चुनाव आयोग शक मिटाए, न कि बढ़ाए

 

 

(हरि शंकर व्यास)

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा और उनके दो साथी आयुक्त जिद्द नहीं करें। कोई फर्क नहीं पड़ेगा यदि मतगणना एक दिन के बजाय तीन दिन में हुई। मगर पहली जरूरत जन-जन में ईवीएम पर बने अविश्वास को खत्म करने की है। पहली जरूरत है जो 2019 का चुनाव शक-अविश्वास का गृह युद्ध न बनवा डाले। जब हर ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट मशीन लग गई है, पर्चियों का रिकार्ड बन रहा है तो पर्चियों की काउटिंग कुछ और बढ़ा लेने के फैसले में हर्ज क्या है?

भारत राष्ट्र-राज्य, सवा सौ करोड़ लोगों के लोकतंत्र का दुनिया में यह सुन कर उलटे मान बढ़ेगा, चुनाव आयोग की साख बढ़ेगी कि चुनाव को विश्वसनीय, सौ टका ईमानदार बनाने के लिए, शक दूर करने के लिए राजनीतिक दलों की मांग में पर्चियों से ईवीएम की मतगणना का मेल कराने का अनुपात बढ़ाया गया। मतगणना एक दिन के बजाय तीन दिन में हो या इस काम की मैनपावर दो-तीन गुणा बढ़ भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है? जब दो महीने चुनाव प्रक्रिया चल सकती है, अरबों रुपए खर्च होते हैं तो मतगणना में दो-तीन दिन का समय लगे या कुछ खर्चा बढ़े तो दुनिया की छठी आर्थिकी वाला भारत इतना और वहन करने में समर्थ है। भारत के लोग धैर्य के साथ दो-तीन दिन इंतजार कर लेंगे तो दो-तीन दिन सस्पेंस में भी रह लेंगे लेकिन जनादेश सौ टका भरोसा तो लिए होगा।

आप जानते हैं मैं ईवीएम मशीन पर शक नहीं करता हूं। लेकिन मैं इन दिनों बार-बार, लगभग हर दिन जनता के बीच से यह दलील सुनता हूं कि ईवीएम मशीन की धांधली से नरेंद्र मोदी चुनाव जीतेंगे। पूरे देश में ईवीएम मशीन पर इतना गहरा संदेह फैला है कि यदि जनमत संग्रह हो तो बहुसंख्या में लोग शक जाहिर करेंगे कि हां, ईवीएम से धांधली हो सकती है। अपना मानना है कि यदि ईवीएम का शक दूर नहीं किया तो उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चुनाव नतीजों के बाद नतीजों को नहीं मानते हुए लोग सड़कों पर उतर सकते हैं।

देश सूडान, नाइजीरिया, जिंब्बावे जैसी चुनावी धांधली, गृह लड़ाई वाली सुर्खियां लिए हुए होगा। हां, मुझे अखिलेश यादव के तमतमाए चेहरे से वह बिंदु समझ आया, जिसका बुनियादी पेंच है कि यदि रामपुर, कैराना, फूलपुर, गोरखपुर में भाजपा चुनाव जीती तो उत्तर प्रदेश की आबादी में से क्या बराबरी का बड़ा जनसमूह नतीजे के खिलाफ सड़क पर नहीं उतरेगा? चुनाव आयोग कैसे तब भरोसा करा सकेगा कि ईवीएम ने सही काम किया। मगर हां, यदि चुनाव आयोग ईवीएम के साथ अच्छी संख्या में इन सीटों की वीवीपैट मशीन की पर्चियों से भी काउंटिंग करवाता है और दोनों ही तरह की मतगणना में एक सा नतीजा निकलता है तो रामपुर, कैराना, फूलपुर, गोरखपुर में भी भाजपा का जीतना लोगों के गले उतरेगा फिर भले रामपुर में 55 प्रतिशत मुसलमान वोट हों या पिछले एक साल में भाजपा गोरखपुर, कैराना, फूलपुर सीट हारी है लेकिन इस चुनाव लोगों ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया। ऐसा भरोसा ईवीएम व वीवीपैट मशीन की पर्चियों मतलब दोनों तरह की काउंटिंग से ही बन सकता है। केवल ईवीएम की मशीनी गिनती से नहीं बनेगा!

मैंने ये उदाहरण क्यों दिए? इसलिए क्योंकि रामपुर में मतदान के दिन जब अखिलेश यादव को मैंने ईवीएम और वीवीपैट पर तमतमाए देखा, उन्हें चुनाव आयोग पर नाराज देखा तो लगा कि यदि अखिलेश यादव भी ईवीएम को ले कर शक का ऐसा लहजा बना बैठे हैं तो निश्चित ही उन्हें मतदान केंद्रों पर ईवीएम- वीवीपैट मशीनों को ले कर भारी संख्या में शिकायत है, जिससे अखिलेश यादव इतना बोले। अपना मानना है कि अखिलेश यादव शिष्ट नेता हैं। संतुलित बोलते हैं। वे अपने चुनावी भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ का भी नाम लेने से बचते हैं। वे आलोचना और कटाक्ष भी सधे अंदाज में करते हैं। उन्होंने पहले मायावती की तरह ईवीएम मशीन को इश्यू नहीं बनाया था। लेकिन तीसरे चरण के मतदान के साथ पूरे देश में चौतरफा अंदाज में सभी तरफ से विपक्षी पार्टियों के नेता या लोगों के अनुभव की जो खबरे हैं उसने शक को भारी बनवाया है। वीवीपैट मशीनों के फेल होने की शिकायत ने अखिलेश यादव को गुस्से में बनाया है तो चुनाव आयोग को अपनी तह सोचना चाहिए, सुप्रीम कोर्ट में जा कर कहना चाहिए कि वह शक दूर करने के लिए काउंटिंग को ले कर और नए बंदोबस्त कर रहा है। आखिर मायावती-अखिलेश- अजित सिंह और कांग्रेस सभी उत्तर प्रदेश में एक स्वर में ईवीएम- वीवीपैट की शिकायत की फीडबैक में जनता में अविश्वास की अंतरधारा बना बैठे तो 23 मई को भारत के लोकतंत्र का भट्ठा बैठेगा। क्या चुनाव आयोग ऐसा चाहेगा?

तभी 21 पार्टियों की सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका चुनाव आयोग के लिए मौका है। वह सुप्रीम कोर्ट में अपनी तरफ से स्टैंड ले कि हम समर्थ हैं अविश्वास, शक को दूर करने के हर उपाय के लिए। शक मिटाने के लिए जब वीवीपैट मशीन लगा दी है तो वीवीपैट की पर्चियों की अधिक मतगणना भी करा लेंगे।

अपना मानना है कि 50 के बजाय 25 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों से गणना संतोषजनक होगी। यह निर्देश और व्यवस्था बने कि पहले ईवीएम- वीवीपैट की 25-25 प्रतिशत मशीनी व पर्चियों की मतगणना होगी। दोनों की मतगणना में नतीजा समान रहा तो फिर उसके बाद ईवीएम से आगे मतगणना होगी। यदि ईवीएम-वीवीपैट की मतगणना में नतीजा एक सा नहीं आया तो आगे की मतगणना रोकते हुए चुनाव आयोग तब फैसला लेगा कि उस सीट पर दोबारा मतदान होगा। हां, 25 प्रतिशत की मतगणना में यदि ईवीएम मशीन भाजपा को जिताए और वीवीपैट की पर्चियों से सपा-बसपा एलायंस जीते तो उस सीट पर दोबारा से मतदान कराने का फैसला होना चाहिए। मान लें ऐसी स्थिति पचास सीटों पर हो जाए तो भी हर्ज नहीं दोबारा मतदान में। तब सोचें चुनाव प्रक्रिया की ईमानदारी, विश्वसनीयता को क्या चार चांद नहीं लगेंगे? मौजूदा चुनावी नोटिफिकेशन में ही मतलब जो उम्मीदवार अभी है उन्हीं के लिए दुबारा मतदान।

हां, ईवीएम और वीवीपैट मशीन की पर्चियों की मतगणना शुरू में होना जरूरी है। दोनों के नतीजे में समानता के बाद ही आगे की मतगणना शुरू का निर्देश हो। पहले गारंटी यह बने कि ईवीएम और वीवीपैट मशीन दोनों की अलग-अलग वोट गणना का नतीजा समान है या नहीं। तेलंगाना की उस चर्चा ने चौकाया है कि वहां ईवीएम और वीवीपैट मशीन की गणना में फर्क था फिर भी आगे काउंटिंग हुई और नतीजा घोषित हुआ।

ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। 23 मई को मतगणना के दिन सबसे पहले ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों की मतगणना हो। दोनों के नतीजे को पहले राउंड के नतीजे के रूप में प्रचारित किया जाए। फिर पोस्टल बैलेट की मतगणना हो और उसके बाद शेष वोटों की ईवीएम की मशीन से गणना।

सुप्रीम कोर्ट ने हर लोकसभा क्षेत्र में हर विधानसभा सीट के पांच-पांच मतदान केंद्रों में ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों से काउंटिंग का फैसला सुनाया हुआ है। इस बारे में भी चुनाव आयोग को व्यवस्था के नाते जनता को जागरूक बनाने का विज्ञापन चलाना था कि कैसे तय हो रहा है कि एक सीट में कौन-कौन से बूथ दोनों तरीकों से काउंटिंग के लिए चिंहित हैं? यह आखिरी वक्त पर तय होता है या चुनाव आयोग या प्रादेशिक चुनाव सीईओ या जिले के स्तर पर बूथ चिंहित होते हैं? मतगणना में ईवीएम-वीवीपैट दोनों से काउंटिंग शुरुआत में होगी या बाद में? यदि दोनों की काउंटिंग में अंतर हुआ तो रिटर्निंग अफसर क्या करेगा? कैसे आगे बढ़ा जाएगा?

हां, इस पर सुप्रीम कोर्ट, राजनीतिक दलों के साथ विचार कर चुनाव आयोग को निर्देश बनाने चाहिए। चंद्रबाबू नायडू से ले कर अखिलेश यादव सब यदि ईवीएम मशीन से खटके हैं और पांच-पांच बूथ पर दोनों की काउंटिंग से संतुष्ट नहीं हैं तो बूथ संख्या बढ़ाते हुए उसकी पालना, कायदों की निर्देशिका बताते हुए जनता में उसका प्रचार भी होना चाहिए। असली मसला जन-जन के बीच ईवीएम पर बना शक है। जनता को चुनाव आयोग बताए कि ईवीएम के साथ पर्ची से भी काउंटिंग होगी। दोनों की काउंटिंग में फर्क आया तो चुनाव आयोग उस सीट की पूरी वोटिंग को रद्द करेगा।

क्यों नहीं है ऐसा प्रचार? चुनाव आयोग ने जब शक दूर करने के लिए अरबों रुपए खर्च करके वीवीपैट मशीनें लगवाई हैं तो उसकी पर्चियों से कम-ज्यादा जितनी भी गिनती होनी है तो वह कैसे होगी और फर्क होने पर क्या होगा इसका प्रचार करना, लोगों में भरोसा बनाना क्या चुनाव आयोग का दायित्व नहीं है? सोचें, अखिलेश यादव यदि सपा-बसपा के 2014 में 43.5 प्रतिशत वोट पाने वाली सीट रामपुर (भाजपा को तब मिले 37.5) में भी मशीन की गड़बड़ी से आशंकित हैं तो यूपी की एक-एक सीट पर ईवीएम मशीनों को कितने अविश्वास में लिया जा रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। तभी नरेंद्र मोदी- अमित शाह के लिए भी जरूरी है कि यदि उपचुनाव के उलट वे गोरखपुर, कैराना, फूलपुर में भाजपा की जीत होती मानते हैं तो उन्हें भी चुनावी प्रक्रिया को सौ टका ईमानदार बनवाना चाहिए। अन्यथा कौन नहीं सोचेगा कि छह महीने पहले कैराना, फूलपुर या गोरखपुर में भाजपा हारी थी और 23 मई 2019 को जीत रही है तो ऐसा ईवीएम मशीन की धांधली के चलते है क्या। नरेंद्र मोदी यदि अपनी आंधी देख रहे हैं, विपक्ष को हारता बतला रहे हैं तो क्यों नहीं वे खुद कहते हैं कि चलो 50 प्रतिशत बूथों पर वीवीपैट की पर्चियों से वोटों की गिनती करा लो। मोदी-शाह को भी सुप्रीम कोर्ट जा कर विपक्ष की मांग का समर्थन करना चाहिए। क्या नहीं?

(साई फीचर्स)

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