टुरिया के सत्याग्रह की जानकारी है अधूरी!

 

 

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सरकारी वेब साईट के कारण लोग हो रहे भ्रमित

(ब्यूरो कार्यालय)

सिवनी (साई)। जिले की महत्वपूर्ण जानकारियां लोगों तक आसानी से पहुंच सके, इसके लिए बनाई गई सरकारी वेब साईट में आधी अधूरी जानकारी होने से लोग भ्रमित होते नजर आ रहे हैं। इस वेब साईट में जिले से संबंधित जानकारियों को विस्तार से नहीं दिया जाना आश्चर्य का विषय है।

ज्ञातव्य है कि जिले की सरकारी वेब साईट को नए क्लेवर में हाल ही में ऑन एयर किया गया है। इस वेब साईट में जिले से संबंधित जानकारी अब तक आधी अधूरी ही रहने के कारण लोगों की सुविधा के लिए बनाया गया यह पोर्टल लोगों की असुविधा का कारण बनता जा रहा है।

जिला प्रशासन के उच्च पदस्थ सूत्रों ने समाचार एजेंसी ऑफ इंडिया को बताया कि वन नेशन वन पोर्टल को आधार बनाकर इस पोर्टल का नए सिरे से निर्माण कराया गया है। इस पोर्टल में अनेक जानकारियां इस तरह की हैं जिनका न तो विस्तार से वर्णन किया गया है और न ही इसके छायाचित्र ही हैं।

सूत्रों ने बताया कि भारत छोड़ो आंदोलन के बहुत पहले सिवनी जिले में आदिवासियों के द्वारा जंगल सत्याग्रह किया गया था। यह जंगल सत्याग्रह देश प्रदेश में जमकर चर्चित भी हुआ था। इसके अलावा 1923 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह शुरु हुआ था। जानकार बताते हैं इस सत्याग्रह का केंद्र नागपुर के आसपास के जंगल हुआ करते थे।

जानकारों की मानें तो जंगल सत्याग्रह का आगाज 1930 में सेनापति ओखा लोहार के द्वारा खवासा एवं कुरई से 12 किलो मीटर दूर जंगलों के बीच टुरिया में किया था। इसके अलावा 1920 में नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। इस अधिवेशन में महात्मा गांधी, भगवानदीन, विनोबा भावे भी शामिल हुए थे।

इतिहास के जानकार बताते हैं कि महाराष्ट्र की संस्कारधानी नागपुर के हुए इस अधिवेशन में सिवनी से पं. प्रभा शंकर जटार, पं. दुर्गा शंकर मेहता, रवि शंकर शुक्ला, नितेंद्र नाथ शील अपनी वकालत छोड़कर गए थे। इसके अगले साल महात्मा गांधी का आगमन सिवनी हुआ था।

जानकारों की मानें तो शहर के हृदय स्थल शुक्रवारी में महात्मा गांधी के द्वारा 20 मार्च 1921 को जनता को संबोधित गया था, इसके बाद से ही इस स्थल को गांधी चौक के नाम से पहचाना जाने लगा था। इस दौरान वे दुर्गा शंकर मेहता के आवास पर रूके थे।

जानकारों के अनुसार दुर्गा शंकर मेहता के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया था। इसमें सिवनी के मशहूर चंदन बगीचे में घास को काटा जाकर विरोध जताया गया था। 09 अक्टूबर 1930 को जब आंदोलन करने वाले जंगल में घास काटकर विरोध जता रहे थे, उसी दौरान पुलिस के दारोगा सदरूद्दीन और रेंजर श्री मेहता के द्वारा वहां खड़े होकर इन सत्याग्रहियों का उत्साह वर्धन करने वाले लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करना आरंभ कर दिया गया।

जानकारों की मानें तो इसके बाद सिवनी के उस समय के डिप्टी कमिश्नर सीमन ने पुलिस को लोगों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया गया था। इस गोलीकांड में तीन महिलाएं और एक पुुरुष मुड्डोबाई निवासी आमरीठ, रेनाबाई निवासी खंबा, देमोबाई निवासी भिलवा और बिरजू भोई निवासी मुरझोर शहीद हो गए।

इस दौरान दो अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इस गोलीबारी में मारे गए लोगों के शव भी परिजनों को नहीं दिए गए। बाद में सारे देश में आजादी की लड़ाई ने जोर पकड़ा और 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली। शहीदों की शहादत को देश नहीं भूला और 26 जनवरी 1950 को जब देश का संविधान लागू किया गया तब टुरिया में शहादत को याद करने के लिए सत्याग्रह स्मारक का निर्माण किया गया।

इस स्मारक में हर साल आदिवासी दिवस और स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस जैसे विशेष दिवसों में यहां पर ध्वजारोहण जैसे कार्यक्रम होते हैं और देश के लिए शहीद होने वालों को पुष्पांजलि अर्पित की जाती है।

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