कौन लेगा खेल मैदानों की सुध

 

 

सिवनी में तमाम व्यवस्थाएं एक के बाद एक दम तोड़ती हुईं प्रतीत हो रही हैं। ऐसा लग रहा है जैसे यहाँ पदस्थ होने वाले अधिकारी मोटी कमाई करके अन्यत्र रवानगी डाल देते हैं और जन प्रतिनिधि का दर्जा प्राप्त लोग अपने – अपने संगठन की राजनीति में ही व्यस्त रहे आते हैं।

इस तरह के तंत्र से सिवनी का नुकसान होता जा रहा है। इसके प्रभाव से खिलाड़ी वर्ग भी अछूता नहीं है। खिलाड़ियों को खेलने के लिये मैदान होने के बावजूद वे उसका उपयोग सही तरीके से नहीं कर पा रहे हैं। कुछ खेल मैदान तो शहर में ऐसे हैं जिनका अस्तित्व ही मिटाया जा रहा है और जिम्मेदार मूक दर्शक बनकर बैठे हुए हैं।

खेल मैदानों का उपयोग तमाम तरह की गतिविधियों के लिये खुलकर किया जा रहा है जबकि इन खेल मैदानों की संख्या गिनती की ही शेष रह गयी है। वास्तव में स्टेडियम को यदि छोड़ दिया जाये तो अब शहर के अंदर ऐसा कोई खेल मैदान नहीं बचा है जहाँ खेल के साथ ही साथ पर्याप्त मात्रा में दर्शक भी वहाँ उपस्थित रह सकें। एक प्रकार से ये गिने चुने मैदान भी सिर्फ और सिर्फ अभ्यास के लिये शेष रह गये हैं।

सिवनी शहर के आसपास बड़ी मात्रा में ऐसे स्थान रिक्त हैं जिनको खेल मैदान के लिये उपयोग में लाया जा सकता है लेकिन कोई भी इस दिशा में प्रयासरत नहीं दिख रहा है। सभी की मंशा यही दिखती है कि वे शहर के अंदर ही अभ्यास भी करें और प्रतियोगिताएं भी यहीं आयोजित करवायी जायें।

आश्चर्य जनक बात यह है कि सिवनी में हॉकी और फुटबाल के लिये तो स्टेडियम तक उपलब्ध हो चुके हैं लेकिन क्रिकेट के लिये एक अदद मैदान भी शहर में उपलब्ध नहीं है। क्रिकेट जैसे पापुलर खेल के खिलाड़ी सिवनी में अभ्यास के लिये भी दर-दर भटकने की स्थिति में दिखते हैं लेकिन जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक या तो होना नहीं चाह रहे हैं और या फिर उनकी इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं है जिसके कारण सिवनी का युवा होता बाल वर्ग अपनी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं कर पा रहा है।

क्रिकेट एक ऐसा खेल है जिसमें सिवनी के खिलाड़ियों के पास अभ्यास के लिये मैदान ही नहीं है। कुछ वर्षों पूर्व जब खेल मैदानों का अस्तित्व अपने वास्वतविक स्वरूप में था तब यहाँ क्रिकेट का स्तर काफी उच्च श्रेणी का माना जा सकता था, लेकिन खेल मैदान जैसे-जैसे सिमटते गये और इनका उपयोग अन्य कार्यों के लिये जमकर किया जाने लगा वैसे-वैसे क्रिकेट की प्रतिभाएं भी निराश होकर अन्य क्षेत्र की ओर रूख करने लगीं।

शहर में नये खेल मैदान की गुंजाइश अब कम ही रह गयी है। ऐसे में सभी का यह दायित्व बनता है कि खेल मैदानों के दुरूपयोग को गंभीरता के साथ रोका जाये ताकि खेल की युवा होती प्रतिभाएं जो अपने अधिकार के लिये अभी आवाज उठाने में अक्षम हैं, उनके साथ न्याय करते हुए उनके लिये नजीर पेश की जा सके।

मकबूल फिदा हुसैन