नदी किनारे प्यासे घोंघे की कहवात चरितार्थ हो रही छपारा में!

 

 

नयी व्यवस्था चरमरायी, दो दशक पुरानी लाईन से सप्लाई

(फैयाज खान)

छपारा (साई)। नदी किनारे घोंघा प्यासा की तर्ज पर एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बाँध भीमगढ़ का पेट भरने वाली पुण्य सलिला बैनगंगा के मुहाने पर बसे छपारा के वाशिंदों को पेयजल के लिये तरसना पड़ रहा है।

जिला मुख्यालय से बैनगंगा नदी के किनारे और भीमगढ़ बाँध के पहले बने भीमगढ़ बाँध के मुहाने में होने के बावजूद छपारा को पानी की समस्या के लिये परेशान होना पड़ रहा है। दरअसल इंटकवेल से काफी पहले पानी के सूख जाने के कारण अब छपारा वासी पानी के लिये परेशान हो रहे हैं। हालात ये हैं कि पिछले एक सप्ताह से छपारा में पानी की सप्लाई बाधित पड़ी है।

प्यास लगने पर कुंआ खोदने की तर्ज पर अब ग्राम पंचायत कहीं पेंच नदी का पानी माँग रही है तो दो दशक पुरानी सड़ चुकी कर्बला घाट वाली पाईप लाईन से पानी की सप्लाई करा रही है। छपारा में जनपद पंचायत होने के बावजूद पेयजल की आपूर्ति के सही योजना न होना और हर साल पानी की कमी का सामना करना लोगों की नियति बन चुका है।

जिले से निकलकर दूसरे जिलों को भी पानी की आपूर्ति करने वाली बैनगंगा नदी के किनारे पर बसा छपारा पानी की समस्या से लगातार जूझता रहता है। छपारा से भीमगढ़ बाँध की दूरी लगभग दस किलोमीटर है। बारिश के दिनों में छपारा का कुछ इलाका डूब क्षेत्र में आ जाता है।

एशिया के पहले मिट्टी के बाँध (भीमगढ़ जलाशय) जिससे दूसरे जिलों को भी पानी की सप्लाई की जाती है। बावजूद इसके यह छपारा का दुर्भाग्य है कि बारिश के दिनों में भी यहाँ की लगभग बीस हजार से अधिक की आबादी को पानी के लिये जद्दोजहद करना पड़ता है। बारिश के दिनों में यहाँ सप्ताह में दो बार और बाकी दिनों में एक दिन पानी की सप्लाई होती है। यह हर साल की कहानी है।

छपारा में वैसे तो बैनगंगा का पाट काफी चौड़ा है लेकिन दिसंबर के बाद से नदी लगातार सिकुड़ती जाती है। इन दिनों नदी में कई स्थानों पर डबरे की शक्ल में पानी जमा है। दरअसल नदी की सिल्ट को निकालने के लिये कभी कोशिश ही नहीं की गयी है। जिसके कारण नदी में काफी मिट्टी जमा हो गयी है।

इसके साथ ही बारिश के बाद जैसे जैसे नदी सूखती जाती है नदी में कई लोग तरबूज, डिंगरा आदि की खेती करने लगते हैं। इसके लिये अनुमति जैसी कोई कोशिश नहीं की जाती है। इन फसलों की सिंचाई के लिये भारी भारी मोटरें लगा ली जाती हैं लेकिन प्रशासन बिना अनुमति पानी खींचने वालों पर कोई कार्यवाही नहीं करता है।

इसी का नतीजा है कि कुछ लोगों ने तो अपने खेतों के लिये निजी तालाब बना रखे हैं जिसमें नदी से पानी खींचकर भरा जाता है। स्थानीय नागरिकों ने कई बार सिल्ट हटाने के लिये अनुमति की माँग की लेकिन प्रशासन ने हर बार उस आवेदन को ठण्डे बस्ते में डाल दिया।

मई की शुरूआत में ही छपारा में जल संकट गहरा गया है। उसके बाद अब ग्राम पंचायत नागरिकों को बहलाने के लिये कभी पेंच का पानी माँगती नजर आती है तो कभी पीएचई विभाग से गुहार करती है, जबकि बैनगंगा नदी बालाघाट तक के खेतों की प्यास बुझाती है।

पानी की समस्या को लेकर सरपंच पूनम संयम और उपसरपंच ने पीएचई ई विनोद तिवारी से मुलाकात कर बताया कि इंटरवेल के कुंए में अब पानी भर नहीं रहा है। कुंए के आसपास भारी मात्रा में सिल्ट जमी हुई है जिस वजह से नदी से इंटरवेल के कुंए तक पानी नहीं पहुँच रहा है। इससे इंटकवेल की सप्लाई बंद हो चुकी है।

इनका कहना है कि इंटरवेल निर्माण के समय भारी लापरवाही बरती गयी हैं जिस वजह से छः साल बीत जाने के बाद भी जल आवर्धन योजना के तहत दो करोड़ 75 लाख रूपये स्वीकृत किये गये थे। बावजूद इसके योजना का लाभ पूर्णता लोगों को अभी नहीं मिल पाया है।

ग्राम पंचायत लोगों की प्यास बुझाने के लिये अब टैंकरों का सहारा ले रही है। ग्राम पंचायत के पास एक टैंकर है जिससे पानी की सप्लाई की जाती है। वहीं पुरानी कर्बला घाट लाईन से पानी की सप्लाई की कोशिश की जा रही है। जरूरी है कि छपारा में बैनगंगा की सफाई के लिये फौरन सिल्ट निकासी का अभियान चलाया जाये। इसके साथ ही नदी पर खेती को प्रतिबंधित किया जाये। कुछ रसूखदार सारे कायदों को धता बताकर पानी लेते हैं उन्हें भी सख्ती से रोका जाये नहीं तो आने वाले वर्षों में नागरिकों की परेशानी बढ़नी तय है।

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