पेंच के सियारों में फैल रही मैंज बीमारी!

 

 

पिस्सू जनित परजीवी द्वारा फैलने वाली आम बीमारी है मैंज

(जाहिद शेख)

कुरई (साई)। देश विदेश में अपनी अलग पहचान बनाने वाले भेड़िया बालक मोगली की कथित कर्मभूमि पेंच नेशनल पार्क में सियारों में एक अजीब सी बीमारी होने की बात प्रकाश में आयी है। श्वानों की तरह इन सियारों के बाल अचानक ही झड़ना आरंभ हो गये हैं।

पेंच नेशनल पार्क से जुड़े सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि पेंच नेशनल पार्क के कोर क्षेत्र में श्वान वंश की प्रजातियों में मैंज नामक बीमारी तेजी से फैल रही है। सूत्रों का कहना है कि पहले यह बीमारी जंगली कुत्तों में देखी गयी थी अब यह सियारों में भी देखने को मिल रही है।

सूत्रों ने आगे बताया कि पेंच नेशनल पार्क में श्वान प्रजाति में यह बीमारी एक तरह के पिस्सू के जरिये फैलती है और यह आम बीमारी है। इसे संक्रमित करने वाले पिस्सू किसी भी जानवर को आसानी से अपना शिकार बना सकते हैं। पिस्सू कमजोर जानवरों जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है को अपना निशाना बनाते हैं। यह एक प्रकार की चमड़ी की बीमारी है, जो पिस्सू नामक परजीवी से फैलती है।

सूत्रों का कहना है कि इस तरह की बीमारी घरों में पलने वाले श्वान में बहुतायत में देखी जाती है। पेंच के क्षेत्र में चूँकि रिहायशी क्षेत्र भी है जहाँ श्वान पले हुये हैं। ये श्वान और जंगली जानवर कई बार एक साथ जंगली जानवरों का मांस खाते दिख जाते हैं। हो सकता है कि आपस में संपर्क होने पर यह परजीवी एक जानवर से दूसरे जानवर तक पहुँच रहा हो।

ज्ञातव्य है कि दुनिया भर में श्वान वंश की लगभग चौंतीस प्रजातियां पायी जाती है। उनमें से भारत में सात तरह की प्रजातियां पायी जाती हैं। भारत में पायी जाने वाली सात प्रजातियों में से पेंच नेशनल पार्क में पाँच प्रजातियां आसानी से देखने को मिल जाती हैं। जानकारों के अनुसार भारत में पायी जाने वाली श्वान वंश की प्रजातियों में सबसे बड़ा जानवर भेड़िया और सबसे छोटा जानवर लोमड़ी है।

पेंच नेशनल पार्क से जुड़े सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया कोे बताया कि भारत में सियार, भेड़िये, लोमड़ियां और जंगली कुत्तों का डेरा जंगलों में रहता है। देखा जाये तो घरों में पाला जाने वाला कुत्ता भी इसी प्रजाति का होता है। जंगली कुत्ते और भेड़िये अक्सर दलों के बीच ही रहा करते हैं पर सियार और लोमड़ियां अक्सर अकेले या जोड़े में ही दिखायी देते हैं। खवासा के जंगलों के आसपास भेड़िये जो कि ही दुर्लभ प्रजाति के माने जाते हैं, इनका कुनबा भी तेजी के साथ बढ़ रहा है। सूत्रों ने कहा कि इस बीमारी से बाघ या अन्य जीवों को किसी तरह का खतरा नहीं है।

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