। दोनों धड़ों की नजर एक-दूसरे के वोट बैंक पर है। कांग्रेस ने अपना असली रंग दिखा दिया है। यह भाजपा के लिए अनुकूल स्थिति है। ऐसे में अगर गाहे बगाहे मोदी को फिर से सत्ता संभालने का मौका मिल गया तो इसकी जिम्मेदार कांग्रेस ही होगी, क्योंकि कांग्रेस कम से कम बीस-पच्चीस सीटों पर भाजपा को फायदा पहुंचा रही है। अगर ऐसा हुआ तो क्या देश के लोग कांग्रेस के बारे में क्या सोचेंगे?

(साई फीचर्स)

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