राहुल गांधी का मृत्योर्मा अमृतगमय क्षण

 

 

(पंकज शर्मा)

राहुल गांधी आज एक निर्लिप्त विजेता हैं। कांग्रेस के अध्यक्ष पद से उनका इस्तीफ़ा उनका आत्मकथ्य है। ऐसा आत्मकथ्य, जिसने, खुल कर कोई माने-न-माने, सबको भीतर तक झिंझोड़ दिया है। कांग्रेसियों की उस ढीठ क़तार को छोड़ दीजिए, जिसकी आंखों से लाज-शर्म कभी की काफ़ूर हो चुकी है, मगर ऐसे भी बहुत हैं, जिनका ज़मीर अभी बाक़ी है, और वे सब राहुल के इस्तीफ़े के बाद निगाहें नीची कर अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेद रहे हैं।

कांग्रेस के भीतर का मौजूदा बेहाल-सा मंज़र और पीले पड़ गए चेहरे किसी से कुछ नहीं बोलेंगे, लेकिन उनके बिना बोले भी पूरा देश समझ गया है कि राहुल की स्व-समाधि ने कैसे एक पूरे शहर को वीरान कर डाला है। कल तक हर बात के लिए उन्हें कोसने वालों को अचानक अहसास हो रहा है कि राहुल की आवाज़ से ही तो कांग्रेस का दीया जल रहा था। अध्यक्ष पद से उनकी विदाई के बाद से अब यह लौ इस क़दर फड़फड़ा रही है कि हाथों की कोई ओट उसकी हिफ़ाजत का ज़िम्मा लेने में सक्षम नहीं दिखाई दे रही।

राहुल के इस्तीफ़े ने उन्हें असहमति में उठे उन युगांतकारी हाथों में से एक का दर्ज़ा दे दिया है, जिनकी बदौलत भारत, भारत है। राहुल अब पूरी तरह विपक्ष में हैं। सड़ांध मारती उस व्यवस्था के विपक्ष में, जिसे बदले बिना भारत को भारत बनाए रखने में रत्ती भर भी योगदान करना नामुक़िन है। फिर भले ही यह व्यवस्था नरेंद्र भाई मोदी के सिंहासन के पायों से लिपटी हो या ख़ुद राहुल के अपने संगठन की जड़ों को भुरभुरा बना चुकी हो। व्यवस्था-विरोध के इस संघर्ष में राहुल ने सर्वस्व झौंक दिया है।

मैं जानता हूं कि पिछले कई बरस से कैसे-कैसे बिच्छूं उनकी हथेली के सहारे अपने प्राण बचा रहे थे। उनकी भलमनसाहत के चलते पार्टी ने ऐसे-ऐसे महासचिवों, सचिवों और देश-प्रदेश के पदाधिकारियों को भुगता, जिन्होंने जिस चीज को हाथ लगाया उसे नष्ट कर दिया। लेकिन राहुल इस भाव से भरे थे कि जब बिच्छू, बिच्छू हो कर अपना स्वभाव नहीं बदल रहे तो वे राहुल हो कर अपना स्वभाव कैसे छोड़ दें? उन्हें लगता था कि कांग्रेस की भावी कमान के लिए जो पौध वे तैयार कर रहे हैं, वह एक दिन ज़रूर लहलहाएगी। नव-आगंतुकों और दशकों से जमे चेहरों में खींसे निपोरते घूम-घूम कर अपना मतलब साधने वालों की बड़ी जमात थी। सो, पानी आखि़रकार राहुल के सिर से गुज़रना ही था, गुज़र गया।

जब ज़लालत बेहद पास से गुज़रती है तो उसकी खरोंच का सबसे बड़ा निशान आत्मा पर पड़ता है। इसलिए राहुल का इस्तीफ़ा, इस्तीफ़ा तो जो हैं, सो, है, वह एक ऐसी दर्द भरी फ़रियाद है, जिसे वे बिना अपना पद त्यागे हमें सुना ही नहीं सकते थे। कल्पना तो कीजिए कि राहुल ने यह बात बेबसी का कितना भारी पत्थर रख कर हमारे सामने कु़बूल की होगी कि वे अपने पद से क्यों हट रहे हैं? ज़रा इस्तीफ़े में लिखी इबारत के गर्भ से गूंजती बातों को ग़ौर से सुनिए।

एक, 2019 के चुनाव में हार के लिए कांग्रेस-अध्यक्ष के नाते मैं ज़िम्मेदार हूं।

दो, हमारी पार्टी के भविष्य और उसकी अनवरत बढ़त के लिए जवाबदेही की समीक्षा बहुत ज़रूरी है। कांग्रेस-अध्यक्ष पद से मेरे इस्तीफ़े की यही बुनियादी वज़ह है।

तीन, पार्टी का पुनर्निमाण करने के लिए बेहद सख़्त फ़ैसले लेने होंगे।

चार, 2019 की पराजय के लिए बहुत-से लोगों की जवाबदेही करना ज़रूरी है। ऐसे में यह न्याय-विरुद्ध होता कि बाक़ी सबको तो उत्तरदायी ठहरा दिया जाए और कांग्रेस-अध्यक्ष के नाते मैं अपनी जवाबदेही की अनदेखी कर दूं।

पांच, मैं राजनीतिक सत्ता पाने की मामूली लड़ाई कभी लड़ ही नहीं रहा था। मेरे मन में भारतीय जनता पार्टी के खि़लाफ़ कोई नफ़रत है ही नहीं। लेकिन मेरे बदन की हर जीवित कोशिका भारत की उनकी अवधारणा के विरोध में सहज-बोध से फड़कने लगती है। यह प्रतिरोध इसलिए एकदम स्वाभाविक है कि मेरा समूचा अस्तित्व भारत की उस कल्पना से भीगा हुआ है, जो भाजपाई इरादों के सीधे उलट है। यह संघर्ष नया नहीं, हज़ारों बरस पुराना है। जहां वे भेदभाव देखते हैं, वहां मुझे समरूपता दिखाई देती है। जहां वे द्वेष देखते हैं, मुझे प्रीति दिखाई देती है। वे जिससे भय खाते हैं, मैं उसे गले लगाता हूं। हमें भारत की इसी मूल-अवधारणा की अब जी-जान से रक्षा करनी है।

छह, इस चुनाव में मैं ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनके द्वारा कब्ज़ा लिए गए सभी संस्थानों के खि़लाफ़, निजी तौर पर, अपना सर्वस्व दांव पर लगाया और ऐसे भी मौक़े आए, जब मैं नितांत अकेला खड़ा था। मैं इस युद्ध से कभी पीछे नहीं हटूंगा। मैं कांग्रेस का आज्ञाकारी सिपाही और अपने देश का निष्ठावान बेटा हूं। मैं अपनी अंतिम सांस तक संघर्ष करता रहूंगा।

सात, लोकतंत्र की सभी संस्थाओं की तटस्थता और पारदर्शिता की पुनर्स्थापना का, वंचितों को उनके हक़ वापस दिलाने का और अर्थव्यवस्था को फिर पटरी पर लाने का काम सिर्फ़ कांग्रेस ही कर सकती है, लेकिन यह महत्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उसे अपने भीतर आमूलचूल सुधार लाने होंगे। हम कांग्रेस के असंख्य प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं के बूते यह कर के दिखाएंगे।

राहुल की भावनाओं से साफ़ है कि वे पूरी तरह आश्वस्त हैं कि उनके इसी गर्दें-सफ़र से दूर की मंज़िल निकलेगी। अब उन्हें अपने पावों के छाले मज़ा देने लगे हैं। इसलिए मैं जानता हूं कि राहुल अब अपने क़दम रोकने वाले नहीं हैं। नए मुखिया की अगुआई में कांग्रेस उनके साथ चले-न-चले, वे अब चल पड़े हैं। देर-सबेर वह वक़्त आएगा-ही-आएगा, जब दूर से राहुल को देखने वाले भी एक ऐसी कांग्रेस बनाने में उनका हाथ बटाने लगेंगे, जिसके बिना जम्हूरियत का जहाज आज की इकलखुरा सियासत का सियाह समंदर पार नहीं कर सकता।

कांग्रेस की राजनीति अंधेरे से ढंका गन्ने का खेत है। उसमें कौन कहां क्या कर रहा है, किसी को पता नहीं चलता। लेकिन राहुल को आहिस्ता-आहिस्ता इसका पता चल गया। वे चूंकि इस व्यवस्था को पालने-पोसने को तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्हें जाना पड़ा। वे व्यवस्था को अपने हाल पर छोड़ने के लिए नहीं, बदलने के लिए हटे हैं। जिस दिन यह व्यवस्था बदलेगी, वे लौटेंगे। अगर नहीं बदलेगी तो इस सड़न में दम तोड़ती कांग्रेस की फिर पड़ी भी किसे है?

राहुल को मिट्ठू, चिटरगोटी बना कर रखने वालों के लिए राहुल थोड़े ही बने हैं। जो ऐसे आख्यान गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिनमें व्यथा-कथाओं की अनदेखी तो कर ही दी जाए, बल्कि राहुल की साहस-गाथाएं भी दफ़न कर दी जाएं, अगर वे अब भी नहीं समझे हैं कि राहुल में अपनी ही चौखट से टकराने का कैसा जीवट है तो ऐसों के बौड़मपन पर तरस खाने के अलावा हम क्या करें? जिन्हें लग रहा है कि राहुल ने अपने पांव के निशान मिटा दिए हैं, इसलिए समय की रेत से उनके पैरों के निशान ग़ायब हो जाएंगे, आइए, हम उनकी अज्ञानता की बलैयां लें। मेरी मानिए तो राहुल मृत्योर्मा अमृतगमय हो गए हैं। वे अमृत्यु की तरफ़ बढ़ चले हैं। राहुल कांग्रेसी-अमरपक्षी की राख समेट कर उसे सूर्य के शहर हेलियोपोलिस के हवाले कर रहे हैं। इसी राख से कांग्रेसी-फीनिक्स का पुनर्जन्म होगा। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारी हैं।)

(साई फीचर्स)