प्रेमिका तक पहुंचा ही नहीं अटलजी का लिखा प्रेम पत्र

 

 

(एनपी उल्लेख)

ग्वालियर में स्नातक की पढ़ाई के दौरान अटल की मुलाकात राजकुमारी नाम की युवती से हुई, जो अपने कृष्ण की राधा बनी थी। दोनों ने विवाह तो नहीं किया लेकिन बिना विवाह किए ही दोनों के बीच प्यार रहा और दोनों साथ रहे। 1925 में मध्य प्रदेश के उज्जैन में जन्मी राजकुमारी हकसर गोविंद नारायण और मनमोहिनी हकसर की संतान थीं। वे इंदिरा गांधी की चचेरी बहन थीं। लेकिन इस बात की जानकारी युवा अटल को तब नहीं थी, जब कॉलेज में दोनों की मुलाकात हुई।

बीबी कहलाने वाली राजकुमारी ग्वालियर में सपरिवार बसने से थोड़े समय पहले तक पुरानी दिल्ली में रही थीं, जहां उनके पिता को सिंधिया परिवार के शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई थी। यह भी अटल और राजकुमारी के बीच संबंध बनने का संयोग रहा। उनकी प्रेम कहानी का आरंभ अटल के प्रेम पत्र से हुआ, जिसे उन्होंने राजकुमारी की किताब में रख दिया था। लेकिन वह कहानी अलग ही रास्ते पर मुड़ गई। न तो राजकुमारी को अटल का प्रेम पत्र मिला और ना ही अटल को राजकुमारी का लिखा प्रेम पत्र मिला।

वह दोनों भारतीय राजनीति के सर्वाधिक गैर परंपरागत युगल बने। अटल आजीवन अविवाहित रहे, राजकुमारी ने किसी दूसरे आदमी से शादी की। अटल जी ने बेटी को गोद लिया और पांच दशकों तक एक ही घर में बहुत सारे कुत्ते-बिल्ली और सुरक्षाकर्मियों के साथ रहे। 2014 में 88 वर्ष की उम्र में राजकुमारी का देहांत हो गया। जब भी वाजपेयी से पूछा गया कि उन्होंने शादी क्यों नहीं की, उन्होंने हमेशा निर्लिप्त भाव से उत्तर दिया- मुझे समय ही नहीं मिला। वाजपेयी की इस विचित्र पारिवारिक व्यवस्था के कारण मधोक जैसे उनके विरोधी अक्सर उनकी आलोचना करते थे। मधोक उनके घोषित विरोधी थे और मौका मिलने पर तीखा हमला करना नहीं छोड़ते थे।

16 मार्च 1965 को राज्यसभा में आम बजट पर चर्चा के दौरान उन्होंने शिकायत की कि सरकार एक तरफ तो परिवार नियोजन को बढ़ावा दे रही है दूसरी ओर में आयकर संशोधन के जरिए अविवाहितों पर कर बढ़ा दिए गए हैं। जब कांग्रेस के महावीर प्रसाद भार्गव ने यह कहा कि ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि अविवाहितों के खर्चे कम होते हैं तो वाजपेयी ने प्रतिवाद करते हुए कहा, नहीं, उनका खर्चा ज्यादा होता है क्योंकि उनके खर्चे को संभालने के लिए कोई महिला घर में नहीं होती। भार्गव ने व्यंग्यपूर्वक कहा, आपको ऐसा लगता है तो आप किसी को ले क्यों नहीं आते? हालांकि वे शायद इस बात को जानते थे कि वाजपेयी राजकुमारी कौल और उनके परिवार के साथ रहते थे। भार्गव की बात पर वाजपेयी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया क्योंकि मैं परिवार नियोजन में योगदान करना चाहता हूं। वाजपेयी अक्सर बहक भी जाते थे और ऐसे सांसदों की आलोचना को निमंत्रण दे देते थे, जो कहा करते थे कि वह अपना असली रूप दिखा रहे हैं। ऐसा ही एक अवसर 14 मई 1970 को आया जब भिवंडी में दंगों पर उनकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से सीधी बहस हो गई। उन्होंने कहा था- हमारे मुस्लिम भाई लगातार सांप्रदायिक होते जा रहे हैं और प्रतिक्रियास्वरूप हिंदू भी लगातार आक्रामक होने लगे हैं। अगर इसका श्रेय आप हमें देना चाहती हैं तो हम इसे स्वीकार करने को तैयार हैं लेकिन महोदया, इस देश में हिंदू अब और नहीं पिटते रहेंगे। मुस्लिम सांप्रदायिकता की अनदेखी करके आप सांप्रदायिकता से नहीं निपट सकते हैं। अगर आप मुस्लिम सांप्रदायिकता को बढ़ावा देंगे तो वह अन्य लोगों में भी भड़केगी। सांप्रदायिकता दोधारी तलवार है और दोनों तरफ से काटती है। श्रीमती गांधी ने यह कहते हुए उन्हें टोका कि वाजपेयी का भाषण देश में खराब माहौल पैदा करने जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि जब से एक दल विशेष के लोगों ने इस सदन में और विधानसभाओं में कुछ सीटें हासिल की हैं तब से यह दल इस जहरीले विषय को अधिक खुलकर उठाने लगा है। मुझे खुशी है कि वाजपेयी जी की टिप्पणियां हटाई नहीं गईं। मैं चाहती हूं कि वे रिकॉर्ड में रहें ताकि आने वाली पीढ़ियां जनसंघ की असली सोच को देख सकें। वाजपेयी जी की समय-समय पर इस्तेमाल सशक्त हिंदी को ही नहीं, उनके शब्दों के पीछे की सचाई को भी देखें।

पार्टी में भी कई लोगों को लगता था कि अन्य योग्य लोगों को दरकिनार करके वाजपेयी को अनुचित ढंग से बढ़ाया जा रहा है, तब भी आरएसएस ने वाजपेयी को पूरा समर्थन दिया। इन लोगों के तर्क एकदम बेबुनियाद भी नहीं थे। ऐसा ही एक मामला बलराज मधोक का था, जो वाजपेयी से वरिष्ठ थे और दिल्ली में आरएसएस की शाखाओं के संचालन और उसकी राजनीतिक शाखा- भारतीय जनसंघ की स्थापना करने तथा उसे राजनीतिक ताकत बनाने में उनकी बड़ी भूमिका थी। बाद में उनकी अनदेखी करते हुए वाजपेयी को वरिष्ठ पद दे दिया गया, जिनकी लोकप्रियता सांसद के रूप में ऊंचाइयों पर थी। 1962 में लोकसभा का चुनाव हार गए थे लेकिन उन्हें राज्यसभा के लिए चुन लिया गया था। खास बात यह कि वह बलरामपुर से कांग्रेस की सुभद्रा जोशी से 1 प्रतिशत से भी कम अंतर से हारे थे। उसी साल लोकसभा में भारतीय जनसंघ की सीटें 6.44 प्रतिशत वोटों के साथ 14 तक पहुंच गई जबकि 1957 में 5.93ः वोट और 4 सीटें मिली थीं। राज्य विधानसभा में पार्टी ने 116 सीटें जीतीं, जबकि 1957 में उसके कुल विधायक 46 ही थे। आरएसएस द्वारा वाजपेयी को अन्य नेताओं पर तरजीह दिए जाने के लिए बार-बार दिया जाने वाला एक तर्क यह है कि उनकी छवि एक कुशल वक्ता की थी। हालांकि पूर्व प्रधानमंत्री के साथ कई दशकों तक रहे गोविंदाचार्य ने मुझे बताया था कि कारण केवल यही एक नहीं था। (द अनटोल्ड वाजपेयी के हिंदी संस्करण से साभार, प्रकाशक- मंजुल पब्लिशिंग हाउस)

(साई फीचर्स)