ऐसा विकास भला किस काम का, जो दुनिया की उम्र छोटी कर दे

 

 

(रवि पाराशर)

विकास के मुद्दे पर भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में बहस हो रही हैं, आरोप-प्रत्यारोप लग रहे हैं। अविकसित और विकासशील देशों में राजनीतिक सत्ताएं नए-नए नारे दे रही हैं। खासकर विकासशील दुनिया में जिस विकास की बात हो रही है, वह मोटे तौर पर आर्थिक सरोकारों से ही जुड़ा है। सड़क, बिजली, पानी, पक्के आवास, स्कूल, अस्पताल इत्यादि बनाना, यानी बुनियादी ढांचे के निर्माण की गति बढ़ाना ही विकास है। समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े नागरिक समूहों का जीवन स्तर ऊपर की सीढ़ियों तक पहुंचाना ही इस विकास का मूल उद्देश्य है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि भौतिक संसाधनों की उपलब्धि बहुतायत में सुनिश्चित कर देने को ही क्या विकास कहा जा सकता है? क्या ऐसे भौतिक विकास को किसी राष्ट्र-राज्य के लिए सही दिशा में बढ़ने की सीढ़ी माना जा सकता है?

सारी नदियां आखिरकार समुद्र में मिलती हैं। यही प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन जीवन की गति के लिए बनाई गई विकास नाम की सड़क का आखिरी छोर अगर इंसानों को अंधे पातालगामी निर्जल कुओं में गिर जाने को विवश करे, तो क्या यह जीवन के लिए न्यायसंगत होगा? हताश, निराश लोग अगर विकास की चमचमाती गगनचुंबी इमारतों को आत्महत्याओं के लॉन्चपैड बना लें तो क्या विकास उद्देश्यहीन नहीं हो जाएगा? गौर करने वाली बात यह है कि विश्व गुरु और सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत में चुनाव लगातार खर्चीले होते जा रहे हैं। राजनीतिक पार्टियां बहुत से वादे जनता से करती हैं, लेकिन पर्यावरण जैसे संवेदनशील मसलों पर कोई पार्टी गंभीर नजर नहीं आती। जबकि इस दौर का सबसे बड़ा मुद्दा पर्यावरण संरक्षण ही है। लोक नहीं बचेगा, तो तंत्र क्या करेगा? क्या दुनिया भर में विकास की अवधारणाएं बनाते और उन पर क्रियान्वयन करते समय सुदूर भविष्य की पारिस्थितिकी पर मंथन किया जा रहा है? ऐसा विकास भला किस काम का, जो दुनिया की उम्र छोटी कर दे? दुनिया ही नहीं रहेगी तो विकास के तमगे किसे दिखाकर हम छाती फुलाएंगे? यह विडंबना है कि जो कथित तात्कालिक विकास दुनिया करती जा रही है, उसकी वजह से ही धरती की उम्र घट रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोज आ रही रिपोर्टों के मुताबिक ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रही है, ओजोन परत छीजती जा रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्रों का जल स्तर बढ़ रहा है। प्रदूषण बढ़ता जा रहा है, बहुत से जीव-जंतु लुप्त हो चुके हैं, बहुत से विलुप्ति के कगार पर हैं। बहुतेरे मानव निर्मित कारणों से वैश्विक स्तर पर जीवन संकट में घिर रहे हैं। लेकिन विश्व समाज इस दिशा में बहुत गंभीर नजर नहीं आ रहा। पर्यावरण बचाने का काम औपचारिक तौर पर ही हो रहा है। जलवायु और पर्यावरण को लेकर दुनिया भर में बातें हो रही हैं, लेकिन जमीन पर जरूरी काम नहीं हो रहा। अमेरिका जैसे विकसित देशों का रवैया चौंकाने की हद तक निराश कर रहा है। दावे हैं कि भारत विकसित देशों की जमात में शामिल होने वाला है। सिर्फ भौतिक विकास की बात करें तो एक चश्मा लगाकर ऐसा होता दिख भी सकता है। लेकिन दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के सवा अरब लोग पर्यावरण की तरफ बहुत कम जागरूक नजर आते हैं।

केंद्र सरकार को नया नारा देना पड़ा है- जलशक्ति की ओर जनशक्ति। जल्द ही सबको पक्के घर, बिजली और पानी मुहैया कराने का लक्ष्य पूरा करने के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन जमीन के ऊपर साफ हवा और नीचे पानी का गंभीर टोटा हो तो ये दावे सरकार क्या वास्तव में पूरे कर पाएगी? आजाद भारत में हम कुदरती व्यवस्थाओं के प्रति संवेदनशील रहते तो ऐसी नौबत न आती। कोई भी सरकार इस ओर कितनी भी संवेदनशील क्यों न दिखाई दे, बिना प्रचुर जन-सहयोग के जीवन बचाने का महायज्ञ संपूर्ण नहीं हो सकता। लेकिन कहीं बाढ़, कहीं सूखे जैसे हालात से निपटने के लिए संकल्पबद्ध होकर भी हम कुछ नहीं कर सकते। यह काम तो सरकारों को ही करना होगा।

हमने नदियों का क्या हाल किया है, हम जानते हैं। देश भर में अधिसंख्य तालाब पाट कर हमने उन पर मकान बना लिए हैं। भारत में बहुसंख्य सनातन धर्मावलंबी हवा, पानी, सूर्य, चंद्रमा, अंतरिक्ष, विभिन्न अनाजों, पेड़-पौधों आदि प्राकृतिक संसाधनों की पूजा बड़े कृतज्ञ भाव से रोजाना करते हैं। फिर ऐसा क्यों हुआ कि सदी भर के अंतराल में देश के बहुसंख्य लोग संस्कार विमुख हो गए? आज भी घर पर हवन होता है तो लोग आम की लकड़ी, पत्तियां और दूसरी वानस्पतिक हव्य सामग्री की तलाश करते हैं। चावल-दाल और दूसरे अनाजों की रंगोलियां बनाई जाती हैं। क्या प्रकृति की पूजा हमारे लिए कर्मकांड तक ही सीमित रह गई और कर्तव्य बोध धीरे-धीरे लुप्त हो गया? सदियों से आयुर्वेद का ज्ञान रखने वाले भारतीय नागरिक पौधों और वृक्षों का संरक्षण भूलते जा रहे हैं। हम इस सचाई से भी मुंह नहीं मोड़ सकते कि आबादी के लिए भौतिक विकास होगा, सड़कें, रेलवे लाइन, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, बस स्टैंड, मॉल इत्यादि बनेंगे, तो बहुत से पेड़ काटने पड़ेंगे। नैशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल इस मामले में काफी कड़ा रुख अख्तियार कर रहा है, लेकिन हालात जितने सुधरने चाहिए, उतने सुधर नहीं रहे।

तो धरती को बचाने के लिए, जीवन की रक्षा के लिए क्या किया जाए? इस बुनियादी सवाल पर बड़े पैमाने पर विचार का समय है। कैमरों की चमक-दमक के बीच समारोहपूर्वक पौधारोपण कार्यक्रम आयोजित करने से तो कुछ खास नहीं होने वाला। सामाजिक जीवन के विभिन्न पड़ावों के साथ हरियाली की प्रागैतिहासिक, ऐतिहासिक जुगलबंदी के स्वर फिर से झूम-झूम कर मुखर हों, ऐसे यत्न ही धरती को बचा पाएंगे। शिक्षा, अध्यवसाय और सेवानिवृत्ति के बाद के समय को आधिकारिक तौर पर पर्यावरण से जोड़कर ही हरी-भरी सामाजिक परंपरा फिर से जीवित की जा सकती है।

(साई फीचर्स)