एक अजीब परंपरा की वजह से जान जोखिम में डालकर पुल से गुजरते हैं लोग

 

 

 

 

(ब्‍यूरो कार्यालय)

मुंबई (साई)। मुंबई के वैतरना स्टेशन पर जाने के लिए पास के गांव के लोगों को जान जोखिम में डालकर पुल पार करना होता है। यहां एक परंपरा के तहत लोग ट्रेन से नारियल समुद्र की ओर फेंकते हैं। इससे पुल पार कर रहे लोगों को कई बार चोटें आ चुकी हैं। इसके लिए सरकार से शिकायत और मांग भी की गई लेकिन कोई मदद अब तक नहीं मिली।

मंगलवार को मुंबई की वृषाली पाटील वैतरना स्टेशन की ओर जा रही थीं, तभी ट्रेन से फेंके गए नारियल की चोट खाकर वह गिर गईं और घायल हो गईं। वाडिव गांव की 21 वर्षीय निवासी वृषाली उस समय वैतरना का ब्रिज नंबर 92 पार कर रही थीं, जब उनके साथ यह हादसा हुआ। करीब 20 दिन पहले, इसी गांव की रोहिणी पाटील भी इसी जगह पर चलती ट्रेन से एक यात्री के नारियल फेंकने से घायल हो गई थीं।

वृषाली के सिर से लगाता खून निकल रहा था। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उनके सिर पर 4 टांके लगाए गए। दोनों ही एक परंपरा के चलते घायल हुईं जिसमें भक्त समुद्र की ओर नारियल फेंकते हैं। वृषाली वसई की एक फर्म में कार्यरत हैं और वाडिव और वैतिपड़ा गांव के आसपास रहने वाले सैकड़ों निवासियों में से हैं जिन्हें हर रोज इस खतरे का सामना करना पड़ता है। उन्हें स्टेशन पहुंचने के लिए पुल के बगल में स्थित एक संकरे रास्ते से होकर गुजरना होता है। इसके अलावा गांव से कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

खराब मेटल शीट से बना है पुल

पुल की हालत देखकर ही अंदाजा हो जाता है कि यह रास्ता कितना जोखिम भरा है, पुल मेटल शीट से बना है जो खराब हो चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि रेलवे अथॉरिटी ने उनसे कहा है कि पुल की मरम्मत की जरूरत नहीं है। यहां के लोग काफी समय से नौकायन या ढंग की सड़क की मांग करते आए हैं। 6 मई को एक यात्री संगठन प्रवासी सेवा भावी संघ से दहानू और वैतरना के प्रतिनिधियों ने महाराष्ट्र मैरिटाइम बोर्ड के अधिकारियों से मुलाकात कर नौकायन सेवा का आग्रह किया था।

नाव सेवा के लिए की गई मांग

असोसिएशन के सदस्य सतीश गावड़ ने बताया, ‘अगर सड़क या स्टेशन के निर्माण में समय में देरी लग रही है तो नाव के जरिए लोग संकरे रास्ते को पार कर सकेंगे। इस सेवा के लिए लोगों से 5 या 10 रुपये लिए जा सकते हैं। कम से कम इस रास्ते के जरिए वह सुरक्षित तो रहेंगे।अपनी मांग के प्रति राज्य सरकार का ध्यान दिलाने के लिए इसी साल मार्च महीने में दोनों गांवों के करीब 1000 लोगों ने मोर्चा निकालकर आजाद मैदान तक का दौरा किया था। वाडिव के निवासी दीपक पाटील ने बताया, ‘फिर हमसे कहा गया कि एक नए वाडिव स्टेशन के योजना है और हमें फिर पुल को पार नहीं करना पड़ेगा लेकिन कोई नहीं जानता कि यब कब होगा।

पति को खो चुकीं अब बेटे का है डर

11 अप्रैल को पुल पार करते समय रमेश ट्रेन की चपेट में आ गए थे। उनकी मौत हो गई। अब उनकी पत्नी संगीता पाटील को अपने बेटे के लिए डर बना रहता है। वह कहती हैं,’मेरे दो में से एक बेटा स्टेशन पर पहुंचने के लिए हर रोज इस पुल को पार करता है। जिस दिन वह समय पर घर नहीं लौटता तो मेरे मन में एक अजीब सा डर पैदा हो जाता है।