ट्रिन-ट्रिन घंटी अब हो रही विलुप्त…

(आरबी त्रिपाठी)
मेरे पिया गये रंगून किया है वहाँ से टेलीफोन तुम्हारी याद सताती है… शमशाद बेगम और सी. रामचंद्र ने जब अपने समय का यह पॉपुलर गाना गाया होगा। तब उन्होंने शायद ही सोचा हो कि जिस टेलीफोन की वो बात कर रहे हैं वो धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। सिर्फ टेलीफोन (बेसलाइन) ही नहीं बल्कि देश की नाक समझी जाने वाली सरकारी कंपनी बीएसएनएल यानी भारत दूर संचार लिमिटेड अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संकट और संघर्ष के दौर से गुजर रही है।
इस बीच खबर है कि सरकार बीएसएनएल और एमटीएमएल को बचाने और कोई पैकेज देने पर विचार कर रही है। दोनों कंपनियों के हजारों कर्मचारियों को वीआरएस के लिए तैयार करने के लिए सरकार कोई पेशकश करेगी। बात पहले टेलीफोन वाले गाने की। तो महंगे एन्ड्रायड स्मार्ट मोबाइल फोन के जमाने में अब भले ही पिया रंगून या किसी अन्यत देश जायें लेकिन टेलीफोन की बजाय वीडियो कॉलिंग करते होंगे। अब कौन शख्स टेलीफोन पर बात करने की जहमत उठाते होंगे। पतंगा फिल्म फेम रेणुका देवी की जगह शायद ही कोई बीबी या देवी इस तरह बेसलाइन फोन पर बात करना पसंद करती होगी।
अब तो स्मार्टफोन पर एक-दूसरे की तस्वीर और हाव-भाव देखकर इतराते हुए बतियाने का जमाना जो है। सो इन गाने की तरह बेसलाइन फोन भी बीते दिनों की बात बनता जा रहा है। बल्कि धीरे-धीरे ट्रिन-ट्रिन या कुर्र-कुर्र की आवाज भी सुनाई देना कम हो रही है। बेसलाइन फोन महज शोभा की वस्तुन बनते जा रहे हैं जो घरों की बजाय ऑफिसों या प्रतिष्ठाानों में ही पाये जाते हैं। जिस टेलीफोन की बात यहाँ की जा रही है उसका इन पंक्तियों के लेखक के साथ तकरीबन 40 साल पुराना रिश्ता रहा है।
उन दिनों लोकल फोन भी डायरेक्ट डायलिंग से नहीं बल्कि एक्सचेंज में बैठे ऑपरेटर सर की मदद से लगा करते थे। एसटीडी की बजाय 180 पर फोनकॉल बुक हुआ करते है। आप कितना ही अर्जेंट बुक करवायें दूसरे छोर पर बैठे सर की मर्जी से ही बात हुआ करती थी। छोटे शहरों-कस्बों में तो इन सर के बड़े जलवे होते थे। मजेदार बात यह थी कि वो बड़े आराम से फोन कॉल न केवल सुनते थे बल्कि ड्यूरेशन टाइम भी याद दिलाते थे। कभी-कभी बीच में खुद भी बोलने लगते थे। इसी तरह टेलीफोन का आकार-प्रकार और घंटी की आवाज भी अलग हुआ करती थी।
छोटी-छोटी जगहों पर पोस्ट ऑफिस में पीसीओ होते थे जिनके जरिये संबंधित पीपी को बुलाकर बात करवाई जाती थी। कालांतर में एसटीडीए पीसीओ कुकुरमुत्ते की तरह उग आये और चाय-पान की दुकानों की तरह नुक्कड़-नुक्कड़ पर नजर आने लगे। फिर वायरलेस टाइप फोन का प्रचलन बढ़ा जिन्हें लोग गाड़ियों घ्में रखकर लाया ले जाया करते थे। बीच में पेजर भी प्रचलन में आया जो सिर्फ मैसेज देने का काम करता था। यह सफर मोबाइल फोन और आधुनिक एण्ड्रायइड स्मोर्ट फोन तक अनवरत चला आ रहा है।
मोबाइल की स्वीकार्यता इतनी तेजी से बढ़ी कि लोग एक से अधिक मोबाइल फोन रखने लगे। बड़े नामी-गिरामी लोगों से लेकर घर पर काम करने वाली बाई, कपड़े स्त्री करने वाले, मैकेनिक से लेकर कबाड़ वाले भी मोबाइल फोन रखते हैं। दूरदराज के गांवों तक मोबाइल फोन पहुंच गया। दरअसल यह संचार युग की पराकाष्ठा कही जाना चाहिये। जाहिर है इसके नफा-नुकसान दोनों ही हैं। दुखद पहलू यह है कि दूरसंचार क्षेत्र में बड़ी नामीगिरामी कंपनियों के आने से लोग बीएसएनएल से अन्य नेटवर्क की तरफ शिफ्ट होने लगे। जाहिर है इससे इस सरकारी कंपनी को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
यहां तक कि केबल लाइनों को काटकर फोनबंद करने के प्रयास भी हुए। स्पष्ट है कि यदि दूरसंचार क्षेत्र का पूरी तरह प्रायवेटाइजेशन हुआ तो निजी क्षेत्र का एकाधिकार हो जायेगा। ललचाते आकर्षक प्लान फिर उपभोक्ताओं की लूट के जरिया बन जायेंगे। सो बीएसएनएल को अपनी स्थिति सुधारने के साथ सेवाओं की अच्छी क्वाालिटी और तत्परता पर ध्यान देना जरूरी है। इस बीच खबर है कि बीएसएनएल के 1083 मोबाइल टॉवर और 524 एक्सचेंज ठप पड़ गए हैं।
महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में कथित रूप से बिजली बिल ना चुकाने की वजह से यह स्थिति निर्मित हुई। यह एक ज्वलंत सवाल है कि जहाँ तक ओर निजी टेलीफोन कंपनियां 5जी की तैयारी में हैं वहीं देश में एकाधिकार रखने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीएसएनएल की इस दशा के लिए जिम्मेेदार कौन है? आखिर इस स्थिति से उबारने का दायित्व किस पर है?
(साई फीचर्स)