बॉलीवुड के कोलाहल में स्त्री की बात

 

 

कंगना रनौत इस समय भले ही जजमेंटल दिख रही हों या उत्पीड़न ग्रंथि की शिकार, एक समय में उन्होंने हिंदी सिनेमा में फैले भाई-भतीजावाद और वंशवाद को बहुत साहस से ललकारा था। मजावादी फिल्में बनाने वाले करण जौहर को उन्होंने गहरी पटकनी दी, जिसका कोई तर्कपूर्ण जवाब वह नहीं दे पाए। बाहर से आई कंगना ने अपने दमदार अभिनय की ताकत का इस्तेमाल किसी भी प्रतिष्ठान से भिड़ जाने के लिए किया। उन्होंने हिंदी सिनेमा में पुरुष के मुकाबले स्त्री को दोयम दर्जे की हैसियत दिए जाने का सवाल उठाया, फिर मामला सिनेमा में भूमिका का हो या भुगतान का। लग रहा था कि पहाड़ से आई लड़की के पास चुनौती देने का नैसर्गिक शब्दकोष है। उन्होंने खुलकर अपने संबंधों का जिक्र किया और पुरुष वर्चस्व को चुनौती दी। उन्होंने सवाल खड़े किए और जवाब मांगे। लेकिन हाल के दिनों में उनमें अनर्गल अहंकार दिखने लग गया। उनका संवेगीय नारीवाद अपनी जमीन खोने लग गया। वह देशप्रेम और देशद्रोह के फालतूपन में अपनी वैचारिक जमीन तलाशने लग गईं। हिंदी सिनेमा के सार्वजनिक जीवन में यह एक बड़ी हानि थी। यह स्त्री बोध को कहने-सुनने वाले प्रवक्ता को खोने जैसा था।

हिंदी सिनेमा में कोई मुद्दों पर बात करें और वह भी कोई अभिनेत्री, ऐसा कम होता है। शबाना आजमी इसका अपवाद थीं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा की अभिनेत्री की छुई-मुई छवि को अपने ऊपर कभी चस्पा नहीं होने दिया। उन्होंने बड़े मुद्दे उठाए, बड़े प्रतिकारों का वह हिस्सा बनती रहीं- बड़ी अभिनेत्री तो वह हमेशा ही रहीं। बरसों पहले बीबीसी पर अंग्रेजी में दिए अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी वक्तृता, राज्य, समाज और कला की समझदारी से चकित कर दिया था। हाल में वह अभिव्यक्ति के संकट, सत्ता के हिंदुत्वीकरण, मौलानाओं की प्रतिगामिता पर खुलकर बोलती रही हैं। कैफी और शौकत की बेटी में वैचारिक विचलन कभी नहीं दिखा। यह एक वजह भी रही होगी कि उन्होंने भारतीय स्त्री की यंत्रणा के यादगार किरदार निभाए। मुझे नहीं लगता कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में उन जैसा कोई रहा है- बड़ा कलाकार और भारतीय संकट को कहने सुनने वाला बड़ा कहनदार। इस तरह से देखना हो, तो कहना पड़ेगा कि समकालीन सिनेमाई परिदृश्य खासा दरिद्र है, जहां आए दिन प्रियंका चोपड़ा के शादी के निरुद्देश्य वीडियो दिखते रहते हैं या फिर शिल्पा शेट्टी के देह निर्माण संबंधी नुस्खे। लेकिन इस चटखारेदार प्रदर्शनवाद के बीच पिछले दिनों एक कौंध भी दिखी।

अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अपने उत्पीड़न के जो ब्यौरे दिए और जिससे मीटू जैसा आंदोलन खड़ा हो सका, उसने हिंदी सिनेमा में स्त्री अस्मिता और स्त्री बोध को मजबूत करने में बड़ा काम किया। काफी हल्ला मचा। लेकिन धीरे-धीरे मर्दवादी फिल्मी दुनिया में सबको क्लीन चिट मिलने लगी। नाना पाटेकर, साजिद खान, अनु मलिक, आलोक नाथ, सुभाष घई, विकास बहल वगैरह सारे दूध के धुले निकले। इस या उस जांच कमेटी ने इन्हें निर्दाेष होने के प्रमाण पत्र थमा दिए। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि हिंदी सिनेमा में स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने-भिड़ने वाले स्त्रियों द्वारा संचालित समूह नहीं हैं। हिंदी सिनेमा अब भी पुरुष प्रधान समाज है, जहां सिनेमा की पटकथा में मुख्य भूमिका में मर्द को ही होना है और सिनेमा बनाने के वित्त का नियंत्रण भी उसी के हाथ में है। और यह मर्दवाद जब खुलेआम कबीर सिंह जैसी स्त्री विरोधी फिल्मों में दिखता है, तो तापसी पन्नू के अलावा सब चुप्पी साध लेते हैं। तो कुछ अभिनेत्रियां हैं, जो गाहे-बगाहे अपने विरोध को दर्ज करती रहती हैं।

इस मामले में स्वरा भास्कर ने अपने लिए एक बड़ी भूमिका निर्धारित कर रखी है। समकालीन हिंदी सिनेमा के प्रथम पुरुष वाले लद्धड़ वैचारिक माहौल में वह प्रतिरोध की बड़ी आवाज हैं। जिस हिंदी सिनेमा समुदाय के लिए हम झींकते हैं कि वह अराजनीतिक है, स्वरा बेहद राजनीतिक हैं। उनके पास पंचम स्वर वाला नारी कंठ है। वह भारतीय सौहार्द्र को तोड़ने वालों पर ओले और आग की तरह बरसती हैं। उन्होंने यह कार्य भार ले रखा है कि वह इस समाज को बंटने नहीं देंगी। उनमें नैतिक दुस्साहस है और प्रतिकार के बौद्धिक उपकरण और बेलाग कहने का भाषिक हुनर। कन्हैया के लिए वह बेगूसराय तक दौड़ गई। स्त्रीबोध को कहने की उनके पास कितनी ही तरकीबें हैं, यद्यपि शबाना की तरह उनके पास बड़ी फिल्में नहीं हैं।

(साई फीचर्स)