जब एक पार्टी ने कहा, पुराने नोट बदलवाओ

 

 

(विजय त्रिवेदी)

साल 2018, कर्नाटक विधानसभा चुनावों के दौरान दक्षिणी कर्नाटक में हालात समझने की कोशिश कर रहा था तो पता चला कि ज्यादातर उम्मीदवार चाहते थे, किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिले ताकि सरकार बनाते वक्त उनकी कीमत बढ़ जाए। जब मुख्यमंत्री कुमार स्वामी के चुनाव क्षेत्र रामनगर पहुंचा तो पता चला कि इसी इलाके की पहाड़ी पर सुपरहिट फिल्म शोले की शूटिंग हुई थी और उन चुनावों में सबसे हिट डायलॉग रहा- कितने आदमी हैं? हर पार्टी का नेता इसी सवाल का जवाब ढूंढ रहा था।

2008 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव हो रहे थे। उस वक्त शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं। वोटिंग से एक दिन पहले वाली रात में मेरे एक मित्र की गाड़ी घर के बाहर रुकी। उन्होंने बताया कि वे एक उम्मीदवार के लिए पैसे बांटने के काम पर जा रहे हैं। मैं और कुछ पूछता उससे पहले उन्होंने गाड़ी की डिक्की खोल कर दिखाया तो मुझे अपनी आंखों पर भरोसा नहीं हुआ। दो सूटकेस नोटों की गड्डियों से भरे हुए थे।

2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के दौरान उत्तर प्रदेश के बड़े शहरों को समझने की कोशिश कर रहा था। कुछ महीने पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक शहर में बीजेपी के प्रदेश के एक बड़े नेता से मुलाकात हुई। उनसे नोटबंदी के असर के बारे में पूछा तो कैमरा बंद करने के बाद उन्होंने जवाब दिया, प्रदेश अध्यक्ष जी ने पूछा था तो हमने कहा कि नोटबंदी तो बहुत अच्छी चीज कर दी पीएम ने, लेकिन अब हमारे इलाके में पीएम की रैली मत करवाना क्योंकि उसके लिए पैसा कहां से लाएंगे? ऐसी ही एक और घटना यूपी चुनाव से ही जुड़ी है। एक पार्टी के एक उम्मीदवार ने टिकट हासिल करने के लिए पार्टी आलाकमान को कई करोड़ रुपये कैश दिए थे। इसके तुरंत बाद ही नोटबंदी का ऐलान हो गया तो उस उम्मीदवार को हुकुम मिला कि अपने पुराने नोट वापस ले जाकर नए नोट जमा करवा दें। इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का, वह भी नए नोटों में इंतजाम करना नामुमकिन था। जब उसने लाचारी जताई तो पार्टी आलाकमान ने उसका टिकट काट कर दूसरे उम्मीदवार को दे दिया जिसने नए नोटों में पैसा जमा करने की हामी भर दी थी।

ये सब सच्चे किस्से हैं जो हमारी व्यवस्था को थोड़ा-थोड़ा नंगा करते हैं, लेकिन जब चुनाव सुधारों की बात होती है तो मुझे शक होता है क्योंकि चुनाव सुधारों का मोटा मतलब है राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर लगाम कसना, बेहतर और साफ चुनाव करवाना। एक जमाना पहले एक चुनाव आयुक्त साहब का इंटरव्यू कर रहा था तो उन्होंने चुनाव आयोग की सिफारिशों की लंबी लिस्ट गिनानी शुरू की। मैंने पूछा कि इनमें से कितने सुधार हो गए हैं तो जवाब मिला कि सब सरकार के पास विचार के लिए पड़े हैं। मैंने कहा तो इसका क्या फायदा? फिर तो इन्हें फ्रेम में जड़वाकर रख लीजिए, बच्चों को बताने के काम आएंगे।

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान मुंबई से थोड़ी दूर एक शहर में एक मित्र राजनेता के यहां पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक हो रही थी। वहां केवल उन लोगों को बुलाया गया है जिन्हें फर्जी वोट दिलवाने में महारत हासिल है और वे शान से अपनी महारत का जिक्र कर रहे थे। कुछ ज्यादा अनुभवी लोगों ने सुझाव भी दिए कि फर्जी वोट दिलवाते वक्त किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, साथ ही दूसरी पार्टी के फर्जी वोटर को कैसे पहचाना जा सकता है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत से बातचीत कर रहा था। रावत निराश नहीं थे। उनका कहना था मोदी सरकार चुनाव व्यवस्था के सुधार के रास्ते पर है। मोदी सरकार का सबसे बड़ा दावा रहा कि नोटबंदी का असर यह होगा कि चुनावों में काले धन का इस्तेमाल कम होगा जिससे व्यवस्था सुधरेगी, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान ही बरामद की गई रकम 3 गुना बढ़ गई थी और उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में इसकी संख्या में लगातार बढ़ोतरी ही हुई यानी चुनावों में पैसे का इस्तेमाल कम नहीं हुआ बल्कि लगातार बढ़ रहा है। जाहिर है चुनावों में ब्लैकमनी का इस्तेमाल रोकने की कोशिश कारगर नहीं हो पा रही है।

पश्चिम बंगाल के सुकुमार सेन को आजाद हिंदुस्तान का पहला चुनाव आयुक्त बनाया गया था और 1951 में मतदाता सूची तैयार करने का काम शुरू हुआ। देश में पहली बार सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार दिया गया था। मतदाता सूची बनाते वक्त सेन की टीम को पहली मुश्किल का सामना करना पड़ा जब उन्हें जानकारी मिली ऐसी महिला वोटर्स की तादाद बड़ी है जिनके अपने कोई नाम ही नहीं थे। उनकी कोई पहचान ही नहीं थी। इन महिलाओं को किसी की पत्नी, किसी की बहू किसी की मां के नाम से दिखाया गया था। इसकी बड़ी वजह यह थी कि तब खासतौर से उत्तर भारत और मध्य भारत में महिलाएं किसी बाहरी पुरुष को अपना नाम नहीं बतातीं थीं तो चुनाव आयुक्त सेन ने अपने कर्मचारियों को इस काम पर पूरी ताकत लगाने को कहा, लेकिन यह भी निर्देश दिया कि जो महिलाएं अपना नाम नहीं बतातीं उन्हें वोटर लिस्ट में नहीं रखा जाए। इसका नतीजा यह रहा कि 8 करोड़ महिलाओं में से करीब 28 लाख के नाम लिस्ट में दर्ज ही नहीं किए गए और वे वोट नहीं दे पाईं। इनमें ज्यादातर महिलाएं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार से थीं। एक मुश्किल काम और था कि ज्यादातर वोटर पढ़े-लिखे नहीं थे तो उन्हें उम्मीदवार की पहचान के लिए चुनाव चिह्न दिए गए ताकि उसके आधार पर वे भी वोट डाल सकें। (त्रिवेदी की पुस्तक बीजेपी-कल, आज और कल से साभार)

(साई फीचर्स)