सिर्फ रिवाज और परंपरा के नाम पर क्यों बचा रहे बुर्का?

 

 

(सुंदरचंद ठाकुर)

मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर एक बहस शुरू होती दिख रही है। मुंबई के एक दैनिक पत्र ने यह मसला उठाया, हालांकि उसके बात करने का लहजा अलग था और मेरा उससे इत्तेफाक नहीं, लेकिन जावेद अख्तर की बात से सहमत हुआ जा सकता है, जो महिला सशक्तिकरण के नाते बुर्के और घूंघट दोनों को हटाने की बात कहते हैं।

बुर्के का रिवाज शुरू होने की वजह सभी को पता है कि कैसे पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को वस्तु की तरह देखा जाता था। लगभग ईसा पूर्व से ही यह प्रचलन शुरू हो गया था कि एक कबीले के लोग दूसरे कबीले को लूटते हुए उनके कीमती माल-असबाब के साथ सुंदर महिलाओं को भी लूट ले जाते थे। मध्ययुगीन निरंकुश शासकों के समय यह प्रचलन और बढ़ गया। राजा तब अपने हरम को लूटी हुई स्त्रियों से भरने लगे। ऐसे निरंकुश वहशी सरदारों और शासकों से अपनी स्त्रियों को बचाने के लिए उन्हें बुर्के और घूंघट में रखा जाने लगा। लेकिन कालांतर में उन शासकों और सरदारों की निरंकुशता खत्म हो गई और दुनियाभर में लोकतांत्रिक गणराज्यों का उदय हुआ, जहां समाज को परिचालित करने के लिए कानून बने, पुलिस बनी। स्त्रियों को हर लिहाज से सुरक्षा दी गई। कायदे से निरंकुश सरदारों और राजाओं के नहीं रहने और महिलाओं को सरकार द्वारा सुरक्षा प्रदान किए जाने पर बुर्कों और घूघटों को भी अपने आप ही खत्म हो जाना चाहिए था, पर बहुत चालाकी से इन्हें पुरुषों ने परंपराओं और रिवाजों का हवाला देते हुए बरकरार रखा। उन्होंने यह नहीं देखा कि उनकी महिलाओं का इनमें किस तरह दम घुटता है। किस तरह बुर्का आजादी का मजाक उड़ाता है और जिंदगी की अनुभूतियों को ऊंचाई पर नहीं जाने देता।

बात जब रिवाजों और परंपराओं की करें, तो इन्हें लेकर मेरे कुछ निजी अनुभव रहे हैं। मैंने देखा है कि परंपराएं वक्त के साथ कैसे बदल जाती हैं। मनुष्य ने प्रजाति के रूप में एक समाज की संरचना की और खुद को नियमों-कानूनों से बांधा, क्योंकि वह तभी विकास कर सकता था। यानी मनुष्य होने का मकसद ही विकास करना है और विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तब कि हम पुरानी रूढ़ियों से बाहर न निकलें। मैंने अपने बचपन में देखा था कि पहाड़ों में बहुत छुआछूत मानी जाती थी। निम्न जाति के लोगों के हाथ का छुआ भोजन तो छोड़िए पानी पीना तक निषिद्ध था। खुद अपने ही घर में हमें चूल्हे के पास नहीं जाने दिया जाता था। भोजन हमेशा एक निश्चित दूरी के बाहर दिया जाता था, मानो कि कोई अदृश्य लक्ष्मणरेखा खिंची हो। मासिकधर्म के दौरान महिलाओं को घर के एक कोने में रहना पड़ता था। उन्हें भोजन भी उसी निर्वासित कोने में दिया जाता था। पर आज यह सब संभव नहीं। बच्चों और महिलाओं, दोनों का जीवन बहुत बदल गया है। महिलाएं काम पर जाती हैं। जाहिर है कि वे मासिकधर्म के दौरान अपने कोनों में निर्वासित होने के लिए दफ्तर से छुट्टी नहीं ले सकतीं। आज पुराने समय की तरह घरों में बने चूल्हों पर भोजन नहीं बनता। बच्चे भी आधा भोजन मुंह में ठूंस स्कूल की ओर भागते हैं। जीवन में आए इन बदलावों के मुताबिक हमने नियम-कानून बदले। शहरों में किसी घर में भोजन को लेकर छुआछूत नहीं मानी जाती और न महिलाओं को मासिकधर्म के दौरान कोनों में निर्वासित किया जाता है। बुर्के और घूंघट की बात करें, तो आज उनका कोई औचित्य नहीं रह गया है। कोई महिला अगर खूबसूरत है, तो वह अपनी खूबसूरती के अहसास के साथ बाजार में घूम सकती है। यह उसका अधिकार है, वैसा ही जैसे पुरुष के पास है। पुरुष अच्छे कपड़े पहनते हैं, नई स्टाइल में बाल कटाते हैं, अच्छा दिखने के लिए दस तरह की और भी कवायदें करते हैं, उन्हें अच्छा दिखने पर अच्छा लगता है, तो महिलाओं को भी क्यों न ऐसी छूट मिले। कोई महिला अपनी मर्जी से भला क्यों बुर्के में रहना चाहेगी? कई लड़कियां सिर्फ घरवालों को खुश रखने के लिए घर से निकलते हुए बुर्का पहनती हैं और बाहर जाकर उतार देती हैं। यह जो उनमें बुर्का उतारकर बाकी लोगों की तरह स्वच्छंद घूमने की दबी हुई इच्छा है, उसे पूरा करना एक प्रगतिशील समाज का बुनियादी फर्ज है। इसीलिए बुर्के को परंपरा के रूप में ढो रहा मुस्लिम समाज और हिंदुओं का वह समाज जहां घूंघट एक रिवाज है, दोनों को खुद ही चिंतन-मनन करने की जरूरत है कि आज के बदले परिदृश्य में वे किसी बोझे की तरह इस कुरीति को ढोने को अभिशप्त क्यों रहें। देश में कोई नियम, कानून बने इसकी जरूरत क्या, उन्हें खुद ही सदियों से ढोए जा रहे इस बोझ को उतार फेंकना चाहिए।

(साई फीचर्स)

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