कुपोषण का मैला दाग

 

 

(शरद खरे)

राज्य स्तर पर चलाये जा रहे दस्तक अभियान के चलते सिवनी में एक हज़ार से ज्यादा कुपोषित बच्चों की जानकारी प्रकाश में आना अपने आप में शर्म की बात इसलिये मानी जा सकती है क्योंकि बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिये केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा अपना खज़ाना सालों से खोला गया है।

दस्तक अभियान में पैदा होने वाले बच्चों से लेकर पाँच साल तक के बच्चों की जानकारियां एकत्र की जा रही है। इसमें एक हज़ार बच्चे अगर कुपोषित मिले तो इसे क्या माना जाये! ये बच्चे कुपोषण का शिकार क्यों हैं इस बारे में जाँच अवश्य करवायी जाना चाहिये।

महिला एवं बाल विकास विभाग के द्वारा प्रसूता और नवजात से लेकर पाँच साल के बच्चों के पोषण आहार के संबंध में स्पष्ट दिशा निर्देश जारी किये गये हैं। इन बच्चों को पोषण आहार भी मुहैया करवाया जाता है। कहते हैं कि अगर इन पोषण आहार का स्वाद ले लिया जाये तो आम घरों में बनने वाले पोषण आहार से ज्यादा स्वाद इसमें होता है।

इसके अलावा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय के अधीन जिला अस्पताल, लखनादौन, घंसौर, कुरई और केवलारी में पोषण पुर्नवास केंद्र (एनआरसी) का संचालन किया जा रहा है। इसके लिये भी भारी भरकम बजट का प्रावधान है। इन विकास खण्ड में अगर बच्चे कुपोषण का शिकार हुए हैं तो निश्चित तौर पर एनआरसी इसके लिये जिम्मेदार है।

छः माह तक के बच्चे अगर कुपोषित मिले हैं तो यह माना जा सकता है कि इन पर एनआरसी और महिला एवं बाल विकास विभाग की नज़रें नहीं पड़ी होंगी पर इससे अधिक आयु के बच्चे अगर कुपोषित मिले हैं तो यह निश्चित तौर पर दोनों ही विभागों के आला अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाने के लिये पर्याप्त माना जा सकता है।

इन कुपोषित बच्चों के लिये रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया था। इस रक्तदान शिविर में जिलाधिकारी प्रवीण सिंह, जिला पुलिस अधीक्षक कुमार प्रतीक सहित अनेक अधिकारियों, कर्मचारियों ने रक्तदान किया था। यक्ष प्रश्न यही खड़ा है कि अभी तो इन कुपोषित बच्चों को रक्त चढ़ा दिया जायेगा, पर चार पाँच माह बाद यदि एक बार फिर ये बच्चे कुपोषित हो गये तो क्या फिर से इस स्तर पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया जायेगा!

इस शिविर में जिलाधिकारी ने रक्तदान किया है। इस लिहाज़ से इस पूरी सच्चाई से उनका वाकिफ होना लाज़िमी ही होगा कि कुपोषण का कारण आखिर क्या है! जिलाधिकारी प्रवीण सिंह से उम्मीद की जा सकती है कि उनके द्वारा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी एवं जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी से यह जवाब सवाल किया जाये कि शासन की इतनी योजनाओं के बाद इतनी तादाद में बच्चे कुपोषण का शिकार कैसे हो गये!