गोविन्दाचार्यः सतर्क अवलोकन, मौलिक चिंतन में बेजोड़

 

 

(शंकर शरण)

गोविन्दाचार्य का जीवन स्वतंत्र भारत के राजनीतिक-बौद्धिक इतिहास और वर्त्तमान का एक प्रतिबिम्ब है। चूँकि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) की दूसरी पीढ़ी के वरिष्ठतम लोगों में हैं, इसलिए उन की स्थिति में संघ के वर्त्तमान की भी झलक अनायास दिखती है।

लंबे समय से गोविन्दाचार्य संघ व भाजपा, दोनों के काम से प्रायः बाहर हैं; फिर भी वे संघ-भाजपा के सर्वाेच्च इन्टेलेक्चुअल कहे जा सकते हैं। इन में सुब्रह्मण्यम स्वामी के सिवा उन की टक्कर का संभवतः कोई नहीं, जिस की बातों में सतर्क अवलोकन, मौलिक चिंतन, और भाषा का सौदर्य श्रोताओं को मिलता हो।

यह रोचक तथ्य है कि गोविन्दाचार्य भी अपनी किशोर-युवा वय में कम्युनिज्म प्रभावित थे। अपनी खुलती उम्र में वे बनारस में कम्युनिस्ट नेता रुस्तम सैटीन द्वारा गरीबों की निःस्वार्थ सेवा से प्रभावित हुए थे। पार्टी की छात्र इकाई, ऑल इंडिया स्टुडेंट्स फेडरेशन में दो-तीन वर्ष काम भी किया। कम्युनिस्ट अखबार ब्लिट्ज् पढ़ते थे। पर जैसा भारत और विश्व के अनेक आदर्शवादियों के साथ हुआ, कम्युनिज्म के राजनीतिक व्यवहार को देख उन का मोहभंग हुआ।

सो, गोविन्दाचार्य कम्युनिज्म से दूर हुए, तो इस का श्रेय हंगरी में सोवियत सैन्य-हस्तक्षेप, कम्युनिस्ट चीन के दमन से दलाई लामा का पलायन, और भारत पर चीन के हमले को था। ठीक वही, जिस कारण हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा और इतिहासकार सीताराम गोयल भी कम्युनिज्म से दूर हुए थे।

यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का एक बुनियादी प्रसंग है। जिस ने खुले-दिमाग और बंद-दिमाग या स्वार्थी/भीरू आदर्शवादियों को अलग किया। उस जमाने में जवाहरलाल नेहरू, श्रीपाद डांगे, मोहनकुमार मंगलम, आदि अनेक मार्क्सवादियों पर सोवियत संघ और चीन के उसी व्यवहार का वह असर न हुआ। जब कि उन्होंने कम्युनिज्म की कुरूप सचाई और लंबे समय एवं निकट से देखी-सुनी था। हंगरी, तिब्बत, चेकोस्लोवाकिया, आदि घटनाओं ने वामपंथी बुद्धिजीवियों की परीक्षा ली थी, कि उन में विवेक, सत्यनिष्ठा प्रमुख है या अंधविश्वास, भीरुता?सचाई देख कर वे सच के साथ खड़े रहेंगे, या विविध कारणवश झूठ से समझौता कर लेंगे?

उस परीक्षा से नवयुवक गोविन्द पास होकर निकले। कम्युनिज्म से मन उचाट हो गया। तब किसी ने उन्हें संघ शाखा से जोड़ने की कोशिश की, किन्तु उस का यांत्रिक काम उन्हें न रुचा। फिर किसी ने उन्हें बौद्धिक रूप से कायल किया, कि देश की समस्याएं औपनिवेशिक शिक्षा के कारण हैं, जो केवल राष्ट्रीय शिक्षा द्वारा ठीक हो सकती हैं, और संघ यही काम करता है।

अतः देश में राष्ट्रीय शिक्षा संगठित करने के उद्देश्य से गोविन्दाचार्य संघ में आए। साथ ही गरीबों की प्रत्यक्ष सेवा का भाव संघ में भी था। गुरू गोलवलकर दोपहर भोजन बाद कभी विश्राम नहीं करते थे। तुरत बाद बाहर जाकर सामने अस्पताल में जरूरतमंदों की सेवा में लग जाते थे। इस प्रकार, राष्ट्रीय शिक्षा और समाज-सेवा के दो भावों पर स्थिर होकर गोविन्दाचार्य ने स्वयं को समर्पित कर दिया। रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, श्रीअरविन्द और तिलक का अध्ययन किया। उस समय प्रसिद्ध भारत-प्रेमी विदेशी विद्वानों का भी।

तब से पचास वर्ष बीत गए। इस बीच गोविन्दाचार्य ने संघ और भाजपा में रहते जो काम किए, उस का आकलन यही होना चाहिए कि राष्ट्रीय शिक्षा में कितनी प्रगति हुई? यद्यपि आरंभ से ही तेज व खुले दिमाग गोविन्दाचार्य में अपनी विवेकशील सिफत बनी रही। उन्हें चूहे द्वारा ऊँटों के काफिले का नेतृत्व करने जैसा घमंड न हुआ, जो उन के कई सहकर्मियों के बारे में नहीं कहा जा सकता। पर-उपदेश कुशल होने के बजाए उन्होंने स्वयं वही होकर दूसरों को बनाने का तरीका रखा। सार्वजनिक जीवन में सदभावना और अपनी साख को महत्व दिया। रचनात्मक काम और नए तरीके की जरूरत महसूस की। गुरूजनों से सीखे हुए तीन साधन – सतत्-प्रयत्न, आत्म-निरीक्षण व भगवद्-प्रार्थना – सदैव स्मरण रखे।

किन्तु जिस लक्ष्य से आकर्षित हो वे संघ में आए थे, उस में क्या उपलब्धि रही? गोविन्दाचार्य का जीवन दिखाता है कि वे शीघ्र ही राजनीति को प्राप्त हुए, क्योंकि स्वयं संघ अधिकाधिक राजनीति-ग्रस्त हो गया। राष्ट्रीय शिक्षा का काम केवल संगठन-शिक्षा और पार्टी-शिक्षा में बदल कर रह गया। स्वामी विवेकानन्द का भी नाम भर बचा, उन की उत्कट सीख पृष्ठभूमि में चली गई। इस बीच देश-विदेश के अन्य महान ज्ञानियों से कुछ सीखना तो दूर रहा। संघ-भाजपा द्वारा प्रकाशित, प्रसारित पुस्तक-पुस्तिकाएं इस का जीवन्त प्रमाण हैं। देश भर में अपने संगठन, कार्यालयों, विद्यालयों, आदि का विशाल जाल होने पर भी उन का बौद्धिक उत्पादन आश्चर्यजनक रूप से दयनीय, और बचकाना है।

इतिहास तो कौन कहे, विगत साठ वर्षों के समकालीन बौद्धिक विमर्श में भी उन के द्वारा कोई हस्तेक्षप दिखाई न पड़ा। जिस कम्युनिज्म से वे लड़ते रहे, और जो कम्युनिस्ट उन से लड़ते रहे, उस के बारे में भी संघ-भाजपा के नेताओं की अपनी जानकारी तक बड़ी सतही रही। कुछ बनी-बनाई टीका-टिप्पणियाँ, उद्धरण, व कोरे नारों के सिवा उन के लिखित-मौखिक भंडार में कुछ नहीं मिलता। जिन बिरले भारतीय विद्वानों ने कम्युनिज्म, इतिहास और धर्म विषयों में अपना मौलिक योगदान दिया, उसे भी देश में प्रसारित करने, कराने का काम न किया गया। बल्कि, उन्हें पहचाना तक नहीं गया – सम्मान करना तो दूर रहा।

सीताराम गोयल जैसे निःस्वार्थ मनीषी को संघ-भाजपा के बड़े नेता विदेशी एजेंट समझते थे! वह भी तब, जब कि उन से दशकों नियमित संपर्क व सहयोग रहा। कैसी दृष्टि और बुद्धि लेकर संघ-भाजपा के नेता आजीवन चलते रहे – यह सोच कर आश्चर्य होता है।

निस्संदेह, यह सब राष्ट्रीय शिक्षा में कोई योगदान नहीं। बल्कि, नितांत शिक्षा-शून्यता का संकेत है। इसीलिए विविध राज्यों में दशकों, और केंद्र में ग्यारह वर्ष सत्ता चलाने के बाद भी संघ-भाजपा की शैक्षिक नीति या देन कह कर एक भी तत्व का उल्लेख नहीं किया जा सकता। इस से क्या हानियाँ हुईं, इस का भारत-विरोधी और हिन्दू-विरोधी ताकतों ने जो बेतरह लाभ उठाया, वह अलग विषय है। पर राष्ट्रीय शिक्षा की जिम्मेदारी लेकर उस की ऐसी-तैसी करना स्वतंत्र भारत में संघ-भाजपा की सब से बड़ी विडंबना रही।

समाज-सेवा जरूर चलती रही। आपदा-पीड़ितों, वनवासियों की सेवा में संघ के काम को बार-बार देखा गया है। यद्यपि राजनीतिक कारणों से इस का श्रेय उन्हें उतना न मिला, जितना मिलना चाहिए था। हिन्दू धर्म के शत्रुओं ने संघ-भाजपा को हिन्दू समाज का राजनीतिक प्रतिनिधि मानकर भरपूर लांछित किया, बल्कि इसी को अपना राजनीतिक-बौद्धिक आधार बना लिया। यदि संघ-भाजपा में राष्ट्रीय शिक्षा पर सचमुच ध्यान रहा होता, तो इस की काट करना बड़ा सरल था। भारतीय जनता में धर्म व सत्य के प्रति सहज निष्ठा होने के कारण केवल सत्य को प्रस्तुत कर देने भर की जरूरत थी।

परन्तु राजनीति-ग्रस्तता, उस पर दलीय राजनीति की झक ने ठीक इसी विषय, राष्ट्रीय शिक्षा, में संघ को बिलकुल निष्प्रभावी बना दिया। यानी जिस टेक से प्रभावित हो गोविन्दाचार्य जैसे युवा संघ में आए थे, वही टेक कहीं पीछे छूट गई। दलीय राजनीति सर्वप्रमुख हो गई। इस ने उन का सारा समय व शक्ति सोख ली। फलतः, सच्ची शिक्षा और सच्चे गुरुजनों से दूर हो जाने के कारण, यह राजनीति भी दूसरे दलों की तरह महज सत्ता-राजनीति भर रह गई। आज गोविन्दाचार्य जैसे बिरले नेता का संघ-भाजपा मे अप्रासंगिक हो जाना, उसी प्रक्रिया का प्रतिनिधि उदाहरण है।

(साई फीचर्स)